इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश यशवंत वर्मा ने राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा भेज दिया है। यह कदम उनके खिलाफ चल रही महाभियोग की प्रक्रिया के बीच उठाया गया है, जिससे पूरे मामले ने एक नया मोड़ ले लिया है।
यह विवाद तब शुरू हुआ जब पिछले साल मार्च में दिल्ली स्थित उनके सरकारी आवास पर आग लगने की घटना के दौरान भारी मात्रा में अधजली नकदी मिलने का दावा किया गया। आरोपों के मुताबिक यह नकदी नौकरों के क्वार्टर के पास बने एक स्टोररूम से बरामद हुई थी। उस समय जस्टिस वर्मा और उनकी पत्नी भोपाल में मौजूद थे।
इस घटना के बाद मामले ने तूल पकड़ लिया और जांच की मांग उठने लगी। हालांकि, जस्टिस वर्मा ने शुरुआत से ही इन आरोपों को गलत बताते हुए कहा कि घटना के समय वे दिल्ली में नहीं थे और यदि संबंधित अधिकारियों ने स्थल की सुरक्षा में चूक की, तो इसके लिए उन्हें जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने 20 मार्च को उनके तबादले का प्रस्ताव रखा, जिसके बाद उन्हें इलाहाबाद हाईकोर्ट भेज दिया गया। इसके साथ ही, भारत के मुख्य न्यायाधीश ने 22 मार्च को आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया।
आंतरिक जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट में जस्टिस वर्मा के खिलाफ लगे आरोपों को सही पाया और आगे की कार्रवाई के लिए मामला राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भेज दिया गया। इसके बाद संसद में उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया गया।
अगस्त 2025 में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने 146 सांसदों के हस्ताक्षर के साथ महाभियोग प्रस्ताव को मंजूरी दी और ‘जजेस (जांच) अधिनियम, 1968’ के तहत तीन सदस्यीय जांच समिति गठित की गई, जो इस मामले की विस्तृत जांच कर रही है।
जस्टिस वर्मा ने इस आंतरिक जांच की संवैधानिकता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, लेकिन 7 अगस्त 2025 को दो जजों की पीठ ने उनकी याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि जांच प्रक्रिया में कोई प्रक्रियात्मक त्रुटि नहीं पाई गई।
अब उनके इस्तीफे के बाद यह सवाल उठ रहा है कि क्या महाभियोग की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी या इस पर विराम लगेगा। फिलहाल, यह मामला न्यायपालिका की पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर देशभर में चर्चा का विषय बना हुआ है।














