Friday, June 5, 2026
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48 साल बाद न्याय की दस्तक: संभल दंगा पीड़ित परिवार को फिर बसाएगा प्रशासन, अवैध कब्जे से मुक्त कराई गई जमीन का मिलेगा पट्टा

उत्तर प्रदेश के संभल में एक ऐसा फैसला होने जा रहा है जिसे कई लोग “देर से मिला न्याय” और “इतिहास के घावों पर मरहम” के रूप में देख रहे हैं। वर्ष 1978 के भीषण सांप्रदायिक दंगे में सब कुछ खो चुके रस्तोगी परिवार को लगभग 48 वर्षों बाद दोबारा संभल में बसाने की तैयारी पूरी कर ली गई है। प्रशासन स्वयं इस परिवार को जमीन का पट्टा सौंपेगा, जिस पर वर्षों से अवैध कब्जा कर कब्रिस्तान बना दिया गया था।

संभल के जिलाधिकारी अंकित खंडेलवाल और पुलिस अधीक्षक कृष्ण कुमार विश्नोई की मौजूदगी में शेर खा सराय क्षेत्र में 100 वर्गमीटर भूमि का पट्टा रस्तोगी परिवार को सौंपा जाएगा। प्रशासन के अनुसार यह सरकारी भूमि थी, जिस पर अवैध कब्जा कर लिया गया था। राजस्व विभाग द्वारा पैमाइश कराई गई, बुलडोजर कार्रवाई के माध्यम से कब्जा हटाया गया और अब विधिवत भूमि पूजन एवं हवन के बाद पीड़ित परिवार को यह जमीन सौंपी जाएगी।

1978 का वह दंगा जिसने एक परिवार की दुनिया उजाड़ दी

साल 1978 में संभल में हुए सांप्रदायिक दंगों के दौरान मोहल्ला कोटपूर्वी निवासी राम सरन दास रस्तोगी की निर्मम हत्या कर दी गई थी। आरोप है कि दंगाइयों ने उनकी दुकान पर ही हत्या कर शव को टुकड़ों में काट दिया और बाद में उसे तराजू से बांधकर एक कुएं में फेंक दिया था। यह घटना उस दौर के सबसे भयावह सांप्रदायिक अपराधों में गिनी जाती है।

परिवार पर ऐसा भय छाया कि उन्हें अपना घर, कारोबार और पुश्तैनी शहर छोड़कर दिल्ली पलायन करना पड़ा। दशकों तक यह परिवार न्याय और पुनर्वास की प्रतीक्षा करता रहा।

मुख्यमंत्री से गुहार और फिर शुरू हुई कार्रवाई

कुछ माह पहले रस्तोगी परिवार ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात कर अपनी पीड़ा साझा की थी। परिवार का कहना था कि दंगे के दौरान उनकी संपत्ति छीन ली गई और वे अपने ही शहर से बेदखल हो गए।

मुख्यमंत्री ने सार्वजनिक मंच से इस मामले का उल्लेख करते हुए पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने और उनकी संपत्ति से जुड़े मामलों की समीक्षा कराने का आश्वासन दिया था। इसके बाद संभल प्रशासन ने कार्रवाई शुरू की और विवादित भूमि को कब्जा मुक्त कराया।

केवल पट्टा नहीं, प्रशासनिक संदेश भी

इस पूरे घटनाक्रम को सिर्फ जमीन आवंटन के रूप में नहीं देखा जा रहा है। यह मामला कई बड़े सवालों और संदेशों से जुड़ा हुआ है—

क्या दशकों पुराने दंगा पीड़ितों को न्याय दिलाने की प्रक्रिया अब तेज होगी?

क्या प्रशासन ऐतिहासिक अन्याय के मामलों की भी पुनर्समीक्षा करेगा?

क्या अवैध कब्जों के खिलाफ कार्रवाई राजनीतिक इच्छाशक्ति का नया संकेत है?

क्या यह कदम विस्थापित परिवारों की सम्मानजनक वापसी का मॉडल बन सकता है?

संभल में बदलते प्रशासनिक समीकरण

पिछले कुछ महीनों में संभल लगातार चर्चाओं में रहा है। अवैध कब्जों, सरकारी भूमि की पैमाइश, ऐतिहासिक विवादों और कानून-व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर प्रशासन की सक्रियता बढ़ी है। ऐसे समय में 1978 के दंगा पीड़ित परिवार को पुनर्वास देना केवल एक राजस्व कार्रवाई नहीं बल्कि एक प्रतीकात्मक और संवेदनशील निर्णय माना जा रहा है।

सबसे बड़ा सवाल

करीब आधी सदी बाद अपने शहर लौट रहे रस्तोगी परिवार के लिए यह सिर्फ 100 वर्गमीटर जमीन नहीं है। यह उनकी खोई हुई पहचान, सम्मान और उस न्याय की वापसी का प्रतीक है जिसकी प्रतीक्षा उन्होंने पीढ़ियों तक की। यह घटना केवल एक परिवार के पुनर्वास की नहीं, बल्कि उन जख्मों को स्वीकार करने और भरने की कोशिश है जो 1978 के दंगों ने समाज पर छोड़े थे।

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VIKAS TRIPATHI
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