समीक्षा कम, सफर ज्यादा! तीन दिन में तीन प्राधिकरण, दर्जनों अफसर, सैकड़ों किलोमीटर और नतीजा — एक बैठक टली, बाकी लाइन में
लखनऊ/नोएडा। देश के प्रधानमंत्री जनता से ईंधन बचाने, संसाधनों का संयमित इस्तेमाल करने और गैर-जरूरी खर्च कम करने की अपील कर रहे हैं। कई केंद्रीय मंत्री भी सादगी और बचत का संदेश देने में पीछे नहीं हैं। लेकिन लगता है उत्तर प्रदेश की अफसरशाही और उसके कुछ संचालकों के लिए ‘बचत’ और ‘सरकारी व्यवस्था की दक्षता’ का अर्थ अभी अलग शब्दकोश से निकाला जा रहा है।
मामला उत्तर प्रदेश के उद्योग एवं अवस्थापना विभाग से जुड़ा है, जहां मंत्री नंद गोपाल गुप्ता ‘नंदी’ पिछले तीन दिनों से नोएडा प्राधिकरण, ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण और यमुना प्राधिकरण के कामकाज की समीक्षा कर रहे हैं।
अब समीक्षा करना गलत नहीं है। समीक्षा होनी भी चाहिए। लेकिन सवाल तरीका लेकर उठ रहा है।
पहले दिन नोएडा प्राधिकरण के अधिकारी फाइलों का पुलिंदा लेकर लखनऊ पहुंचे।
दूसरे दिन ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के अधिकारी राजधानी पहुंचे।
तीसरे दिन यमुना प्राधिकरण के अफसरों की बारी तय हुई।
अर्थात विकास प्राधिकरणों में विकास रुके या न रुके, लेकिन ‘लखनऊ एक्सप्रेस प्रशासन मॉडल’ पूरी रफ्तार में दिख रहा है।
सुशासन से सज रहा उत्तर प्रदेश, सतत विकास से बन रहा उत्तम प्रदेश!#ViksitUP #ViksitBharat #SashaktUP #SashaktBharat pic.twitter.com/jqXlRsbKKE
— Nand Gopal Gupta ‘Nandi’ (@NandiGuptaBJP) May 21, 2026
ग्रेटर नोएडा वाले पहुंचे… बैठक ही टल गई
मामले का सबसे दिलचस्प अध्याय ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण से जुड़ा बताया जा रहा है।
अधिकारियों ने तैयारी की। दस्तावेज तैयार हुए। अधिकारी लखनऊ पहुंचे। समय निकाला गया। सरकारी संसाधन लगे।
फिर खबर आई — बैठक टल गई।
यानी अधिकारी पहुंचे जरूर, लेकिन समीक्षा बैठक ने शायद सोच लिया कि “आज नहीं, फिर कभी।”
अब सवाल यह उठ रहा है कि यदि बैठक टलनी ही थी तो क्या दर्जनों अफसरों का समय और सरकारी संसाधन इस तरह खर्च होना जरूरी था?
मंत्री जी खुद नोएडा आ जाते तो क्या व्यवस्था नाराज हो जाती?
असल सवाल यहीं से शुरू होता है।
क्या मंत्री जी खुद नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना प्राधिकरण क्षेत्र में जाकर समीक्षा नहीं कर सकते थे?
अगर मंत्री खुद आते तो—
मौके पर विकास कार्यों की वास्तविक स्थिति दिखती
अधूरे प्रोजेक्ट जमीन पर नजर आते
स्थानीय जनप्रतिनिधियों की राय मिलती
उद्योग जगत की चुनौतियां सामने आतीं
सामाजिक संगठनों और नागरिकों से सीधा संवाद होता
और सबसे बड़ी बात—
सरकारी डीजल, सरकारी समय और सरकारी मशीनरी की ‘तीन दिन की तीर्थयात्रा’ शायद बच जाती।
उधर तबादले भी, इधर समीक्षा भी… और बीच में कामकाज ‘वेटिंग मोड’ में
इसी बीच यमुना, नोएडा और ग्रेटर नोएडा प्राधिकरणों में अंतर-प्राधिकरण तबादलों की फाइलें भी तेजी से घूम रही हैं।
कई अभियंताओं और अधिकारियों को इधर से उधर भेजा जा रहा है। कुछ को यूपीसीडा भेजा गया।
कहा जा रहा है कि 31 मई तक तबादलों की प्रक्रिया जारी रह सकती है।
ऐसे में प्राधिकरणों के गलियारों में मजाक भी चल पड़ा है—
“काम कम हो रहा है, मूवमेंट ज्यादा हो रहा है।”
जनता पूछ रही है — समीक्षा हो रही है या ‘प्रशासनिक पर्यटन’?
सरकारी बैठकों का उद्देश्य काम की गति बढ़ाना होता है। लेकिन अगर बैठकों की व्यवस्था ही कामकाज की गति धीमी कर दे, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना प्राधिकरण सिर्फ सरकारी दफ्तर नहीं हैं। ये उत्तर प्रदेश के निवेश, उद्योग और शहरी विकास मॉडल की धुरी हैं।
ऐसे में यदि दर्जनों वरिष्ठ अधिकारी कई-कई दिन फाइलें लेकर राजधानी की यात्रा में व्यस्त रहें, तो जमीन पर परियोजनाओं की गति प्रभावित होने की चर्चा भी स्वाभाविक है।
फिलहाल प्रशासनिक गलियारों में एक व्यंग्य सबसे ज्यादा घूम रहा है—
“प्रधानमंत्री कह रहे हैं पेट्रोल बचाइए… और इधर अफसरों से कहा जा रहा है — टैंक फुल कराइए, लखनऊ आइए!”
