“दर्द से तड़पते बुजुर्ग कैदी, जेल प्रशासन की चुप्पी और निजी चिकित्सक के गंभीर आरोपों ने खड़े किए कई असहज सवाल; आखिर अदालत के आदेशों और इंसानी संवेदनाओं के बीच कहां खो गई जिम्मेदारी?”
नई दिल्ली: ऊषा माहना “पर्दाफाश न्यूज”
दिल्ली की सेंट्रल जेल की ऊंची दीवारों के भीतर से उठी एक कराह ने जेल प्रशासन की कार्यप्रणाली, कैदियों के स्वास्थ्य अधिकारों और सरकारी व्यवस्था की संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। उम्र 87 वर्ष, शरीर बीमारियों से जूझता हुआ और दर्द ऐसा कि कथित तौर पर जिंदगी से ज्यादा मौत आसान लगने लगे! यह किसी फिल्म की पटकथा नहीं, बल्कि बापू आशाराम की स्वास्थ्य स्थिति को लेकर उनके निजी चिकित्सक डॉ. भोला द्वारा किए गए गंभीर दावों का मामला है।
डॉ. भोला के मुताबिक, बीती रात आशाराम की पीड़ा इस कदर बढ़ गई कि उन्होंने निराशा में बार-बार कहा, “अगर मेरा इलाज नहीं करवा सकते, तो मुझे जहर का इंजेक्शन दे दो। मुझे यहीं मार दो, मैं तैयार हूं।”
यह कथन जितना विचलित करने वाला है, उससे कहीं ज्यादा विचलित करने वाले वे सवाल हैं, जो इस पूरे प्रकरण के बाद सामने आ रहे हैं। क्या जेल की सलाखों के पीछे पहुंचते ही किसी व्यक्ति के स्वास्थ्य और सम्मान के अधिकार भी सलाखों में कैद हो जाते हैं? क्या न्यायालय के आदेशों का महत्व जेल के मुख्य द्वार पर पहुंचकर समाप्त हो जाता है? और क्या किसी कैदी की चिकित्सा व्यवस्था भी प्रशासनिक इच्छाशक्ति, अधिकारियों की सुविधा और फाइलों की गति पर निर्भर करेगी?
रात दस बजे आई पुकार, लेकिन अस्पताल में कौन था जिम्मेदार?
डॉ. भोला ने घटनाक्रम बताते हुए दावा किया कि रात करीब दस बजे उन्हें जेल से आपातकालीन फोन आया। बताया गया कि आशाराम को ट्राइजेमिनल न्यूराल्जिया का गंभीर दौरा पड़ा है। यह एक ऐसी तंत्रिका संबंधी बीमारी है, जिसमें चेहरे के हिस्से में बिजली के झटके जैसा तीव्र दर्द उठ सकता है। कई मरीजों के लिए इसका दर्द असहनीय साबित होता है।
चिकित्सा जगत में इस बीमारी को कभी-कभी ‘सुसाइड डिजीज’ भी कहा जाता है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं कि हर मरीज आत्महत्या की प्रवृत्ति रखता है, बल्कि यह इसके असाधारण रूप से तीव्र दर्द की ओर संकेत करता है।
डॉ. भोला का कहना है कि सूचना मिलते ही वह सेंट्रल जेल पहुंचे। वहां उन्होंने आशाराम को कथित तौर पर असहनीय दर्द से तड़पते देखा। उनके अनुसार, मरीज के हाथ-पैर हिल रहे थे, शरीर से पसीना निकल रहा था और रक्तचाप खतरनाक स्तर तक बढ़ा हुआ था।
सबसे गंभीर आरोप यह है कि इतनी बड़ी मेडिकल इमरजेंसी के दौरान जेल अस्पताल में न तो ड्यूटी डॉक्टर मौजूद था और न ही नर्सिंग स्टाफ।
यदि यह दावा सही है तो सवाल केवल एक कैदी की चिकित्सा व्यवस्था का नहीं, बल्कि जेल के भीतर आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं की वास्तविक स्थिति का है। आखिर जिस संस्थान में सैकड़ों लोगों की जिम्मेदारी सरकार ने सौंप रखी है, वहां रात के समय चिकित्सा सहायता की उपलब्धता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी किसकी है?
