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सत्ता, रसूख और अदालत का शिकंजा! तरुण तेजपाल को सुप्रीम कोर्ट से झटका, 10 साल की सजा पर राहत नहीं; अब उम्रकैद की तलवार भी लटकी

जिस पत्रकार ने कभी सत्ता के गलियारों में बैठे ताकतवर लोगों को अपने सवालों से कटघरे में खड़ा किया था, आज खुद अदालत के कठघरे में खड़ा है। कभी पत्रकारिता की ताकत, राजनीतिक प्रभाव और खोजी पत्रकारिता के बड़े नामों में शुमार रहे तहलका मैगजीन के पूर्व संपादक तरुण तेजपाल को सुप्रीम कोर्ट से एक और बड़ा झटका लगा है। अदालत ने 2013 के चर्चित यौन उत्पीड़न एवं बलात्कार मामले में मिली 10 साल की सजा पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। दिलचस्प यह है कि एक तरफ तेजपाल सजा से राहत पाने की कोशिश कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ गोवा सरकार इस सजा को नाकाफी बताते हुए उम्रकैद की मांग कर रही है। यानी मामला केवल सजा पर रोक का नहीं, बल्कि सजा की गंभीरता और न्यायिक जवाबदेही की कसौटी का भी बन गया है।

पत्रकारिता के इतिहास में कुछ नाम ऐसे होते हैं, जिनके साथ उनकी उपलब्धियों से ज्यादा उनके विवाद जुड़ जाते हैं। तरुण तेजपाल का नाम भी अब ऐसे ही एक मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है। कभी तहलका के जरिए सत्ता प्रतिष्ठानों को चुनौती देने वाले तेजपाल आज खुद न्यायिक प्रक्रिया की सख्त निगरानी में हैं। जिस व्यक्ति की कलम ने कभी राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था की परतें उधेड़ने का दावा किया था, उसे अब अपने खिलाफ आए अदालती फैसले के सामने कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ रही है।

शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई ने इस मामले को एक बार फिर सुर्खियों के केंद्र में ला दिया। जस्टिस एम.एम. सुंदेश और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने तेजपाल की 10 साल की सजा पर रोक लगाने की मांग को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। अदालत का रुख साफ था कि फिलहाल ऐसा कोई आधार दिखाई नहीं देता, जिसके चलते सजा पर रोक लगाई जाए।

सुनवाई के दौरान पीठ ने स्पष्ट टिप्पणी की, “हमें नहीं लगता कि यह ऐसा मामला है जिसमें सजा पर रोक लगाई जानी चाहिए।”

यह टिप्पणी तेजपाल की कानूनी लड़ाई के लिहाज से महत्वपूर्ण है। हालांकि सजा पर रोक की मांग खारिज होने का अर्थ यह नहीं है कि उनकी अपील का अंतिम फैसला भी हो चुका है, लेकिन इतना जरूर है कि तत्काल राहत की उम्मीद को अदालत ने झटका दिया है।

एक तरफ राहत की गुहार, दूसरी तरफ उम्रकैद की मांग

तेजपाल की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल अदालत में पेश हुए। उन्होंने मामले के सबूतों, दस्तावेजों और घटनाक्रम का हवाला देते हुए अभियोजन पक्ष की कहानी पर सवाल उठाए। उनका तर्क था कि मामले की पूरी कहानी ही झूठी है और उपलब्ध सामग्री के आधार पर तेजपाल को दोषी ठहराए जाने पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।

लेकिन गोवा सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस दलील का विरोध किया। उनका रुख केवल सजा पर रोक का विरोध करने तक सीमित नहीं था। सरकार की ओर से कहा गया कि मामला तो इसके उलट सजा बढ़ाने का है।

यहीं इस पूरे प्रकरण का एक अहम कानूनी और राजनीतिक पहलू सामने आता है। एक पक्ष 10 साल की सजा को चुनौती देकर उससे राहत चाहता है, जबकि दूसरा पक्ष इसी सजा को अपराध की गंभीरता के मुकाबले कम बताकर उम्रकैद की मांग कर रहा है।

