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आबादी के बदलते मिजाज पर केंद्र की बड़ी पहल: अब जनता भी उठाएगी सवाल, हाई-लेवल कमेटी के पोर्टल पर दर्ज होंगी शिकायतें और तथ्य

“डेमोग्राफी में असामान्य बदलावों की पड़ताल के लिए खुला डिजिटल मंच; छह सदस्यीय समिति के सामने होगी आंकड़ों, प्रशासनिक जवाबदेही और जमीनी हकीकत की चुनौती”

नई दिल्ली। देश की आबादी में बदलाव, स्थानीय जनसांख्यिकीय रुझानों और कथित अवैध घुसपैठ जैसे संवेदनशील मुद्दों पर अब आम नागरिक भी अपनी बात सीधे एक आधिकारिक डिजिटल मंच के माध्यम से रख सकेंगे। डेमोग्राफी से जुड़े मामलों की जांच के लिए गठित हाई-लेवल कमेटी (HLCDC) ने अपना वेब पोर्टल आम जनता के लिए खोल दिया है। इस पहल के साथ सरकार ने ऐसा रास्ता तैयार किया है, जिसके जरिए नागरिक, सरकारी विभाग, राज्य सरकारें, केंद्र शासित प्रदेश और गैर-सरकारी संगठन संबंधित जानकारी, आंकड़े तथा अपने इनपुट समिति तक पहुंचा सकते हैं।

समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति प्रकाश प्रभाकर नावलेकर कर रहे हैं। छह सदस्यीय इस समिति के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल शिकायतें इकट्ठा करना नहीं, बल्कि उनमें से तथ्य, प्रमाण, प्रशासनिक चूक और वास्तविक जनसांख्यिकीय बदलावों के बीच स्पष्ट अंतर स्थापित करना भी होगी।

यह मुद्दा जितना संवेदनशील है, उतना ही महत्वपूर्ण भी। क्योंकि आबादी में बदलाव के सवाल पर एक तरफ राष्ट्रीय सुरक्षा, सीमा प्रबंधन और नागरिकता से जुड़े प्रश्न हैं, तो दूसरी तरफ संविधान प्रदत्त समानता, धार्मिक स्वतंत्रता और प्रत्येक नागरिक की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी भी है। ऐसे में किसी भी निष्कर्ष की विश्वसनीयता राजनीतिक दावों से नहीं, बल्कि पारदर्शी प्रक्रिया, प्रमाणित आंकड़ों और निष्पक्ष जांच से तय होगी।

शिकायत से जांच तक: अब सवालों को मिलेगा आधिकारिक मंच

अब तक किसी क्षेत्र में आबादी के स्वरूप में बदलाव को लेकर स्थानीय स्तर पर उठने वाले सवाल अक्सर प्रशासनिक शिकायतों, राजनीतिक आरोपों या सार्वजनिक बहसों तक सीमित रह जाते थे। नए पोर्टल का उद्देश्य ऐसे मामलों से संबंधित सूचनाओं को एक व्यवस्थित माध्यम से समिति तक पहुंचाना और संभावित बदलावों के कारणों का अध्ययन करने के लिए इनपुट जुटाना है।

इस मंच के माध्यम से संबंधित पक्ष असामान्य जनसांख्यिकीय रुझानों, उनके संभावित कारणों और उन्हें प्रभावित करने वाले कारकों के बारे में जानकारी साझा कर सकते हैं। इसमें सरकारी संस्थानों के साथ आम नागरिकों की भागीदारी भी महत्वपूर्ण होगी।

लेकिन यहां एक बुनियादी सवाल का जवाब स्पष्ट रहना चाहिए: क्या किसी इलाके में किसी धर्म की आबादी का अनुपात बढ़ना अपने आप में अवैध घुसपैठ का प्रमाण है? नहीं।

धार्मिक जनसंख्या के अनुपात में बदलाव के पीछे जन्म-दर, मृत्यु-दर, आंतरिक प्रवास, रोजगार, शिक्षा, शहरीकरण, विवाह और जनगणना से संबंधित परिस्थितियां जैसे कई कारण हो सकते हैं। इसी तरह अवैध प्रवेश का संदेह भी केवल धार्मिक पहचान या आबादी के अनुमान के आधार पर प्रमाणित नहीं किया जा सकता। उसके लिए संबंधित कानूनों के अनुरूप स्वतंत्र साक्ष्य और जांच आवश्यक हैं।