जेल में सुरक्षा के लिए पहरेदारों की तैनाती जरूरी है, लेकिन क्या जिंदगी बचाने के लिए चिकित्सकीय व्यवस्था उतनी ही जरूरी नहीं?
इलाज की लड़ाई या अधिकारों की फाइलों में उलझा एक बुजुर्ग?
डॉ. भोला के आरोपों का दूसरा पहलू और भी गंभीर है। उनका दावा है कि आशाराम के उपचार को लेकर आयुर्वेदिक चिकित्सा और पंचकर्म की व्यवस्था की मांग की जा रही है, लेकिन जेल प्रशासन उन्हें आरोग्यम अस्पताल ले जाने की अनुमति नहीं दे रहा।
उनके अनुसार, आशाराम की चिकित्सा संबंधी परिस्थितियों को देखते हुए एलोपैथिक दर्द निवारक दवाओं के इस्तेमाल को लेकर सावधानी बरतने की सलाह दी गई है। डॉ. भोला का कहना है कि एम्स के गैस्ट्रोएंट्रोलॉजी विशेषज्ञ ने रक्तस्राव के जोखिम के कारण कुछ दर्द निवारक दवाओं से बचने की सलाह दी है।
इसी आधार पर वह शिरोधारा और पंचकर्म जैसी आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धतियों के माध्यम से उपचार कराने की मांग कर रहे हैं।
हालांकि, इस दावे की पुष्टि के लिए संबंधित चिकित्सकीय रिकॉर्ड और विशेषज्ञों की लिखित सलाह सार्वजनिक होना आवश्यक है। किसी भी उपचार पद्धति की उपयुक्तता का निर्धारण मरीज की पूरी मेडिकल रिपोर्ट और विशेषज्ञ चिकित्सकों की राय के आधार पर ही किया जाना चाहिए।
लेकिन यहां एक बुनियादी सवाल है: यदि किसी कैदी के उपचार को लेकर उसके निजी चिकित्सक और जेल प्रशासन के बीच मतभेद हैं, तो क्या उसका समाधान चिकित्सा विशेषज्ञों की स्वतंत्र समिति से नहीं कराया जा सकता?
आखिर इलाज का सवाल किसी अधिकारी की प्रतिष्ठा का सवाल क्यों बने?
अदालत के आदेश बनाम जेल प्रशासन की अपनी व्याख्या!
डॉ. भोला ने दावा किया है कि आशाराम को अपनी पसंद के चिकित्सक और चिकित्सा सहायता प्राप्त करने के अधिकार को लेकर न्यायिक आदेश मौजूद हैं। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट और राजस्थान हाईकोर्ट के आदेशों का भी हवाला दिया है।
यदि ऐसे आदेशों में वास्तव में निजी चिकित्सक से उपचार या किसी विशेष चिकित्सा सुविधा की अनुमति दी गई है, तो उनका अक्षरशः पालन सुनिश्चित करना संबंधित प्रशासन की जिम्मेदारी है।
लेकिन यहां एक कानूनी बारीकी भी समझनी होगी। अदालत द्वारा निजी चिकित्सक से इलाज की अनुमति और किसी खास अस्पताल में स्थानांतरित किए जाने का अधिकार दो अलग-अलग विषय हो सकते हैं। संबंधित आदेशों की वास्तविक भाषा और शर्तें ही इस मामले में निर्णायक होंगी।
इसलिए सवाल यह है कि क्या जेल प्रशासन ने अदालत के निर्देशों के अनुरूप निर्णय लिया है? यदि हां, तो उसके आधार क्या हैं? और यदि नहीं, तो जवाबदेही किसकी तय होगी?
