ला पाज़/नई दिल्ली: दक्षिण अमेरिकी देश Bolivia पिछले 50 दिनों से गंभीर राजनीतिक और आर्थिक उथल-पुथल का सामना कर रहा है। सरकार विरोधी प्रदर्शनों ने अब राष्ट्रीय संकट का रूप ले लिया है, जिसके चलते राष्ट्रपति Rodrigo Paz को पूरे देश में 90 दिनों के लिए आपातकाल (स्टेट ऑफ इमरजेंसी) घोषित करना पड़ा है। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि कई शहरों में खाने-पीने की वस्तुओं, ईंधन और दवाओं की भारी कमी हो गई है, जबकि प्रमुख राजमार्गों पर हजारों प्रदर्शनकारियों ने कब्जा जमा रखा है।
कैसे शुरू हुआ आंदोलन?
विवाद की शुरुआत सरकार के उस फैसले से हुई, जिसमें दशकों से जारी ईंधन सब्सिडी को खत्म करने का ऐलान किया गया था। सरकार का तर्क था कि बढ़ते वित्तीय घाटे, विदेशी मुद्रा संकट और अंतरराष्ट्रीय कर्जदाताओं के दबाव के कारण यह कदम जरूरी हो गया है। लेकिन आम जनता ने इसे महंगाई को और बढ़ाने वाला फैसला बताया।
इसके साथ ही भूमि सुधार कानून में प्रस्तावित बदलावों ने भी लोगों का गुस्सा भड़का दिया। नए प्रावधानों के तहत जमीन को कर्ज के लिए गिरवी रखने की अनुमति दी गई थी। ग्रामीण समुदायों और किसान संगठनों को आशंका है कि इससे बड़ी कंपनियां कृषि भूमि पर कब्जा जमा सकती हैं।
सड़कें बंद, सप्लाई चेन ठप
देशभर में प्रदर्शनकारियों ने राजमार्गों और मुख्य सड़कों पर बैरिकेड लगा दिए हैं। नतीजतन ट्रकों की आवाजाही रुक गई है और कई इलाकों में खाद्य पदार्थ, ईंधन और मेडिकल सप्लाई नहीं पहुंच पा रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो बोलिविया को मानवीय संकट का सामना करना पड़ सकता है। राजधानी ला पाज़ समेत कई शहरों में आवश्यक वस्तुओं की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं।
हिंसा और मौतों ने बढ़ाई चिंता
सरकार के अनुसार अब तक 365 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है जबकि दर्जनों लोग घायल हुए हैं। सड़क बंद होने और मेडिकल सेवाओं में देरी के कारण कई लोगों की मौत की भी खबरें सामने आई हैं। प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच कई स्थानों पर हिंसक झड़पें हुई हैं, जिससे तनाव और बढ़ गया है।
पूर्व राष्ट्रपति की एंट्री से और गरमाई राजनीति
पूर्व राष्ट्रपति Evo Morales के समर्थकों ने भी आंदोलन को खुला समर्थन दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इससे विरोध प्रदर्शन केवल आर्थिक मुद्दों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सत्ता परिवर्तन की मांग का रूप ले चुका है।
सेना उतरी मैदान में
राष्ट्रपति पाज ने स्पष्ट कर दिया है कि देश को ठप नहीं होने दिया जाएगा। सरकार ने सड़कों से अवरोध हटाने के लिए सेना और भारी मशीनरी तैनात कर दी है। प्रशासन का कहना है कि उसका उद्देश्य आम लोगों तक जरूरी सामान पहुंचाना और कानून-व्यवस्था बहाल करना है।
हालांकि विपक्षी दल और प्रदर्शनकारी इसे जनता की आवाज दबाने की कोशिश बता रहे हैं।
क्या है सबसे बड़ा खतरा?
विश्लेषकों के मुताबिक बोलिविया का मौजूदा संकट केवल राजनीतिक नहीं बल्कि आर्थिक और सामाजिक असंतोष का विस्फोट है। यदि सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच जल्द कोई समझौता नहीं होता, तो देश को गहरे आर्थिक संकट, खाद्य असुरक्षा और व्यापक राजनीतिक अस्थिरता का सामना करना पड़ सकता है।
दुनिया की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि 90 दिन की इमरजेंसी बोलिविया में शांति ला पाएगी या फिर यह संकट देश को और बड़े टकराव की ओर धकेल देगा।