अर्थात तेजपाल के सामने चुनौती केवल मौजूदा सजा से राहत पाने की नहीं, बल्कि गोवा सरकार की उस अपील का सामना करने की भी है, जिसमें सजा बढ़ाने की मांग की गई है।

ट्रायल कोर्ट से हाई कोर्ट तक बदली पूरी कहानी

इस मामले की शुरुआत वर्ष 2013 में गोवा में आयोजित एक कार्यक्रम से हुई थी। तहलका मैगजीन के कार्यक्रम के दौरान एक होटल की लिफ्ट में अपनी जूनियर सहकर्मी के साथ यौन उत्पीड़न और बलात्कार का आरोप तेजपाल पर लगा।

मामला सामने आने के बाद देशभर में हलचल मच गई। वजह सिर्फ आरोपों की गंभीरता नहीं थी, बल्कि आरोपी का पत्रकारिता जगत में बड़ा नाम होना भी था। जिस मीडिया संस्थान ने कभी स्टिंग ऑपरेशन और खोजी पत्रकारिता के जरिए कई ताकतवर लोगों को कठघरे में खड़ा किया था, उसी संस्थान के शीर्ष पद पर रहे व्यक्ति पर गंभीर आरोप लगे थे।

यह मामला धीरे-धीरे अदालतों तक पहुंचा और लंबी कानूनी प्रक्रिया से गुजरा।

वर्ष 2021 में ट्रायल कोर्ट ने तेजपाल को आरोपों से बरी कर दिया था। उस फैसले के बाद ऐसा लगा कि लंबी कानूनी लड़ाई में तेजपाल को बड़ी राहत मिल गई है। लेकिन कहानी यहीं समाप्त नहीं हुई।

गोवा सरकार ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती दी। इसके बाद बॉम्बे हाई कोर्ट ने मामले की दोबारा न्यायिक समीक्षा करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलट दिया। हाई कोर्ट ने तेजपाल को बलात्कार का दोषी ठहराते हुए 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई।

हाई कोर्ट का यह फैसला इस मामले में निर्णायक मोड़ साबित हुआ। जिस व्यक्ति को ट्रायल कोर्ट ने बरी कर दिया था, वही व्यक्ति अब 10 साल की सजा का सामना कर रहा है।

पीड़िता का व्यवहार नहीं, आरोपी का कृत्य था सवाल

हाई कोर्ट के 81 पन्नों के फैसले में केवल ट्रायल कोर्ट के निष्कर्षों को गलत नहीं बताया गया, बल्कि सुनवाई के दौरान अपनाए गए दृष्टिकोण पर भी गंभीर सवाल उठाए गए।

हाई कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने मानो यह मान लिया था कि यौन उत्पीड़न की शिकायत करने वाली महिला को एक आदर्श पीड़िता की तरह व्यवहार करना चाहिए। यानी शिकायत करने वाली महिला कैसी दिखे, किस तरह प्रतिक्रिया दे, घटना के बाद उसका व्यवहार कैसा हो और उसे अपनी बात किस अंदाज में रखनी चाहिए—इन सबको उसकी विश्वसनीयता की कसौटी बना दिया गया।

अदालत ने इस सोच पर आपत्ति जताई।

यह सवाल अपने आप में बेहद महत्वपूर्ण है कि किसी महिला के साथ हुई कथित यौन हिंसा की जांच में अदालत का ध्यान आरोपी के कृत्य और उपलब्ध साक्ष्यों पर होना चाहिए या पीड़िता के निजी जीवन, व्यवहार और चरित्र की पड़ताल पर?

