Thursday, May 21, 2026
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“शपथ नहीं दिलाई, तो हाईकोर्ट ने सीज कर दिए मेयर के अधिकार!” — लखनऊ की मेयर सुषमा खर्कवाल को बड़ा झटका, वित्तीय और प्रशासनिक शक्तियों पर रोक

 5 महीने तक कोर्ट आदेश के पालन में देरी पड़ी भारी, हाईकोर्ट का सख्त संदेश — ‘न्यायालय की अवहेलना बर्दाश्त नहीं’

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की राजनीति और नगर प्रशासन में बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। लखनऊ नगर निगम की मेयर सुषमा खर्कवाल को उस समय बड़ा झटका लगा, जब इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने उनके वित्तीय और प्रशासनिक अधिकारों को सीज करने का आदेश दे दिया।

यह कार्रवाई वार्ड संख्या-73 फैजुल्लागंज से निर्वाचित घोषित पार्षद ललित तिवारी को समय पर शपथ नहीं दिलाए जाने के मामले में हुई है। अदालत ने साफ कहा है कि जब तक निर्वाचित पार्षद को शपथ नहीं दिलाई जाती, तब तक मेयर के वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार प्रभावी नहीं रहेंगे।

यह फैसला नगर प्रशासन और स्थानीय निकायों के लिए एक बड़ा संदेश माना जा रहा है कि न्यायालय के आदेशों का पालन हर परिस्थिति में अनिवार्य है।


क्या है पूरा मामला? 5 महीने की देरी ने खड़ा कर दिया बड़ा संकट

मामले की शुरुआत वार्ड संख्या-73 फैजुल्लागंज के पार्षद चुनाव विवाद से हुई।

बीते वर्ष 19 दिसंबर को चुनाव न्यायाधिकरण ने पार्षद प्रदीप शुक्ला का निर्वाचन निरस्त कर दिया था और ललित तिवारी को निर्वाचित घोषित किया था।

ललित तिवारी, जो अवध बार एसोसिएशन के महामंत्री भी हैं, का आरोप था कि चुनाव न्यायाधिकरण के आदेश के करीब पांच महीने बीत जाने के बाद भी उन्हें पार्षद पद की शपथ नहीं दिलाई गई।

इसी को लेकर मामला हाईकोर्ट पहुंचा।


हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से भी नहीं मिली राहत

मामले में मेयर पक्ष की ओर से कानूनी राहत पाने की कोशिश की गई।

जानकारी के मुताबिक, पहले हाईकोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट में राहत की मांग की गई, लेकिन दोनों स्तरों पर कोई राहत नहीं मिली।

इसके बावजूद आदेश का पालन नहीं होने पर अदालत ने कड़ा रुख अपनाया।

जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस कमर हसन रिजवी की खंडपीठ ने स्पष्ट कहा कि—

“न्यायालय के आदेशों की अवहेलना किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं की जा सकती।”

कोर्ट ने यह भी कहा कि स्थानीय निकायों को भी न्यायालय के आदेशों का उसी गंभीरता से पालन करना होगा, जैसे अन्य सरकारी संस्थान करते हैं।


मेयर के अधिकार सीज होने का क्या होगा असर?

हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद लखनऊ नगर निगम के कामकाज पर बड़ा असर पड़ सकता है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार सीमित होने का असर इन क्षेत्रों पर दिख सकता है—

वित्तीय स्वीकृतियों पर प्रभाव

प्रशासनिक निर्णयों में देरी

विकास कार्यों से जुड़ी फाइलों की प्रक्रिया प्रभावित होना

नगर निगम के कई महत्वपूर्ण प्रस्तावों पर असर

लखनऊ नगर निगम उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े शहरी निकायों में शामिल है। ऐसे में मेयर के अधिकार सीमित होने का असर प्रशासनिक स्तर पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।


सुषमा खर्कवाल को क्यों माना जाता है अहम चेहरा?

सुषमा खर्कवाल मई 2023 से लखनऊ की मेयर हैं और भारतीय जनता पार्टी की वरिष्ठ नेता मानी जाती हैं।

नगर निगम चुनाव में उनकी जीत को बीजेपी के शहरी जनाधार के लिहाज से अहम माना गया था।

ऐसे में हाईकोर्ट का यह आदेश राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर चर्चा का विषय बन गया है।


नगर निगम की दलील क्या थी?

नगर निगम की ओर से अदालत में कहा गया था कि चुनाव न्यायाधिकरण के फैसले के खिलाफ प्रथम अपील लंबित है।

नगर निगम का तर्क था कि यदि अपील स्वीकार हो जाती है तो कानूनी स्थिति बदल सकती है।

लेकिन अदालत इस दलील से संतुष्ट नहीं हुई और कहा कि जब तक किसी उच्च स्तर से आदेश पर रोक नहीं होती, तब तक न्यायालय के आदेश का पालन आवश्यक है।


स्थानीय निकायों के लिए बड़ा संदेश

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला सिर्फ एक नगर निगम या एक मेयर तक सीमित नहीं है।

यह फैसला स्थानीय निकायों और प्रशासनिक संस्थाओं के लिए एक स्पष्ट संदेश भी है कि अदालत के आदेशों की अनदेखी महंगी पड़ सकती है।

फिलहाल अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि निर्वाचित पार्षद को शपथ कब दिलाई जाती है और मेयर के अधिकार कब बहाल होते हैं।

फिलहाल लखनऊ नगर निगम में सबसे बड़ा सवाल यही है — “क्या पांच महीने की देरी ने प्रशासन को कानूनी संकट में डाल दिया?”

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VIKAS TRIPATHI
VIKAS TRIPATHIhttp://www.pardaphaas.com
VIKAS TRIPATHI भारत देश की सभी छोटी और बड़ी खबरों को सामने दिखाने के लिए "पर्दाफास न्यूज" चैनल को लेके आए हैं। जिसके लोगो के बीच में करप्शन को कम कर सके। हम देश में समान व्यवहार के साथ काम करेंगे। देश की प्रगति को बढ़ाएंगे।
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