“₹22 हजार करोड़ के कर्ज पर 99.97% हेयरकट का मुद्दा गरमाया, कांग्रेस ने पूछा—जनता के पैसे की जवाबदेही कौन तय करेगा?”
नई दिल्ली: लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) के जरिए हजारों करोड़ रुपये के कर्ज के बड़े हिस्से के सेटलमेंट को लेकर केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि मोदी सरकार के शासन में देश में दो अलग-अलग आर्थिक व्यवस्थाएं बन गई हैं—एक मुट्ठी भर बड़े उद्योगपतियों के लिए और दूसरी आम नागरिकों, किसानों, कर्मचारियों और छात्रों के लिए।
राहुल गांधी ने गुरुवार को सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए सवाल उठाते हुए कहा कि जब कोई किसान महज 50 हजार रुपये का कर्ज नहीं चुका पाता, तो उसकी जमीन नीलाम होने की नौबत आ जाती है। नौकरीपेशा व्यक्ति की एक EMI छूटने पर बैंक की कार्रवाई शुरू हो जाती है, लेकिन बड़े कॉरपोरेट कर्जदारों के मामले में हजारों करोड़ रुपये के कर्ज का बेहद मामूली रकम में निपटारा कर दिया जाता है।
₹22,000 करोड़ का कर्ज, सिर्फ ₹6.5 करोड़ में सेटलमेंट का दावा
विवाद का केंद्र NCLT से जुड़ा वह मामला है, जिसमें करीब 22,000 करोड़ रुपये के डिफॉल्ट लोन का 99.97 प्रतिशत हिस्सा कथित तौर पर हेयरकट के बाद महज 6.5 करोड़ रुपये में सेटल किए जाने की बात सामने आई है। इसी मामले को लेकर राहुल गांधी ने इसे जनता के पैसे की “पूरी लूट” करार देते हुए सरकार से जवाब मांगा है।
राहुल गांधी का कहना है कि बैंक और वित्तीय संस्थान आम आदमी के साथ कर्ज वसूली में बेहद सख्त रवैया अपनाते हैं। किसान की जमीन, नौकरीपेशा व्यक्ति की संपत्ति और छोटे कारोबारियों की मुश्किलों का जिक्र करते हुए उन्होंने सवाल किया कि बड़े उद्योगपतियों के मामले में नियमों का व्यवहार अलग क्यों दिखाई देता है।
उनके आरोप का मूल सवाल यही है कि अगर बैंकों का पैसा जनता की जमा पूंजी से जुड़ा है, तो हजारों करोड़ रुपये के कर्ज को बेहद कम रकम में निपटाने की अनुमति देने पर इसकी जिम्मेदारी किसकी है?
“NCLT नहीं, नेता-कंपनी लूट ट्रिब्यूनल”
राहुल गांधी ने अपने हमले को और धार देते हुए NCLT को व्यंग्यात्मक अंदाज में “नेता-कंपनी लूट ट्रिब्यूनल” तक कह दिया। उनका आरोप है कि मौजूदा व्यवस्था में आर्थिक नियमों का असर आम नागरिक पर कठोर और बड़े कारोबारी समूहों पर अपेक्षाकृत नरम दिखाई देता है।
उन्होंने कहा कि गरीब और मध्यम वर्ग के लिए बैंक का कर्ज चुकाना जीवन की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक हो सकता है। किसान कर्ज न चुका पाए तो जमीन पर संकट आता है, कर्मचारी EMI न दे पाए तो बैंक का दबाव बढ़ता है और गरीब छात्रों को उच्च शिक्षा के लिए लोन हासिल करना भी मुश्किल होता है।
इसके उलट, राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि कुछ “खास दोस्तों” के लिए बैंक का पैसा ऐसे इस्तेमाल होता है, जैसे वह उनकी निजी संपत्ति हो—जितना चाहें पैसा लें और बाद में जितना चाहें उतना चुकाएं।
NCLT – “नेता-कंपनी लूट ट्रिब्यूनल”
किसान 50 हज़ार न चुकाए तो ज़मीन नीलाम हो जाती है। Salaried एक EMI न भर पाएं तो घर पर बैंक के गुंडे पहुंच जाते हैं। गरीब छात्रों को तो शिक्षा तक के लिए लोन नहीं मिलता।
मगर, चुनिंदा “मित्रों” के लिए बैंक का पैसा निजी संपत्ति है – कितना भी… https://t.co/hFjtqdUimv
— Rahul Gandhi (@RahulGandhi) August 27, 2026
जयराम रमेश बोले—यह हेयरकट नहीं, “मुंडन” है
कांग्रेस के महासचिव और संचार प्रभारी जयराम रमेश ने भी इस मुद्दे पर सरकार और NCLT की प्रक्रिया पर सवाल उठाए। उन्होंने बैंकिंग व्यवस्था में इस्तेमाल होने वाले शब्द “हेयरकट” पर कटाक्ष करते हुए कहा कि यह केवल हेयरकट नहीं है, बल्कि वास्तव में “मुंडन” है।
जयराम रमेश का कहना है कि अगर किसी कंपनी के कर्ज में इतनी बड़ी कटौती कर दी जाती है, तो इससे इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC), 2016 की प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
कांग्रेस का तर्क है कि दिवाला समाधान प्रक्रिया का उद्देश्य यह होना चाहिए कि संकटग्रस्त कंपनियों की परिसंपत्तियों का अधिकतम मूल्य बचाया जाए और बैंकों तथा वित्तीय संस्थानों को संभवतः अधिक से अधिक रकम वापस मिल सके। लेकिन यदि हजारों करोड़ रुपये के दावे के सामने बेहद छोटी रकम में समझौता हो, तो स्वाभाविक रूप से प्रक्रिया की पारदर्शिता और निर्णय के आधार पर सवाल उठेंगे।
कांग्रेस ने मांगा 12 साल का पूरा हिसाब
कांग्रेस महासचिव और राज्यसभा सांसद रणदीप सिंह सुरजेवाला ने केंद्र सरकार से पिछले 12 वर्षों का पूरा आंकड़ा सार्वजनिक करने की मांग की है। उनका सवाल है कि NCLT के जरिए अब तक कितने लाख करोड़ रुपये के कर्ज पर हेयरकट दिया गया और बैंकों को वास्तव में कितनी रकम वापस मिली।
सुरजेवाला ने दावा किया कि हेयरकट के नाम पर बैंकों और जनता के पैसे का बड़ा नुकसान हो सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि यह आंकड़ा 10 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो सकता है। हालांकि यह उनका राजनीतिक दावा है और इसकी स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि आवश्यक है।
उन्होंने सवाल उठाया कि यदि किसी मामले में 50, 60, 70, 80, 90 और अब 99 प्रतिशत तक कर्ज में कटौती की जा सकती है, तो फिर NCLT की पूरी प्रक्रिया और उसके परिणामों की समीक्षा क्यों न की जाए?