हाई कोर्ट ने बचाव पक्ष की ओर से पीड़िता से की गई जिरह के तरीके पर भी गंभीर टिप्पणी की। फैसले में कहा गया कि पीड़िता को कटघरे में खड़ा कर उसके निजी जीवन पर सवाल उठाए गए और ट्रायल कोर्ट ने इस दौरान पर्याप्त हस्तक्षेप नहीं किया।

अदालत ने इस बात पर हैरानी जताई कि ट्रायल कोर्ट मूकदर्शक बना रहा और बचाव पक्ष को जिरह के दौरान पीड़िता को परेशान तथा अपमानित करने की पूरी छूट मिलती रही।

इस टिप्पणी ने मामले को केवल एक आरोपी और शिकायतकर्ता के बीच कानूनी विवाद तक सीमित नहीं रहने दिया। इसने न्यायिक प्रक्रिया में पीड़िता की गरिमा, निष्पक्ष सुनवाई और अदालत की जिम्मेदारी जैसे व्यापक सवाल भी खड़े कर दिए।

राजनीतिक प्रतिशोध का दावा, लेकिन अदालत में सवाल अलग

तेजपाल लगातार यह दावा करते रहे हैं कि वह राजनीतिक प्रतिशोध का शिकार हुए हैं। उनका तर्क रहा है कि उनके खिलाफ कार्रवाई के पीछे राजनीतिक कारण थे। यह दावा उनके बचाव का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।

लेकिन किसी व्यक्ति का राजनीतिक प्रतिशोध का दावा अपने आप में न्यायिक निष्कर्ष नहीं बन जाता। अदालत को आरोपों, सबूतों, गवाहियों और कानूनी प्रावधानों के आधार पर ही फैसला करना होता है।

यही इस मामले की सबसे महत्वपूर्ण बात है।

राजनीतिक गलियारों में किसका किससे टकराव था, किसके हित प्रभावित हुए और किसने किसके खिलाफ आवाज उठाई—इन सवालों की अपनी जगह हो सकती है। लेकिन अदालत में अंतिम कसौटी साक्ष्य और कानून ही होते हैं।

पत्रकारिता में प्रभावशाली होना, राजनीतिक प्रतिष्ठानों से टकराने का इतिहास रखना या कभी सत्ता के खिलाफ खबरें प्रकाशित करना किसी को कानून से ऊपर नहीं कर सकता। उसी तरह किसी पर गंभीर आरोप लग जाना भी उसे बिना निष्पक्ष सुनवाई के दोषी ठहराने का आधार नहीं बन सकता।

इसलिए इस मामले में असली सवाल किसी की राजनीतिक छवि का नहीं, बल्कि अदालतों के सामने उपलब्ध साक्ष्यों और न्यायिक निष्कर्षों का है।

सुप्रीम कोर्ट पहले भी दिखा चुका है सख्त रुख

हाई कोर्ट के फैसले के बाद तेजपाल ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। 20 अगस्त को उन्होंने हाई कोर्ट के दोषसिद्धि संबंधी आदेश को चुनौती दी थी।

इसके बाद 25 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें 10 साल की सजा काटने के लिए तीन सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया था। सरेंडर से छूट देने की उनकी मांग भी अदालत ने स्वीकार नहीं की।

सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद तेजपाल को ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करना पड़ा।

अब सजा पर रोक लगाने की नई मांग भी खारिज हो गई है। इससे यह साफ है कि अदालत फिलहाल उन्हें सजा के प्रभाव से राहत देने के पक्ष में नहीं है। हालांकि दोषसिद्धि और सजा के खिलाफ उनकी कानूनी चुनौती का अंतिम परिणाम अभी अलग विषय है।

सरकार की नजर में 10 साल की सजा भी कम

इस मामले का एक और दिलचस्प पहलू गोवा सरकार की अपील है। सरकार का कहना है कि हाई कोर्ट ने तेजपाल को जो 10 साल की सजा सुनाई है, वह अपराध की प्रकृति और गंभीरता के अनुपात में पर्याप्त नहीं है।

सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी है कि इस मामले में आजीवन कारावास की सजा दी जानी चाहिए।

