नई दिल्ली में चकमा समुदाय ने अपने सबसे महत्वपूर्ण पारंपरिक पर्व ‘बिजू’ को बड़े उत्साह और सांस्कृतिक गरिमा के साथ मनाया। 12 अप्रैल 2026 को शंकरलाल ऑडिटोरियम में आयोजित इस कार्यक्रम में दिल्ली-एनसीआर के चकमा समाज की बड़ी भागीदारी देखने को मिली। यह आयोजन ‘चकमा युवा संवाद: जनजातीय युवाओं को सशक्त बनाना और बिजू उत्सव का जश्न’ थीम पर आधारित था।
बिजू, चकमा समुदाय का सबसे प्रमुख त्योहार है, जिसे तीन दिनों तक मनाकर पुराने वर्ष को विदाई और नए पारंपरिक वर्ष का स्वागत किया जाता है। इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में नीति-निर्माताओं, शिक्षाविदों, सामुदायिक नेताओं, छात्रों और पेशेवरों ने भाग लिया और जनजातीय युवाओं के विकास, शिक्षा और सांस्कृतिक संरक्षण जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा की।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि अंतर सिंह आर्य, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) के अध्यक्ष, ने जनजातीय युवाओं के लिए शिक्षा, कौशल विकास और रोजगार के अवसरों को बढ़ाने पर जोर दिया। उन्होंने चकमा समुदाय की सराहना करते हुए कहा कि इस तरह के आयोजन उनकी समृद्ध संस्कृति और परंपराओं को जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
विशिष्ट अतिथि महिषिणी कोलोन, भारत में श्रीलंका की उच्चायुक्त, ने बिजू उत्सव और श्रीलंका के सिंहली-तमिल नववर्ष के बीच समानताओं की ओर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि “फूलों का संग्रह, घर-घर जाकर मिलना और बुजुर्गों का सम्मान—ये सभी परंपराएं दोनों संस्कृतियों में समान रूप से दिखाई देती हैं।” उन्होंने दिल्ली में इस उत्सव के आयोजन को ‘संस्कृति के विस्तार’ का प्रतीक बताया।
कार्यक्रम में निरूपमा चकमा ने भी चकमा समुदाय की सांस्कृतिक विरासत पर प्रकाश डालते हुए आधुनिकता के साथ पारंपरिक पहचान को बनाए रखने की आवश्यकता पर बल दिया।

इस अवसर पर सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने पूरे माहौल को जीवंत बना दिया। मिजोरम के चकमा स्वायत्त जिला परिषद से आए कलाकारों ने पारंपरिक वाद्ययंत्र—सिंगी, हेंगोरोंग, धुदुक और बांसुरी—की धुनों पर ‘गेंघुली’, ‘उभो गीत’ और ‘तेंगा भांगा गीत’ प्रस्तुत किए। पारंपरिक नृत्य और गीतों ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। खास बात यह रही कि महिषिणी कोलोन स्वयं मंच पर कलाकारों के साथ नृत्य करती नजर आईं, जिसे दर्शकों और सोशल मीडिया पर खूब सराहा गया।
कार्यक्रम में दो महत्वपूर्ण पैनल चर्चाएं भी आयोजित की गईं। पहली चर्चा ‘जनजातीय और अल्पसंख्यक युवाओं के लिए शिक्षा, कौशल विकास और रोजगार’ विषय पर केंद्रित रही, जिसमें भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. जॉय कुमार चकमा सहित कई विशेषज्ञों ने अपने विचार साझा किए।
दूसरी पैनल चर्चा ‘आधुनिक समाज में चकमा संस्कृति और परंपराओं का संरक्षण’ विषय पर हुई, जिसमें सेना, प्रशासन और सांस्कृतिक क्षेत्रों से जुड़े वक्ताओं ने भाग लिया और अपनी-अपनी दृष्टि प्रस्तुत की।
कार्यक्रम में चकमा समुदाय की पारंपरिक हस्तकला, हथकरघा, लिपि और दैनिक जीवन में उपयोग होने वाले उपकरणों की प्रदर्शनी भी लगाई गई। साथ ही ‘घिलेह हारा’ और ‘नाडेंग हारा’ जैसे पारंपरिक खेलों का आयोजन किया गया, जिसमें मुख्य अतिथि अंतर सिंह आर्य ने भी हिस्सा लेकर युवाओं का उत्साह बढ़ाया।
आयोजकों के अनुसार, दिल्ली-एनसीआर में लगभग 3,000 चकमा निवास करते हैं, जिनमें से करीब 1,000 लोगों ने इस कार्यक्रम में भाग लिया। इस भव्य आयोजन ने न केवल सांस्कृतिक एकता को मजबूत किया, बल्कि यह संदेश भी दिया कि बदलते समय में भी अपनी जड़ों से जुड़े रहना कितना महत्वपूर्ण है।