लोकतंत्र में सरकारी अधिकारी अदालत के आदेशों की अपनी सुविधा के अनुसार व्याख्या नहीं कर सकते। जेल प्रशासन को भी अपने फैसलों का कानूनी और चिकित्सकीय आधार स्पष्ट करना चाहिए।
जब सवाल इलाज का हो और जवाब में मिले प्रशासनिक खामोशी!
डॉ. भोला ने जेल प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों, विशेषकर डीजी जेल और जेल अधीक्षक की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि आपातकालीन स्थिति में अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन अपेक्षित सहयोग नहीं मिला। उन्होंने यह भी दावा किया कि कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने फोन तक नहीं उठाया।
इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी आवश्यक है। जेल प्रशासन का पक्ष सामने आना भी उतना ही जरूरी है।
लेकिन यदि किसी गंभीर रूप से बीमार कैदी की चिकित्सा आपातस्थिति में जिम्मेदार अधिकारी उपलब्ध नहीं होते, तो यह केवल प्रशासनिक असुविधा नहीं, बल्कि गंभीर जवाबदेही का विषय बन जाता है।
यहां व्यंग्य व्यवस्था पर है, किसी मरीज की पीड़ा पर नहीं।
सरकारी दफ्तरों में फाइलों को आगे बढ़ाने के लिए नियमों की पूरी किताब खोल दी जाती है, लेकिन जब किसी की सांस, रक्तचाप और असहनीय दर्द का मामला सामने हो, तब क्या वही नियम मानवीय संवेदना का रास्ता भी दिखाते हैं?
क्या जेल की व्यवस्था का उद्देश्य केवल किसी व्यक्ति को बंद रखना है या उसकी सुरक्षा और जीवन की रक्षा करना भी है?
राजनीतिक पर्दे के पीछे आखिर चल क्या रहा है?
इस पूरे मामले का सबसे संवेदनशील पहलू यही है कि आशाराम का नाम लंबे समय से सार्वजनिक और राजनीतिक बहसों के केंद्र में रहा है। ऐसे में उनके स्वास्थ्य से जुड़ा कोई भी घटनाक्रम सामान्य प्रशासनिक मामला बनकर नहीं रह जाता। इसके साथ अनेक तरह की धारणाएं, आरोप-प्रत्यारोप और राजनीतिक व्याख्याएं जुड़ने लगती हैं।
डॉ. भोला ने तो इससे भी आगे बढ़कर आरोप लगाया है कि आशाराम पर जानबूझकर दबाव और प्रताड़ना डाली जा रही है, ताकि उनकी तबीयत बिगड़े और जेल के भीतर ही उनकी जान चली जाए।
यह आरोप अत्यंत गंभीर है। लेकिन किसी भी गंभीर आरोप को प्रमाण के बिना स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता।
यदि वास्तव में ऐसी कोई साजिश है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। और यदि यह आरोप गलत है, तो जेल प्रशासन को दस्तावेजों, मेडिकल रिकॉर्ड और अपने निर्णयों के माध्यम से स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में न तो किसी कैदी को विशेषाधिकार के नाम पर कानून से ऊपर रखा जा सकता है और न ही किसी कैदी को उसके स्वास्थ्य संबंधी अधिकारों से वंचित किया जा सकता है।
कानून का शासन तभी सार्थक है, जब वह लोकप्रिय और अलोकप्रिय, प्रभावशाली और सामान्य—सभी व्यक्तियों के लिए एक समान हो।
सवाल आशाराम का नहीं, जेल व्यवस्था के चरित्र का है!
