“नोएडा से ग्रेटर नोएडा और यमुना क्षेत्र तक शहरों का विस्तार तेज, लेकिन गांवों में पानी, जल निकासी और बुनियादी सुविधाओं को लेकर उठ रहे सवाल”
गौतमबुद्ध नगर। कभी खेतों और गांवों के लिए पहचाना जाने वाला गौतमबुद्ध नगर आज देश के प्रमुख शहरी और औद्योगिक केंद्रों में शामिल है। नोएडा की गगनचुंबी इमारतों से लेकर ग्रेटर नोएडा के विस्तृत सेक्टरों और यमुना प्राधिकरण क्षेत्र में विकसित हो रहे बड़े प्रोजेक्टों तक विकास की रफ्तार लगातार बढ़ी है। तीन बड़े विकास प्राधिकरणों ने इस पूरे इलाके की तस्वीर बदल दी है।
लेकिन इस चमकदार तस्वीर के बीच एक सवाल लगातार सामने आता है—क्या जिस रफ्तार से शहर विकसित हुए, उसी रफ्तार से उन गांवों का विकास भी हुआ, जिनकी जमीनों पर इस शहरी विस्तार की नींव रखी गई?
नोएडा प्राधिकरण का गठन 17 अप्रैल 1976 को, ग्रेटर नोएडा औद्योगिक विकास प्राधिकरण का गठन 28 जनवरी 1991 को और यमुना एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण का गठन 24 अप्रैल 2001 को हुआ। इन प्राधिकरणों के गठन के बाद क्षेत्र में नियोजित औद्योगिक, आवासीय, संस्थागत और वाणिज्यिक विकास का विस्तार होता चला गया।
भूमि अधिग्रहण के अलग-अलग चरणों में किसानों ने अपनी जमीनें दीं। बदले में मुआवजा, आबादी भूखंड, रोजगार, पुनर्वास और अन्य सुविधाओं को लेकर समय-समय पर मांगें भी उठती रहीं। कई मामलों में किसानों और प्राधिकरणों के बीच विवाद अदालतों तक पहुंचे।
आज स्थिति यह है कि एक ही भौगोलिक क्षेत्र में आधुनिक सेक्टर और पुराने गांव एक-दूसरे के बिल्कुल करीब दिखाई देते हैं, लेकिन दोनों की सुविधाओं में अंतर को लेकर सवाल उठते हैं।
एक तरफ सेक्टरों की चमक, दूसरी तरफ गांवों की मूलभूत जरूरतें
नोएडा और ग्रेटर नोएडा के सेक्टरों में चौड़ी सड़कें, नियोजित ड्रेनेज, सीवर लाइन, पार्क और जलापूर्ति जैसी सुविधाओं का प्रावधान किया गया है। यमुना प्राधिकरण क्षेत्र भी बड़े औद्योगिक और आवासीय विकास की ओर तेजी से बढ़ रहा है।
इसके बीच पुराने गांवों की जरूरतें अलग तरह की हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में पेयजल, जल निकासी, सड़क, सीवर, स्वच्छता और नियमित नागरिक सेवाएं शामिल हैं। कई जगह ग्रामीणों की शिकायत रही है कि शहर के विस्तार के मुकाबले गांवों में बुनियादी ढांचे का विकास अपेक्षित गति से नहीं हुआ।
हालांकि इन दावों को गांववार सरकारी आंकड़ों के साथ देखना जरूरी है। किसी गांव में पानी की कितनी आपूर्ति हो रही है, कितने परिवारों के पास पाइप से पानी पहुंच रहा है, कितने इलाकों में नाली या सीवर व्यवस्था है और पिछले वर्षों में कितनी परियोजनाएं पूरी हुईं—इन सवालों के जवाब आधिकारिक रिकॉर्ड से ही तस्वीर को पूरी तरह स्पष्ट कर सकते हैं।
नाली का पानी कहां जाए, यह सवाल आज भी अहम
शहरी विकास में जल निकासी सबसे महत्वपूर्ण व्यवस्थाओं में से एक है। सेक्टरों की योजना बनाते समय ड्रेनेज सिस्टम को मास्टर प्लान का हिस्सा बनाया जाता है। लेकिन गांवों में पुरानी आबादी, संकरी गलियां और तेजी से बढ़ते निर्माण जल निकासी को चुनौती देते हैं।
यही कारण है कि कई गांवों में नालियों और जलभराव को लेकर शिकायतें सामने आती रही हैं।