यही वह कसौटी होगी, जिस पर इस पहल की गंभीरता और सफलता परखी जाएगी।

छह सदस्यीय समिति: प्रशासनिक अनुभव से लेकर आर्थिक विश्लेषण तक

समिति में न्यायपालिका, प्रशासन, पुलिस व्यवस्था, जनगणना और अर्थशास्त्र से जुड़े अनुभवों का समावेश है। इसके सदस्य अलग-अलग क्षेत्रों की विशेषज्ञता के आधार पर जनसांख्यिकीय बदलावों से संबंधित सूचनाओं का विश्लेषण करने में भूमिका निभा सकते हैं।

1. न्यायमूर्ति प्रकाश प्रभाकर नावलेकर: समिति की अध्यक्षता

मध्य प्रदेश के जबलपुर में जन्मे न्यायमूर्ति प्रकाश प्रभाकर नावलेकर ने 1965 में जबलपुर विश्वविद्यालय से कानून की डिग्री हासिल की। उन्होंने अपने कानूनी करियर में दीवानी, आपराधिक, संवैधानिक, कंपनी, श्रम और सेवा संबंधी मामलों में काम किया।

वर्ष 1992 में वे मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायाधीश बने। बाद में उन्होंने राजस्थान उच्च न्यायालय में सेवाएं दीं और गुवाहाटी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के पद पर भी कार्य किया। वर्ष 2004 में उनकी नियुक्ति सुप्रीम कोर्ट में हुई और 2008 में वे सेवानिवृत्त हुए।

इसके बाद 2009 में उन्हें मध्य प्रदेश का लोकायुक्त नियुक्त किया गया, जहां उन्होंने 2016 तक जिम्मेदारी संभाली।

उनका न्यायिक और प्रशासनिक अनुभव समिति के काम में महत्वपूर्ण हो सकता है। हालांकि, किसी भी निष्कर्ष की वैधता इस बात पर निर्भर करेगी कि समिति उपलब्ध साक्ष्यों, संबंधित कानूनों और निष्पक्ष जांच की प्रक्रिया का कितना पालन करती है।

2. मृत्युंजय कुमार नारायण: जनगणना और प्रशासनिक आंकड़ों का अनुभव

उत्तर प्रदेश कैडर के 1995 बैच के आईएएस अधिकारी मृत्युंजय कुमार नारायण भारत के रजिस्ट्रार जनरल और जनगणना आयुक्त हैं। उन्होंने 1 नवंबर 2022 से यह जिम्मेदारी संभाली है।

वे इससे पहले गृह मंत्रालय में अपर सचिव और विद्युत मंत्रालय में संयुक्त सचिव के पद पर कार्य कर चुके हैं। उन्होंने आईआईटी कानपुर से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में बीटेक और एमटेक की डिग्री हासिल की। इसके अतिरिक्त, किंग्स कॉलेज लंदन से सार्वजनिक नीति एवं प्रबंधन में एमएससी और लखनऊ विश्वविद्यालय से कानून की डिग्री प्राप्त की।

जनगणना से संबंधित प्रशासनिक अनुभव इस तरह की पड़ताल में प्रासंगिक है, क्योंकि विश्वसनीय जनसांख्यिकीय विश्लेषण के लिए तुलनीय आंकड़ों, उनकी गुणवत्ता और सही व्याख्या की जरूरत होती है।

हालांकि, जनगणना के आंकड़े अपने आप में किसी व्यक्ति की नागरिकता या अवैध प्रवास की स्थिति का अंतिम प्रमाण नहीं होते। इन अलग-अलग प्रश्नों के लिए अलग-अलग कानूनी और तथ्यात्मक प्रक्रियाएं जरूरी हैं।

3. दुर्गा शंकर मिश्र: केंद्र और राज्यों में लंबा प्रशासनिक अनुभव

उत्तर प्रदेश कैडर के 1984 बैच के आईएएस अधिकारी दुर्गा शंकर मिश्र चार दशकों से अधिक के प्रशासनिक अनुभव के बाद जून 2024 में उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव पद से सेवानिवृत्त हुए।

उन्होंने केंद्र और राज्य सरकारों में आंतरिक सुरक्षा, खनन, शहरी विकास, स्वास्थ्य, पर्यटन, खेल, नागरिक उड्डयन और कृषि जैसे क्षेत्रों में वरिष्ठ पदों पर काम किया। नई संसद भवन और सेंट्रल विस्टा परियोजना की देखरेख से भी वे जुड़े रहे।

आईआईटी कानपुर से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में स्नातक मिश्र ने यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टर्न सिडनी से एमबीए और द हेग स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल स्टडीज से सार्वजनिक नीति में स्नातकोत्तर डिप्लोमा प्राप्त किया।

शहरी विकास और प्रशासन का उनका अनुभव स्थानीय स्तर पर बदलती आबादी, आवास, बुनियादी सुविधाओं तथा सरकारी सेवाओं से संबंधित आंकड़ों को समझने में उपयोगी हो सकता है।

