उत्तर प्रदेश की राजधानी में हुए अलीगंज अग्निकांड ने न केवल 15 लोगों की जान ले ली, बल्कि शहरी नियोजन, भवन निर्माण नियमों के पालन, प्रशासनिक जवाबदेही और राजनीतिक उत्तरदायित्व पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस त्रासदी के बाद राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए हैं, लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर ऐसी स्थिति बनने ही क्यों दी गई?
उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने इस घटना को पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के कार्यकाल में हुए कथित अवैध निर्माण और प्रशासनिक निर्णयों का परिणाम बताया है। उनका दावा है कि जिस भवन में यह हादसा हुआ, उसके निर्माण और उससे जुड़े विवादास्पद निर्णय समाजवादी पार्टी सरकार के दौरान लिए गए थे। उन्होंने आरोप लगाया कि भवन को सील करने और ध्वस्तीकरण के आदेश जारी होने के बावजूद बाद में उन्हें निरस्त कर दिया गया, जिससे अवैध निर्माण को संरक्षण मिला।
हादसे से जुड़े सबसे महत्वपूर्ण सवाल
इस पूरे प्रकरण में कुछ ऐसे तथ्य सामने आए हैं, जिनकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है—
यदि भवन के निर्माण में नियमों का उल्लंघन हुआ था, तो जिम्मेदार अधिकारियों पर तत्काल कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
ध्वस्तीकरण का आदेश जारी होने के बाद उसे वापस लेने के पीछे क्या कारण थे?
क्या भवन निर्माण मानकों, अग्निशमन सुरक्षा और व्यावसायिक उपयोग की अनुमति संबंधी नियमों का पालन किया गया था?
यदि भवन 2016 में ही विवादित था, तो पिछले एक दशक में किसी भी सरकार या प्रशासन ने स्थायी समाधान क्यों नहीं निकाला?
क्या स्थानीय निकायों, विकास प्राधिकरण और अग्निशमन विभाग ने समय-समय पर निरीक्षण किया था?
राजनीति बनाम जवाबदेही
अलीगंज अग्निकांड के बाद सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है। एक ओर सरकार पूर्ववर्ती शासनकाल को जिम्मेदार ठहरा रही है, वहीं विपक्ष वर्तमान प्रशासन की निगरानी व्यवस्था और सुरक्षा मानकों पर सवाल उठा रहा है।
लेकिन इस बहस का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि किसी भी अवैध निर्माण को वर्षों तक अस्तित्व में बने रहने देने की जिम्मेदारी केवल एक सरकार की नहीं हो सकती। यदि निर्माण 2016 में हुआ था और 2026 में हादसा हुआ, तो इस दौरान विभिन्न विभागों और प्रशासनिक तंत्र की भूमिका भी जांच के दायरे में आनी चाहिए।
मुख्यमंत्री की त्वरित प्रतिक्रिया
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने कार्यक्रम स्थगित कर घटनास्थल का दौरा किया, पीड़ित परिवारों से मुलाकात की और जांच के निर्देश दिए। सरकार ने मृतकों के परिजनों को सहायता और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का आश्वासन दिया है। हालांकि, पीड़ित परिवारों और आम नागरिकों की अपेक्षा केवल मुआवजे तक सीमित नहीं है, बल्कि वे यह जानना चाहते हैं कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जाएंगे।
व्यापक राष्ट्रीय चिंता
अलीगंज अग्निकांड केवल लखनऊ या उत्तर प्रदेश का मुद्दा नहीं है। देश के अधिकांश शहरों में अवैध निर्माण, भवन मानकों की अनदेखी, अग्निशमन सुरक्षा की कमी और प्रशासनिक उदासीनता लंबे समय से चिंता का विषय रहे हैं। दिल्ली, मुंबई, सूरत, कोलकाता और अन्य महानगरों में भी इसी प्रकार की दुर्घटनाएं बार-बार सामने आती रही हैं।
यह त्रासदी एक बार फिर याद दिलाती है कि शहरी विकास केवल भवन खड़े करने का नाम नहीं है, बल्कि सुरक्षा, नियमन और जवाबदेही सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है।
अलीगंज अग्निकांड पर राजनीतिक बयानबाजी से आगे बढ़कर यह तय करना होगा कि आखिर किन परिस्थितियों ने इस भवन को वर्षों तक विवादों के बावजूद संचालित होने दिया। यदि अवैध निर्माण, प्रशासनिक लापरवाही और नियमों की अनदेखी इस हादसे के मूल कारण हैं, तो केवल राजनीतिक आरोप पर्याप्त नहीं होंगे। दोषी अधिकारियों, भवन मालिकों और संबंधित संस्थाओं की जवाबदेही तय करना ही मृतकों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि और न्याय होगा।
यह हादसा केवल 15 जिंदगियों की क्षति नहीं, बल्कि व्यवस्था के उन कमजोर पहलुओं का भी प्रतीक है जिन्हें अब अनदेखा नहीं किया जा सकता।