ग्रामीणों की सबसे बड़ी चिंता यह होती है कि बारिश या घरेलू पानी की निकासी का स्थायी रास्ता क्या है। यदि नाली व्यवस्था पर्याप्त नहीं है तो पानी गलियों और खाली प्लॉटों में जमा होता है। इससे केवल आवागमन प्रभावित नहीं होता, बल्कि स्वच्छता और स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं भी पैदा हो सकती हैं।
ऐसे में जरूरत केवल नई नाली बनाने की नहीं, बल्कि गांव के संपूर्ण जल निकासी नेटवर्क की योजना तैयार करने की है।
पानी की पाइपलाइन पहुंची या नहीं, आंकड़ों से तय हो तस्वीर
गौतमबुद्ध नगर जैसे तेजी से विकसित होते जिले में पेयजल का सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है।
ग्रामीण परिवारों तक पाइप से पानी पहुंचाने के लिए केंद्र और राज्य सरकार की विभिन्न योजनाएं संचालित हैं। लेकिन प्राधिकरण क्षेत्र में आने वाले गांवों की स्थिति का मूल्यांकन करते समय यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी विशेष गांव में जलापूर्ति की जिम्मेदारी किस संस्था की है—ग्राम पंचायत, नगर निकाय, प्राधिकरण या कोई अन्य विभाग।
किसी गांव में केवल पाइपलाइन बिछ जाना पर्याप्त नहीं है। वास्तविक सुविधा तब मानी जाएगी जब घर तक नियमित पानी पहुंचे, पानी की गुणवत्ता मानकों के अनुरूप हो और खराबी की स्थिति में शिकायत का समाधान समय पर हो।
इसलिए गांववार जल कनेक्शन, जलापूर्ति के घंटे, पानी के स्रोत और गुणवत्ता परीक्षण का सार्वजनिक डेटा बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।
सदरपुर, छिजारसी और चोटपुर जैसे गांवों की तस्वीर पर निगाह
नोएडा क्षेत्र के सदरपुर, छिजारसी और चोटपुर जैसे गांव शहरी विस्तार और ग्रामीण आबादी के बीच बदलते रिश्ते को समझने के महत्वपूर्ण उदाहरण हो सकते हैं।
इन क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं को लेकर उठने वाली शिकायतों को केवल राजनीतिक बयान या स्थानीय आरोप के रूप में देखने के बजाय तथ्यात्मक रूप से जांचना जरूरी है।
कितने परिवार रहते हैं? कितनों को पाइप से पानी मिलता है? जल निकासी की व्यवस्था कैसी है? कितनी सड़कें पक्की हैं? कितनी शिकायतें मिलीं? कितनी शिकायतों का निस्तारण हुआ? और पिछले तीन वर्षों में संबंधित प्राधिकरण ने कितनी राशि खर्च की?
इन सवालों के जवाब ही बताएंगे कि वास्तविक समस्या कितनी बड़ी है और सरकारी प्रयास किस स्तर तक पहुंचे हैं।
‘अवैध कॉलोनी’ का सवाल भी कम महत्वपूर्ण नहीं
शहरी विस्तार के साथ गांवों के आसपास निर्माण तेजी से बढ़ा है। ऐसे में कई स्थानों पर अनधिकृत निर्माण और कॉलोनियों को लेकर प्राधिकरणों ने कार्रवाई की है।
लेकिन यहां भी पूरी तस्वीर को एक ही रंग में देखना उचित नहीं होगा।
किसी निर्माण को वैध या अवैध मानने के लिए भूमि उपयोग, स्वीकृत नक्शा, लेआउट की अनुमति, भवन नियम और संबंधित प्राधिकरण के रिकॉर्ड को देखना जरूरी है।
ग्रामीण पक्ष की ओर से लंबे समय से आबादी क्षेत्र, नियमितीकरण और गांवों के पारंपरिक विस्तार से जुड़े सवाल उठते रहे हैं। दूसरी ओर प्राधिकरण नियोजित विकास और भूमि उपयोग नियमों को लागू करने की जिम्मेदारी का हवाला देते हैं।
इसलिए इस मुद्दे का स्थायी समाधान टकराव में नहीं, बल्कि स्पष्ट भूमि नीति और पारदर्शी रिकॉर्ड में दिखाई देता है।
किसानों का सवाल सिर्फ मुआवजे तक सीमित नहीं