4. बालाजी श्रीवास्तव: पुलिस और आंतरिक सुरक्षा का अनुभव

1988 बैच के AGMUT कैडर के पूर्व आईपीएस अधिकारी बालाजी श्रीवास्तव ने तीन दशकों से अधिक समय तक पुलिस और प्रशासनिक व्यवस्था में सेवाएं दीं।

वे गृह मंत्रालय के अंतर्गत ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट के महानिदेशक रहे। इसके अतिरिक्त उन्होंने दिल्ली के अंतरिम पुलिस आयुक्त, पुडुचेरी और मिजोरम के पुलिस महानिदेशक तथा अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में अंतरिम पुलिस महानिदेशक की जिम्मेदारियां भी निभाईं।

उन्होंने सेंट स्टीफंस कॉलेज और दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से अर्थशास्त्र की पढ़ाई की तथा दिल्ली विश्वविद्यालय से कानून की डिग्री प्राप्त की। उन्हें सराहनीय सेवा के लिए पुलिस मेडल और विशिष्ट सेवा के लिए राष्ट्रपति पुलिस मेडल से सम्मानित किया गया।

पुलिस व्यवस्था और आंतरिक सुरक्षा से जुड़ा उनका अनुभव प्रासंगिक हो सकता है, विशेषकर तब, जब किसी सूचना में संभावित कानून-व्यवस्था संबंधी पहलू सामने आएं। लेकिन किसी भी व्यक्ति या समुदाय के विरुद्ध कार्रवाई का आधार उसकी धार्मिक पहचान नहीं, बल्कि कानूनसम्मत और सत्यापित साक्ष्य होने चाहिए।

5. डॉ. शमिका रवि: अर्थशास्त्र और विकास के नजरिए से पड़ताल

प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद की सदस्य डॉ. शमिका रवि विकास अर्थशास्त्र, वित्त, स्वास्थ्य सेवा, शहरीकरण, लैंगिक मुद्दों, कल्याण और गरीबी जैसे विषयों की विशेषज्ञ हैं।

उन्होंने इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस और बिट्स स्कूल ऑफ मैनेजमेंट जैसे संस्थानों में अध्यापन किया है। उन्होंने न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्र में पीएचडी, दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से मास्टर डिग्री और लेडी श्रीराम कॉलेज फॉर विमेन से अर्थशास्त्र में बीए ऑनर्स की डिग्री हासिल की।

जनसांख्यिकीय बदलावों को समझने में अर्थशास्त्र की भूमिका महत्वपूर्ण है। रोजगार के अवसर, आय, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं, आवास और शहरीकरण जैसे कारक किसी क्षेत्र की आबादी के स्वरूप को प्रभावित कर सकते हैं।

इसलिए केवल आंकड़ों में दिखाई देने वाले बदलाव को देखकर निष्कर्ष निकालने के बजाय उसके सामाजिक और आर्थिक संदर्भ को समझना जरूरी होगा।

6. प्रशांत सीताराम लोखंडे: समिति के सदस्य सचिव

2001 बैच के AGMUT कैडर के आईएएस अधिकारी प्रशांत सीताराम लोखंडे समिति के सदस्य सचिव हैं। उनका जन्म 20 नवंबर 1973 को हुआ था।

उन्होंने पुणे विश्वविद्यालय से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बीई और मुंबई स्थित एनआईटीआईई से इंडस्ट्रियल इंजीनियरिंग में स्नातकोत्तर डिप्लोमा प्राप्त किया है। उनके प्रशासनिक करियर में सचिव, संयुक्त सचिव, अतिरिक्त सचिव, निदेशक, उपायुक्त और अन्य वरिष्ठ पदों की जिम्मेदारियां शामिल रही हैं।

समिति के सदस्य सचिव के रूप में उनकी भूमिका प्रशासनिक समन्वय, सूचनाओं के संकलन और संबंधित विभागों के साथ कामकाज में महत्वपूर्ण हो सकती है।

उनकी जिम्मेदारी का व्यावहारिक महत्व इस बात से भी जुड़ा होगा कि पोर्टल पर आने वाली सूचनाओं का रिकॉर्ड किस तरह रखा जाता है, उनका वर्गीकरण कैसे होता है और संबंधित मामलों को आगे की जांच के लिए किस प्रक्रिया के तहत भेजा जाता है।

असली परीक्षा: आंकड़े कितने मजबूत और प्रक्रिया कितनी पारदर्शी?