कांग्रेस के मुताबिक, यह केवल किसी एक कंपनी या एक मामले का सवाल नहीं है, बल्कि पूरे बैंकिंग और दिवाला समाधान तंत्र में जनता के पैसे की सुरक्षा से जुड़ा विषय है।
आम आदमी बनाम बड़े कर्जदार—कांग्रेस ने खींची तस्वीर
राहुल गांधी के बयान का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश आम आदमी और बड़े कर्जदारों के बीच कथित असमानता को लेकर है। उन्होंने किसानों, नौकरीपेशा लोगों और छात्रों के उदाहरण देकर यह बताने की कोशिश की कि छोटे कर्जदारों के लिए बैंकिंग व्यवस्था कितनी कठोर हो सकती है।
किसान की फसल खराब होने पर भी कर्ज की किस्त चुकाने का दबाव बना रहता है। नौकरी जाने या आय घटने पर EMI का बोझ बढ़ जाता है। छोटे कारोबारियों के लिए बैंक ऋण की एक किस्त में देरी भी उनके कारोबार को संकट में डाल सकती है। ऐसे में जब हजारों करोड़ रुपये के कॉरपोरेट कर्ज में भारी कटौती की खबर सामने आती है, तो आम लोगों के बीच असमानता का सवाल उठना स्वाभाविक है।
सवाल सिर्फ एक सेटलमेंट का नहीं, व्यवस्था की विश्वसनीयता का
NCLT मामलों में कर्ज का हेयरकट अपने आप में असामान्य नहीं है। दिवाला समाधान प्रक्रिया के तहत यदि कोई कंपनी गंभीर वित्तीय संकट में हो, तो लेनदारों को अपनी पूरी रकम वापस न मिलने की स्थिति में समझौता करना पड़ सकता है। लेकिन राजनीतिक विवाद तब गहराता है, जब कर्ज और सेटलमेंट राशि के बीच अंतर बेहद बड़ा हो।
यही वजह है कि इस मामले ने बैंकिंग व्यवस्था, NCLT की भूमिका और IBC के तहत होने वाले समाधान पर बहस तेज कर दी है।
सरकार और संबंधित संस्थाओं का पक्ष इस मामले में उतना ही महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि किसी भी हेयरकट के पीछे कंपनी की वास्तविक परिसंपत्तियां, बोली प्रक्रिया, लेनदारों का निर्णय, कानूनी प्रक्रिया और रिकवरी की संभावनाएं जैसे कई पहलू होते हैं। केवल रकम के अंतर के आधार पर पूरी प्रक्रिया को अवैध या भ्रष्ट कहना तथ्यात्मक जांच के बिना उचित नहीं होगा।
राजनीतिक मुद्दा बना NCLT
विपक्ष ने इस पूरे विवाद को अब व्यापक राजनीतिक मुद्दे में बदल दिया है। राहुल गांधी का हमला सीधे मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों और कथित “क्रोनी कैपिटलिज्म” के आरोपों से जुड़ता है। कांग्रेस का कहना है कि जनता और बैंकों के पैसे की कीमत पर बड़े उद्योगपतियों को राहत नहीं दी जानी चाहिए।
वहीं, सरकार और संबंधित संस्थाओं की ओर से यदि यह स्पष्ट किया जाता है कि संबंधित सेटलमेंट किस कानूनी प्रक्रिया के तहत हुआ, लेनदारों ने इसे क्यों स्वीकार किया और बैंकों को इससे कितना वास्तविक लाभ या नुकसान हुआ, तो विवाद के तथ्य सामने आ सकते हैं।
फिलहाल राजनीतिक बहस का केंद्र एक सीधा सवाल बन गया है—अगर आम आदमी के कुछ हजार रुपये के कर्ज की वसूली के लिए बैंक सख्ती बरतते हैं, तो हजारों करोड़ रुपये के कॉरपोरेट कर्ज में इतनी बड़ी कटौती आखिर किन परिस्थितियों में और किसके हित में होती है?
राहुल गांधी और कांग्रेस ने इस सवाल का जवाब सार्वजनिक करने की मांग तेज कर दी है। अब निगाहें सरकार, बैंकिंग संस्थानों और NCLT से जुड़े आधिकारिक आंकड़ों पर हैं। क्योंकि मामला केवल 22 हजार करोड़ रुपये का नहीं, बल्कि उस भरोसे का है जिस पर देश की बैंकिंग व्यवस्था और करोड़ों जमाकर्ताओं का विश्वास टिका है।