भूमि अधिग्रहण के मामलों में किसानों की सबसे बड़ी मांग अक्सर केवल मुआवजे तक सीमित नहीं रही। आबादी भूखंड, रोजगार, पुनर्वास और विकसित क्षेत्र में हिस्सेदारी जैसे मुद्दे भी अलग-अलग समय पर सामने आते रहे हैं।
यही वजह है कि किसानों के योगदान का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि उन्हें कितना मुआवजा मिला।
किसान की जमीन चली जाने के बाद उसके परिवार की सामाजिक और आर्थिक संरचना भी बदलती है। खेती से मिलने वाली नियमित आय समाप्त होती है और नई अर्थव्यवस्था में स्थान बनाने की चुनौती सामने आती है।
ऐसे में विकास परियोजनाओं से प्रभावित परिवारों के लिए पुनर्वास और दीर्घकालिक आर्थिक अवसरों का महत्व बढ़ जाता है।
अब गांवों तक पहुंचने की कोशिश
प्राधिकरणों की ओर से गांवों में सुविधाएं पहुंचाने और शिकायतों के समाधान के लिए अलग-अलग प्रयास किए जा रहे हैं। ‘प्राधिकरण आपके द्वार’ जैसी पहल इसी दिशा में महत्वपूर्ण हो सकती है, जहां लोगों तक पहुंचकर उनकी समस्याओं और कनेक्शन संबंधी मामलों को सुलझाने का प्रयास किया जाता है।
लेकिन किसी भी पहल की सफलता का वास्तविक पैमाना उसके परिणाम होंगे।
कितने गांवों में शिविर लगे? कितने आवेदन आए? कितने पानी के कनेक्शन जारी हुए? कितनी शिकायतें निस्तारित हुईं? कितने मामले अभी लंबित हैं?
यदि इन सवालों के आंकड़े सार्वजनिक किए जाएं तो जनता भी विकास कार्यों की वास्तविक स्थिति को समझ सकेगी।
अब विकास की अगली परीक्षा गांवों में
गौतमबुद्ध नगर के लिए अब विकास की अगली चुनौती केवल नए सेक्टर, औद्योगिक इकाइयां या बड़ी परियोजनाएं खड़ी करना नहीं है। चुनौती यह भी है कि पुराने गांवों को आधुनिक बुनियादी सुविधाओं से जोड़ा जाए।
नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट, औद्योगिक कॉरिडोर, नई सड़कें और बड़े निवेश क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को बदल रहे हैं। लेकिन इस बदलाव का लाभ आसपास रहने वाली ग्रामीण आबादी तक भी पहुंचना चाहिए।
इसके लिए गांववार विकास योजना की जरूरत है—जिसमें पेयजल, सीवर, नाली, सड़क, स्ट्रीट लाइट, स्वच्छता और स्वास्थ्य जैसी सुविधाओं की स्पष्ट समयसीमा तय हो।
शहरों की ऊंचाई से नहीं, गांवों की सुविधा से मापना होगा विकास
गौतमबुद्ध नगर की विकास यात्रा निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है। लेकिन किसी भी विकास मॉडल की सफलता केवल ऊंची इमारतों, चौड़ी सड़कों और बड़े निवेश से तय नहीं होती।
उसकी असली परीक्षा वहां होती है जहां शहर खत्म होता है और गांव शुरू होता है।
जिस जमीन ने आधुनिक शहरों के विस्तार में योगदान दिया, उस जमीन के मूल गांवों तक भी विकास की बुनियादी सुविधाएं पहुंचनी चाहिए।
इसके लिए भावनात्मक नारों से अधिक जरूरी है—आंकड़े, पारदर्शिता और जवाबदेही।
हर गांव का सार्वजनिक विकास रिपोर्ट कार्ड बने। पानी के कितने कनेक्शन हैं, कितनी सड़कें बनीं, कितनी नालियां बनीं, कितनी शिकायतें आईं और कितनी दूर हुईं—इसका हिसाब जनता के सामने हो।
तभी यह स्पष्ट हो सकेगा कि शहरों की चमक के साथ गांवों की जिंदगी भी बदली है या नहीं।
क्योंकि विकास की सबसे बड़ी तस्वीर उस दिन पूरी होगी, जब सेक्टरों की रोशनी के साथ गांवों की गलियां भी मूलभूत सुविधाओं से रोशन होंगी।














