“नोएडा की चंद्रो तोमर शूटिंग रेंज पर उठे गंभीर सवाल”
नोएडा। एक तरफ भारत अंतरराष्ट्रीय शूटिंग प्रतियोगिताओं में लगातार नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में करोड़ों रुपये की लागत से बनी एक प्रमुख सरकारी शूटिंग रेंज वर्षों से खिलाड़ियों के लिए लगभग बेकार पड़ी है।
गौतमबुद्ध नगर स्थित चंद्रो तोमर शूटिंग रेंज को पश्चिमी उत्तर प्रदेश के उभरते निशानेबाजों के लिए आधुनिक प्रशिक्षण केंद्र के रूप में विकसित किया गया था। उद्घाटन के समय इसे खेल प्रतिभाओं के लिए बड़ी उपलब्धि बताया गया, लेकिन आज खिलाड़ी सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद यह सुविधा उनके काम क्यों नहीं आ रही?
खिलाड़ियों, अभिभावकों और खेल प्रेमियों का कहना है कि यदि सरकारी खेल अवसंरचना खिलाड़ियों के उपयोग में ही न आए तो ऐसे निवेश का उद्देश्य क्या रह जाता है?
उद्घाटन के बाद क्यों थम गई रेंज की रफ्तार?
2022 में बड़े स्तर पर उद्घाटन और प्रचार-प्रसार के बाद उम्मीद थी कि यह रेंज राष्ट्रीय स्तर के निशानेबाज तैयार करेगी। लेकिन मौजूदा स्थिति कई सवाल खड़े करती है—
क्या रेंज पूरी तरह तकनीकी रूप से तैयार नहीं थी?
क्या निर्माण कार्य में कोई कमी रह गई?
क्या इलेक्ट्रॉनिक टारगेट सिस्टम और अन्य आवश्यक उपकरण उपलब्ध नहीं कराए गए?
क्या संचालन और रखरखाव की स्पष्ट योजना नहीं बनाई गई?
आखिर खिलाड़ियों के लिए यह सुविधा नियमित रूप से क्यों उपलब्ध नहीं हो सकी?
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि परियोजना पर खर्च किए गए सार्वजनिक धन का वास्तविक लाभ खिलाड़ियों तक कब पहुंचेगा?
खिलाड़ी निजी रेंजों पर निर्भर, बढ़ रहा आर्थिक बोझ
शूटिंग पहले से ही देश के सबसे महंगे खेलों में गिनी जाती है। हथियार, गोला-बारूद, उपकरण और प्रतियोगिताओं का खर्च लाखों रुपये तक पहुंच जाता है। ऐसे में सरकारी प्रशिक्षण सुविधाओं का बंद रहना आर्थिक रूप से कमजोर खिलाड़ियों के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।
कई अभिभावकों का कहना है कि उन्हें निजी शूटिंग रेंजों में भारी शुल्क देना पड़ रहा है, जिससे प्रतिभाशाली खिलाड़ी शुरुआती स्तर पर ही खेल छोड़ने को मजबूर हो सकते हैं।
अपनी प्रतियोगिताओं के लिए दूसरे राज्य पर निर्भर क्यों?
खेल जगत से जुड़े लोगों का कहना है कि उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य की अनेक महत्वपूर्ण शूटिंग गतिविधियां और प्रतियोगिताएं लंबे समय से दिल्ली की करणी सिंह शूटिंग रेंज पर निर्भर रही हैं।
इससे यह सवाल उठता है कि क्या उत्तर प्रदेश के पास अपनी राष्ट्रीय स्तर की पूर्ण विकसित सरकारी शूटिंग अवसंरचना पर्याप्त संख्या में मौजूद नहीं है?
प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से बढ़ीं उम्मीदें
दिलचस्प बात यह है कि गौतमबुद्ध नगर की वर्तमान जिलाधिकारी स्वयं राष्ट्रीय स्तर की राइफल निशानेबाज रह चुकी हैं। वहीं नोएडा के विधायक पंकज सिंह के परिवार का भी शूटिंग खेल से जुड़ाव रहा है।
ऐसे में खिलाड़ियों को उम्मीद है कि प्रशासन और जनप्रतिनिधि इस विषय को प्राथमिकता देते हुए रेंज को पुनः सक्रिय कराने की दिशा में ठोस कदम उठाएंगे।
क्या उत्तर प्रदेश से बाहर जा रही हैं प्रतिभाएं?
खेल विशेषज्ञों का मानना है कि जब किसी राज्य में विश्वस्तरीय प्रशिक्षण सुविधाएं पर्याप्त रूप से उपलब्ध नहीं होतीं तो खिलाड़ी बेहतर अवसरों की तलाश में दूसरे राज्यों की ओर रुख करते हैं।
यदि चंद्रो तोमर शूटिंग रेंज जैसी परियोजनाएं पूरी क्षमता से संचालित नहीं होतीं, तो इसका सीधा असर उत्तर प्रदेश की खेल प्रतिभाओं पर पड़ सकता है।
स्थानीय खिलाड़ियों पर पड़ रहा सीधा असर
चंद्रो तोमर शूटिंग रेंज के बंद रहने का असर केवल खेल अवसंरचना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सीधे उन खिलाड़ियों के भविष्य को प्रभावित कर रहा है जो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधित्व करने का सपना देखते हैं।
स्थानीय खिलाड़ियों हिमांशु राजपूत, आलोक, शिवम दीक्षित और जतिन सहित अनेक युवा निशानेबाजों को नियमित अभ्यास के लिए निजी शूटिंग रेंजों का सहारा लेना पड़ रहा है। खिलाड़ियों और उनके अभिभावकों का कहना है कि सरकारी सुविधा उपलब्ध न होने के कारण प्रशिक्षण की लागत लगातार बढ़ रही है, जिससे आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए शूटिंग जैसे महंगे खेल में बने रहना कठिन होता जा रहा है।
इन खिलाड़ियों का मानना है कि यदि चंद्रो तोमर शूटिंग रेंज को आधुनिक सुविधाओं के साथ नियमित रूप से संचालित किया जाए, तो नोएडा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सैकड़ों युवा निशानेबाजों को बेहतर प्रशिक्षण का अवसर मिल सकता है। उनका कहना है कि खेल प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने के लिए केवल नई परियोजनाओं की घोषणा पर्याप्त नहीं है, बल्कि पहले से निर्मित सुविधाओं का प्रभावी संचालन भी उतना ही आवश्यक है।
खिलाड़ियों की प्रमुख मांगें
चंद्रो तोमर शूटिंग रेंज का स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट कराया जाए।
परियोजना पर हुए खर्च का सार्वजनिक विवरण जारी किया जाए।
रेंज को शीघ्र खिलाड़ियों के लिए नियमित रूप से खोला जाए।
आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक टारगेट सिस्टम स्थापित किए जाएं।
राष्ट्रीय स्तर के प्रशिक्षकों की नियुक्ति की जाए।
राज्य एवं राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं का नियमित आयोजन हो।
आर्थिक रूप से कमजोर खिलाड़ियों के लिए विशेष सहायता योजना बनाई जाए।
चंद्रो तोमर शूटिंग रेंज का मामला केवल एक बंद खेल परिसर का नहीं है। यह सरकारी निवेश, जवाबदेही और खेल नीति की प्रभावशीलता से जुड़ा बड़ा सवाल बन चुका है।
खिलाड़ी अब घोषणाएं नहीं, बल्कि मैदान पर दिखाई देने वाले परिणाम चाहते हैं। क्योंकि हर दिन की देरी किसी न किसी युवा निशानेबाज के सपनों को प्रभावित कर रही है।