तेजपाल को भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत दोषी ठहराया गया है। इनमें धारा 376(2)(f), धारा 354A और धारा 354B शामिल हैं। धारा 376(2)(f) में विश्वास या अधिकार की स्थिति में मौजूद व्यक्ति द्वारा किए गए बलात्कार के लिए कठोर दंड का प्रावधान था, जिसमें आजीवन कारावास तक की सजा शामिल है।

गोवा सरकार की दलील है कि अपराध की गंभीरता को देखते हुए हाई कोर्ट द्वारा दी गई सजा पर्याप्त नहीं है। सरकार ने अपने पक्ष में विस्तृत याचिका दाखिल करते हुए सजा बढ़ाने की मांग की है।

इसका मतलब है कि आने वाले समय में तेजपाल की कानूनी लड़ाई का एक महत्वपूर्ण हिस्सा केवल दोषसिद्धि को चुनौती देना नहीं, बल्कि सजा की अवधि को लेकर सरकार की मांग का जवाब देना भी होगा।

तहलका की विरासत और उसके पूर्व संपादक का विरोधाभास

इस पूरे मामले का सबसे बड़ा विरोधाभास शायद यही है कि कभी पत्रकारिता के मंच से व्यवस्था की जवाबदेही तय करने की बात करने वाला व्यक्ति आज खुद जवाबदेही के सवालों से घिरा है।

तहलका का नाम एक दौर में खोजी पत्रकारिता, स्टिंग ऑपरेशन और सत्ता प्रतिष्ठानों को असहज करने वाली खबरों के साथ जुड़ा रहा। तरुण तेजपाल भी उसी दौर में एक प्रभावशाली संपादक के रूप में पहचाने गए।

लेकिन सार्वजनिक जीवन में किसी व्यक्ति की पुरानी उपलब्धियां उसके वर्तमान आरोपों या कानूनी जिम्मेदारियों का विकल्प नहीं हो सकतीं। पत्रकारिता का प्रभाव, राजनीतिक संपर्क और सामाजिक प्रतिष्ठा किसी को विशेष न्यायिक छूट नहीं दिला सकते।

इस मामले में अदालतों की भूमिका भी इसी वजह से महत्वपूर्ण है। न्याय का तकाजा है कि न तो किसी रसूखदार व्यक्ति को उसके प्रभाव के कारण राहत मिले और न ही किसी व्यक्ति के खिलाफ आरोपों की गंभीरता के आधार पर निष्पक्ष सुनवाई के सिद्धांतों से समझौता हो।

सुप्रीम कोर्ट का ताजा रुख बताता है कि तेजपाल को फिलहाल अपनी सजा से राहत नहीं मिली है। दूसरी तरफ गोवा सरकार की अपील ने उनके सामने सजा बढ़ने की आशंका भी कायम रखी है।

कभी दूसरों के लिए सवालों की धार तेज करने वाले तरुण तेजपाल के सामने अब अपने ही मामले में अदालत के सवालों का सामना करने की चुनौती है। सत्ता के गलियारों में किसका प्रभाव कितना था, राजनीतिक प्रतिशोध का दावा कितना सही है और बचाव पक्ष की दलीलें कितनी प्रभावी साबित होती हैं—इन सबका फैसला अदालत में ही होना है।

फिलहाल तस्वीर साफ है—10 साल की सजा पर रोक नहीं लगी, सरेंडर से राहत नहीं मिली और उम्रकैद की मांग भी अदालत के सामने विचाराधीन है।

कहानी का अंतिम अध्याय अभी लिखा जाना बाकी है। लेकिन इतना जरूर है कि इस बार सवाल किसी दूसरे के स्टिंग ऑपरेशन का नहीं, बल्कि एक ऐसे पूर्व संपादक की कानूनी जवाबदेही का है, जिसका नाम कभी सत्ता को चुनौती देने के लिए जाना जाता था।

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