इस मामले में सबसे बड़ी विडंबना यह है कि एक तरफ जेल प्रशासन के पास सुरक्षा, निगरानी और अनुशासन की विस्तृत व्यवस्था होने का दावा रहता है, दूसरी तरफ यदि एक बुजुर्ग कैदी की रात दस बजे की मेडिकल इमरजेंसी में डॉक्टर और नर्सिंग स्टाफ की उपलब्धता पर सवाल उठते हैं, तो यह व्यवस्था की प्राथमिकताओं पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है।
87 वर्ष की उम्र में गंभीर बीमारी से जूझ रहे व्यक्ति के लिए समय पर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराना कोई एहसान नहीं, बल्कि प्रशासनिक और मानवीय जिम्मेदारी है।
यह भी स्पष्ट रहना चाहिए कि जेल में बंद व्यक्ति की कानूनी स्थिति चाहे जो हो, उसकी चिकित्सा जरूरतों को दंड का हिस्सा नहीं बनाया जा सकता।
यदि आशाराम की स्थिति वास्तव में गंभीर है, तो तत्काल स्वतंत्र मेडिकल बोर्ड गठित कर उनकी जांच कराई जानी चाहिए। उनके उपचार से जुड़े सभी न्यायिक आदेशों की समीक्षा कर उनका पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए। साथ ही रात की कथित मेडिकल इमरजेंसी में ड्यूटी पर तैनात कर्मचारियों की उपस्थिति और अधिकारियों को किए गए फोन कॉल का रिकॉर्ड भी जांच के दायरे में आना चाहिए।
जेल प्रशासन को यह बताना चाहिए कि मरीज को कौन-सी चिकित्सा सुविधा दी गई, किन विशेषज्ञों से सलाह ली गई और निजी चिकित्सक की मांग पर क्या निर्णय लिया गया।
आखिर जवाब कौन देगा?
इस पूरे प्रकरण में कुछ सवाल ऐसे हैं, जिनसे जेल प्रशासन बच नहीं सकता।
क्या घटना वाली रात जेल अस्पताल में ड्यूटी डॉक्टर और नर्सिंग स्टाफ मौजूद थे?
क्या आशाराम का रक्तचाप और अन्य मेडिकल पैरामीटर तत्काल जांचे गए?
क्या उनके निजी चिकित्सक को निर्धारित प्रक्रिया के तहत उपचार करने की अनुमति दी गई?
क्या सुप्रीम कोर्ट और राजस्थान हाईकोर्ट के आदेशों का पालन हो रहा है?
क्या आरोग्यम अस्पताल ले जाने की मांग को किसी विशेषज्ञ मेडिकल बोर्ड के सामने रखा गया?
और सबसे महत्वपूर्ण—क्या आशाराम की वर्तमान स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए उनकी जान और चिकित्सा सुरक्षा के लिए पर्याप्त कदम उठाए जा रहे हैं?
इन सवालों का जवाब किसी प्रेस नोट की औपचारिक भाषा से नहीं, बल्कि मेडिकल रिकॉर्ड, न्यायिक आदेशों और निष्पक्ष जांच से मिलना चाहिए।
क्योंकि जेल की दीवारें भले ही ऊंची हों, लेकिन उनके भीतर होने वाली हर घटना कानून और जवाबदेही से ऊपर नहीं हो सकती।
आखिरकार, न्याय का अर्थ केवल अपराध के लिए सजा सुनिश्चित करना नहीं है। न्याय का एक अर्थ यह भी है कि सजा काट रहे व्यक्ति को भी जीवन, स्वास्थ्य और मानवीय गरिमा के न्यूनतम अधिकार मिलें।
आज सवाल यह नहीं कि आशाराम कौन हैं, उनका अतीत क्या है या उनके बारे में समाज की राय क्या है। आज सवाल यह है कि क्या भारतीय जेल व्यवस्था में एक 87 वर्षीय बीमार कैदी को समय पर इलाज मिलना भी किसी प्रशासनिक अनुमति, अहंकार या रस्साकशी का मोहताज है?
अगर किसी कैदी की कराह जेल की दीवारों से बाहर नहीं निकल सकती, तो कम से कम उसकी चिकित्सा संबंधी फाइलें तो बोलनी चाहिए।
और यदि उन फाइलों में भी खामोशी है, तो फिर जवाबदेही तय करने का वक्त आ चुका है।















