नई दिल्ली: महिला आरक्षण से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक के लोकसभा में खारिज होने के बाद देश की राजनीति में घमासान मच गया है। सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर शनिवार को और तेज हो गया। जहां भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने इसे “काला दिन” करार देते हुए विपक्ष पर महिलाओं के साथ “विश्वासघात” का आरोप लगाया, वहीं भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (कांग्रेस) और उसके सहयोगी दलों ने सरकार पर इस मुद्दे का राजनीतिकरण करने का आरोप लगाया।
बहस के बाद भी नहीं बन पाई सहमति
दो दिन तक चली लंबी बहस के बाद शुक्रवार को लोकसभा में महिला आरक्षण से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक पर वोटिंग हुई, लेकिन विपक्ष के विरोध के चलते यह विधेयक पारित नहीं हो सका। इस विधेयक में महिला आरक्षण को वर्ष 2029 से लागू करने और लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने जैसे प्रावधान शामिल थे, जिस पर विपक्ष ने गंभीर आपत्ति जताई।
बीजेपी का हमला: “महिलाओं के साथ विश्वासघात”
बीजेपी ने विधेयक के खारिज होने को लोकतंत्र के लिए “काला दिन” बताया। केंद्रीय मंत्री किरण रिजीजू ने विपक्ष पर तीखा हमला करते हुए कहा कि देश की महिलाएं इस “विश्वासघात” को कभी माफ नहीं करेंगी। उनके मुताबिक, यह विधेयक महिलाओं को ऐतिहासिक प्रतिनिधित्व देने का अवसर था, जिसे विपक्ष ने राजनीति के कारण रोक दिया।
केंद्रीय मंत्री शोभा करंदलाजे ने भी विपक्ष, खासकर राहुल गांधी को निशाने पर लेते हुए कहा कि इस फैसले से महिला सशक्तिकरण और क्षेत्रीय संतुलन दोनों को नुकसान हुआ है। उनका दावा है कि प्रस्तावित परिसीमन के बाद दक्षिण भारत में सीटों में 50% से अधिक वृद्धि होती, जिससे महिलाओं को बड़ा लाभ मिलता।
बीजेपी सांसद बांसुरी स्वराज ने भी कांग्रेस और INDIA गठबंधन पर अपने रुख से पीछे हटने और महिलाओं को धोखा देने का आरोप लगाया।
विपक्ष का पलटवार: “राजनीतिक मकसद से लाया गया बिल”
वहीं कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने सरकार के इरादों पर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने कहा कि यह विधेयक संघीय ढांचे को बदलने की साजिश का हिस्सा था और इसका गिरना लोकतंत्र की जीत है। उन्होंने सरकार से 2023 में पारित महिला आरक्षण कानून को मौजूदा 543 सीटों के आधार पर तुरंत लागू करने की मांग की।
कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने स्पष्ट किया कि विपक्ष महिला आरक्षण के खिलाफ नहीं है, बल्कि इसे परिसीमन से जोड़ने पर आपत्ति है। उनके अनुसार, अगर इसे अलग रखा जाता तो विधेयक आसानी से पारित हो सकता था।
समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता राम गोपाल यादव ने भी विधेयक लाने के समय और प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब सरकार के पास पर्याप्त बहुमत नहीं था, तो इसे लाने का मकसद राजनीतिक लाभ लेना ही था।
चुनावी रणनीति या सामाजिक सुधार?
विपक्ष का आरोप है कि केंद्र सरकार इस मुद्दे का इस्तेमाल आगामी चुनावों—खासकर पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु—में राजनीतिक लाभ के लिए कर रही है। वहीं बीजेपी का कहना है कि विपक्ष महिला सशक्तिकरण के खिलाफ खड़ा होकर अपनी मंशा उजागर कर चुका है।
आज रात प्रधानमंत्री का संबोधन
इस पूरे घटनाक्रम के बीच नरेंद्र मोदी शनिवार रात 8:30 बजे राष्ट्र के नाम संबोधन करेंगे। माना जा रहा है कि वे महिला आरक्षण विधेयक पर सरकार का पक्ष रख सकते हैं और विपक्ष के रुख पर सीधा हमला बोल सकते हैं।
महिला आरक्षण जैसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण मुद्दे पर सहमति न बन पाना भारतीय राजनीति के लिए एक बड़ा संकेत है। जहां एक ओर यह विधेयक महिलाओं को राजनीतिक मुख्यधारा में लाने का प्रयास था, वहीं दूसरी ओर इसके प्रावधानों—खासकर परिसीमन से जोड़ने—ने इसे विवादास्पद बना दिया।
अब निगाहें प्रधानमंत्री के संबोधन और आने वाले राजनीतिक घटनाक्रम पर टिकी हैं, जो इस मुद्दे को नई दिशा दे सकते हैं।














