ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के बीच शांति वार्ता को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। एक ओर अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल बातचीत के लिए इस्लामाबाद पहुंच रहा है, वहीं ईरान ने साफ तौर पर वार्ता में शामिल होने से इनकार कर दिया है। इस स्थिति ने संभावित समाधान पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
इस बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने कड़ी चेतावनी देते हुए कहा है कि अगर दो हफ्ते का सीजफायर मंगलवार शाम तक किसी ठोस नतीजे के बिना समाप्त होता है, तो हालात गंभीर हो सकते हैं और “भारी बमबारी” की नौबत आ सकती है।
बातचीत और धमकी—दोनों साथ-साथ
अमेरिका एक तरफ बातचीत के जरिए समाधान तलाशने की कोशिश कर रहा है, तो दूसरी ओर सख्त बयानबाजी भी जारी है। ईरान ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल उसके पास किसी वार्ता की योजना नहीं है, जिससे कूटनीतिक प्रयासों को झटका लगा है।
पेट्रोडॉलर सिस्टम पर खतरा
इस पूरे घटनाक्रम के पीछे आर्थिक वजहों को भी अहम माना जा रहा है। 1970 के दशक से वैश्विक तेल व्यापार मुख्य रूप से डॉलर में होता आया है, जिसे Petrodollar System कहा जाता है। इस व्यवस्था से अमेरिकी अर्थव्यवस्था को बड़ा लाभ मिलता है, क्योंकि इससे डॉलर की वैश्विक मांग लगातार बनी रहती है।
लेकिन अब ईरान और China की कथित रणनीति के तहत अगर तेल का कारोबार डॉलर के बजाय युआन में होने लगता है, तो यह व्यवस्था कमजोर पड़ सकती है।
डॉलर बनाम युआन की लड़ाई
अगर तेल व्यापार में डॉलर की जगह युआन का इस्तेमाल बढ़ता है, तो इससे डॉलर की मांग घट सकती है। इसका सीधा असर अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा—डॉलर कमजोर होगा, आयात महंगा होगा और महंगाई बढ़ सकती है।
साथ ही, विदेशी निवेश में कमी आने से अमेरिका को अपने भारी कर्ज को संभालना मुश्किल हो सकता है।
SWIFT बनाम CIPS सिस्टम
अंतरराष्ट्रीय लेन-देन के लिए दुनिया भर में SWIFT सिस्टम का इस्तेमाल होता है, जिस पर अमेरिका का प्रभाव माना जाता है। इसके जरिए देशों के बीच ट्रांजैक्शन की जानकारी साझा की जाती है।
वहीं चीन ने इसका विकल्प तैयार करते हुए CIPS सिस्टम विकसित किया है, जो युआन में लेन-देन को सक्षम बनाता है और सीधे फंड ट्रांसफर भी कर सकता है।
चीन की रणनीति और वैश्विक असर
विश्लेषकों के मुताबिक, इस पूरे घटनाक्रम में चीन की भूमिका महत्वपूर्ण है। माना जा रहा है कि चीन प्रत्यक्ष रूप से शामिल हुए बिना ही डॉलर के प्रभुत्व को चुनौती दे रहा है, जिससे वैश्विक आर्थिक संतुलन बदल सकता है।
तेल कीमतों और मंदी का खतरा
खुफिया आकलनों के अनुसार, अगर Strait of Hormuz में तनाव लंबे समय तक बना रहता है, तो कच्चे तेल की कीमतें 250 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं। इससे अमेरिका और यूरोप में गंभीर महंगाई और आर्थिक संकट की आशंका है, जिसे Great Depression जैसी स्थिति से भी जोड़ा जा रहा है।
कुल मिलाकर, यह टकराव केवल सैन्य या कूटनीतिक नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक संतुलन से भी जुड़ा हुआ है। ऐसे में इस्लामाबाद में प्रस्तावित वार्ता और सीजफायर का भविष्य आने वाले दिनों में अंतरराष्ट्रीय राजनीति और अर्थव्यवस्था की दिशा तय कर सकता है।














