भोपाल। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में प्रस्तावित वेस्टर्न बाईपास प्रोजेक्ट को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। प्रदेश के करीब 50 IAS और IPS अफसरों पर गंभीर आरोप लगे हैं कि उन्होंने बाईपास का रूट फाइनल होने से पहले ही आसपास की जमीनें खरीद लीं और बाद में सड़क का मार्ग उसी इलाके से निकाला गया, जिससे उनकी संपत्तियों की कीमतों में कई गुना उछाल आ गया।
आरोप है कि जिन जमीनों की कीमत पहले लगभग ₹5 करोड़ थी, वही अब बाईपास परियोजना के कारण बढ़कर ₹60 करोड़ तक पहुंच गई है। इस पूरे मामले को लेकर सामाजिक संगठन ‘सिस्टम परिवर्तन अभियान’ ने मुख्यमंत्री मोहन यादव को शिकायत भेजकर ₹3200 करोड़ की परियोजना को तत्काल रद्द करने और पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की है।
“पहले निवेश, फिर सरकारी फैसला?” — उठ रहे गंभीर सवाल
शिकायत में दावा किया गया है कि कई वरिष्ठ अफसरों और उनसे जुड़े लोगों ने उस इलाके में बड़े पैमाने पर जमीन खरीदी, जहां बाद में वेस्टर्न बाईपास का प्रस्तावित रूट तय किया गया। आरोप लगाने वालों का कहना है कि यह केवल संयोग नहीं हो सकता, क्योंकि सड़क बनने की खबर सार्वजनिक होने के बाद उन जमीनों के दाम आसमान छूने लगे।
संगठन का आरोप है कि सरकारी पद और गोपनीय सूचनाओं का इस्तेमाल कर पहले जमीनों में निवेश किया गया और फिर योजना का फायदा उठाकर करोड़ों का मुनाफा कमाने की तैयारी की गई।
₹3200 करोड़ का प्रोजेक्ट अब विवादों के घेरे में
भोपाल वेस्टर्न बाईपास को राजधानी की ट्रैफिक समस्या कम करने के लिए एक बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट के रूप में पेश किया गया था। लेकिन अब यही परियोजना कथित भ्रष्टाचार और अंदरूनी मिलीभगत के आरोपों के कारण सवालों में घिर गई है।
‘सिस्टम परिवर्तन अभियान’ का कहना है कि अगर आरोप सही हैं, तो यह केवल जमीन घोटाला नहीं बल्कि “नीतिगत भ्रष्टाचार” का बड़ा उदाहरण है, जहां सरकारी प्रभाव का इस्तेमाल निजी संपत्ति बढ़ाने के लिए किया गया।
CM मोहन यादव से क्या मांग की गई?
संगठन ने मुख्यमंत्री से मांग की है कि—
वेस्टर्न बाईपास परियोजना को तत्काल प्रभाव से रोका जाए
पूरे प्रकरण की न्यायिक या CBI जांच कराई जाए
जिन अधिकारियों पर आरोप हैं, उनकी संपत्तियों की जांच हो
परियोजना के रूट चयन की प्रक्रिया सार्वजनिक की जाए
जमीन खरीद-बिक्री के रिकॉर्ड की फोरेंसिक जांच कराई जाए
राजनीतिक गलियारों में भी हलचल
मामले के सामने आने के बाद भोपाल से लेकर राजधानी दिल्ली तक प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। विपक्षी दलों ने भी सरकार से जवाब मांगा है और आरोप लगाया है कि “सत्ता और सिस्टम” मिलकर जमीनों का खेल खेल रहे हैं।
हालांकि, अभी तक सरकार या आरोपित अधिकारियों की ओर से इस मामले पर कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
जनता पूछ रही — क्या विकास परियोजनाएं अब ‘इनसाइडर निवेश’ का जरिया बन रही हैं?
भोपाल बाईपास विवाद ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि क्या देश में बड़ी सरकारी परियोजनाओं की गोपनीय जानकारी का फायदा उठाकर प्रभावशाली लोग पहले से निवेश कर रहे हैं? अगर ऐसा है, तो यह आम जनता और किसानों के साथ बड़ा अन्याय माना जाएगा।
अब सबकी नजर मुख्यमंत्री मोहन यादव की अगली कार्रवाई पर टिकी है कि सरकार इस विवाद को केवल आरोप मानती है या फिर वास्तव में इसकी गहराई से जांच कराएगी।