किसी भी सरकारी पोर्टल की सफलता केवल उसके लॉन्च होने से तय नहीं होती। असली सवाल यह है कि वहां मिलने वाली सूचनाओं की जांच कैसे होगी, गलत शिकायतों को कैसे अलग किया जाएगा और गंभीर मामलों पर क्या कार्रवाई होगी।

यदि किसी क्षेत्र में आबादी के अनुपात में असामान्य बदलाव दिखाई देता है, तो उसकी तुलना पिछले वर्षों के विश्वसनीय आंकड़ों से की जानी चाहिए। स्थानीय प्रवास, आर्थिक परिस्थितियों, जन्म-दर, प्रशासनिक सीमाओं में बदलाव और आंकड़ों के संकलन की पद्धति जैसे पहलुओं को भी ध्यान में रखना होगा।

इसी तरह अवैध घुसपैठ से संबंधित किसी आरोप की जांच नागरिकता, आव्रजन और अन्य लागू कानूनों के तहत उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही होनी चाहिए। किसी व्यक्ति की भाषा, नाम, पहनावा, धार्मिक पहचान या सामुदायिक संबद्धता को अपराध का प्रमाण मानना न तो वैज्ञानिक तरीका है और न ही न्यायसंगत।

पोर्टल पर उपलब्ध शिकायतों और दस्तावेजों की गोपनीयता, व्यक्तिगत जानकारी की सुरक्षा, शिकायतकर्ता की सुरक्षा तथा दुरुपयोग रोकने के उपाय भी महत्वपूर्ण होंगे। पारदर्शिता का अर्थ केवल अधिक से अधिक शिकायतें प्राप्त करना नहीं, बल्कि उनके निस्तारण की जवाबदेह व्यवस्था विकसित करना भी है।

जनता की भागीदारी बनाम अफवाहों का कारोबार

इस पहल के साथ आम नागरिकों को एक औपचारिक माध्यम उपलब्ध हुआ है, जहां वे संबंधित सूचनाएं साझा कर सकते हैं। लेकिन शिकायत दर्ज करने और आरोप साबित होने के बीच बड़ा अंतर है।

यदि नागरिकों के पास विश्वसनीय दस्तावेज, आधिकारिक आंकड़े या किसी संभावित प्रशासनिक अनियमितता से संबंधित ठोस जानकारी है, तो उसे जिम्मेदारी से प्रस्तुत करना उपयोगी हो सकता है। इसके उलट, बिना प्रमाण किसी समुदाय पर आरोप लगाना या सोशल मीडिया पर अपुष्ट दावों को तथ्य के रूप में फैलाना समस्या को और गंभीर बना सकता है।

समिति के लिए भी यह आवश्यक होगा कि वह शिकायतों की संख्या को किसी निष्कर्ष का विकल्प न बनने दे। हजारों शिकायतें अपने आप में हजारों प्रमाण नहीं होतीं। उनकी विश्वसनीयता, स्वतंत्र पुष्टि और तथ्यात्मक आधार ही किसी निष्कर्ष को मजबूत बना सकते हैं।

निष्कर्ष: संवेदनशील सवालों के जवाब नारे नहीं, प्रमाण देंगे

डेमोग्राफी से संबंधित हाई-लेवल कमेटी का वेब पोर्टल जनभागीदारी और प्रशासनिक सूचनाओं के संकलन का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन सकता है। छह सदस्यीय समिति में न्यायिक, प्रशासनिक, पुलिस, जनगणना और आर्थिक विशेषज्ञता का समावेश इसे व्यापक दृष्टिकोण प्रदान कर सकता है।

लेकिन इस पहल की वास्तविक सफलता किसी खास राजनीतिक दावे को सही साबित करने में नहीं, बल्कि तथ्यों के आधार पर वास्तविक समस्याओं की पहचान करने में होगी। जहां अवैध गतिविधियों के प्रमाण मिलें, वहां कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। जहां बदलाव के पीछे सामान्य सामाजिक या आर्थिक कारण हों, वहां उन्हें उसी रूप में समझा जाना चाहिए।

आखिरकार, देश की सुरक्षा और संविधान के मूल्यों को एक-दूसरे के विरोध में खड़ा करने की जरूरत नहीं है। मजबूत व्यवस्था वही है, जो अवैध गतिविधियों के प्रति कठोर हो, नागरिकों के अधिकारों के प्रति जवाबदेह हो और हर संवेदनशील निष्कर्ष को प्रमाण की कसौटी पर परखे।

यही इस पोर्टल की सबसे बड़ी परीक्षा होगी—शिकायतों का अंबार नहीं, बल्कि तथ्यों से निकले विश्वसनीय निष्कर्ष।

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VIKAS TRIPATHI
VIKAS TRIPATHIhttp://www.pardaphaas.com
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