समीक्षा कम, सफर ज्यादा! तीन दिन में तीन प्राधिकरण, दर्जनों अफसर, सैकड़ों किलोमीटर और नतीजा — एक बैठक टली, बाकी लाइन में
लखनऊ/नोएडा। देश के प्रधानमंत्री जनता से ईंधन बचाने, संसाधनों का संयमित इस्तेमाल करने और गैर-जरूरी खर्च कम करने की अपील कर रहे हैं। कई केंद्रीय मंत्री भी सादगी और बचत का संदेश देने में पीछे नहीं हैं। लेकिन लगता है उत्तर प्रदेश की अफसरशाही और उसके कुछ संचालकों के लिए ‘बचत’ और ‘सरकारी व्यवस्था की दक्षता’ का अर्थ अभी अलग शब्दकोश से निकाला जा रहा है।
मामला उत्तर प्रदेश के उद्योग एवं अवस्थापना विभाग से जुड़ा है, जहां मंत्री नंद गोपाल गुप्ता ‘नंदी’ पिछले तीन दिनों से नोएडा प्राधिकरण, ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण और यमुना प्राधिकरण के कामकाज की समीक्षा कर रहे हैं।
अब समीक्षा करना गलत नहीं है। समीक्षा होनी भी चाहिए। लेकिन सवाल तरीका लेकर उठ रहा है।
पहले दिन नोएडा प्राधिकरण के अधिकारी फाइलों का पुलिंदा लेकर लखनऊ पहुंचे।
दूसरे दिन ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के अधिकारी राजधानी पहुंचे।
तीसरे दिन यमुना प्राधिकरण के अफसरों की बारी तय हुई।
अर्थात विकास प्राधिकरणों में विकास रुके या न रुके, लेकिन ‘लखनऊ एक्सप्रेस प्रशासन मॉडल’ पूरी रफ्तार में दिख रहा है।
ग्रेटर नोएडा वाले पहुंचे… बैठक ही टल गई
मामले का सबसे दिलचस्प अध्याय ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण से जुड़ा बताया जा रहा है।
अधिकारियों ने तैयारी की। दस्तावेज तैयार हुए। अधिकारी लखनऊ पहुंचे। समय निकाला गया। सरकारी संसाधन लगे।
फिर खबर आई — बैठक टल गई।
यानी अधिकारी पहुंचे जरूर, लेकिन समीक्षा बैठक ने शायद सोच लिया कि “आज नहीं, फिर कभी।”
अब सवाल यह उठ रहा है कि यदि बैठक टलनी ही थी तो क्या दर्जनों अफसरों का समय और सरकारी संसाधन इस तरह खर्च होना जरूरी था?
मंत्री जी खुद नोएडा आ जाते तो क्या व्यवस्था नाराज हो जाती?
असल सवाल यहीं से शुरू होता है।
क्या मंत्री जी खुद नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना प्राधिकरण क्षेत्र में जाकर समीक्षा नहीं कर सकते थे?
अगर मंत्री खुद आते तो—
- मौके पर विकास कार्यों की वास्तविक स्थिति दिखती
- अधूरे प्रोजेक्ट जमीन पर नजर आते
- स्थानीय जनप्रतिनिधियों की राय मिलती
- उद्योग जगत की चुनौतियां सामने आतीं
- सामाजिक संगठनों और नागरिकों से सीधा संवाद होता
और सबसे बड़ी बात—
सरकारी डीजल, सरकारी समय और सरकारी मशीनरी की ‘तीन दिन की तीर्थयात्रा’ शायद बच जाती।
उधर तबादले भी, इधर समीक्षा भी… और बीच में कामकाज ‘वेटिंग मोड’ में
इसी बीच यमुना, नोएडा और ग्रेटर नोएडा प्राधिकरणों में अंतर-प्राधिकरण तबादलों की फाइलें भी तेजी से घूम रही हैं।
कई अभियंताओं और अधिकारियों को इधर से उधर भेजा जा रहा है। कुछ को यूपीसीडा भेजा गया।
कहा जा रहा है कि 31 मई तक तबादलों की प्रक्रिया जारी रह सकती है।
ऐसे में प्राधिकरणों के गलियारों में मजाक भी चल पड़ा है—
“काम कम हो रहा है, मूवमेंट ज्यादा हो रहा है।”
जनता पूछ रही है — समीक्षा हो रही है या ‘प्रशासनिक पर्यटन’?
सरकारी बैठकों का उद्देश्य काम की गति बढ़ाना होता है। लेकिन अगर बैठकों की व्यवस्था ही कामकाज की गति धीमी कर दे, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना प्राधिकरण सिर्फ सरकारी दफ्तर नहीं हैं। ये उत्तर प्रदेश के निवेश, उद्योग और शहरी विकास मॉडल की धुरी हैं।
ऐसे में यदि दर्जनों वरिष्ठ अधिकारी कई-कई दिन फाइलें लेकर राजधानी की यात्रा में व्यस्त रहें, तो जमीन पर परियोजनाओं की गति प्रभावित होने की चर्चा भी स्वाभाविक है।
फिलहाल प्रशासनिक गलियारों में एक व्यंग्य सबसे ज्यादा घूम रहा है—














