नई दिल्ली। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने हाल ही में प्रयागराज में छात्रों को संबोधित करते हुए सोशल मीडिया रील्स को “21वीं सदी का नशा” बताया। उन्होंने कहा कि युवाओं को रोजगार, शिक्षा और कौशल विकास जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों से भटकाकर रील्स देखने और बनाने में उलझाया जा रहा है। राहुल गांधी का यह बयान राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया। लेकिन उनके इस बयान के साथ ही एक बड़ा सवाल भी खड़ा हो गया है—क्या रील्स का आकर्षण सिर्फ युवाओं तक सीमित है या देश की राजनीति भी इसकी गिरफ्त में आ चुकी है?
दिलचस्प तथ्य यह है कि जिस दौर में राहुल गांधी रील्स को लेकर चिंता जता रहे हैं, उसी दौर में संसद परिसर से कई सांसदों के रील्स और वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं। इनमें सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के नेता शामिल हैं। संसद की कार्यवाही के बीच, लंच ब्रेक के दौरान या सत्र समाप्त होने के बाद सांसदों द्वारा बनाए गए वीडियो लाखों लोगों तक पहुंच रहे हैं। इससे एक नई बहस शुरू हो गई है कि क्या संसद परिसर अब लोकतांत्रिक विमर्श के साथ-साथ सोशल मीडिया कंटेंट का भी मंच बनता जा रहा है?
रील्स का बढ़ता प्रभाव और राजनीति की नई भाषा
पिछले कुछ वर्षों में सोशल मीडिया ने राजनीति की शैली को पूरी तरह बदल दिया है। पहले नेता जनसभाओं, प्रेस कॉन्फ्रेंस और टीवी इंटरव्यू के जरिए जनता तक अपनी बात पहुंचाते थे, लेकिन अब इंस्टाग्राम, फेसबुक, यूट्यूब और एक्स जैसे प्लेटफॉर्म राजनीतिक संचार के प्रमुख माध्यम बन चुके हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि आज का मतदाता, विशेषकर युवा वर्ग, लंबे भाषणों की बजाय छोटे वीडियो और विजुअल कंटेंट को अधिक पसंद करता है। यही कारण है कि राजनीतिक दल और उनके नेता डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपनी मौजूदगी बढ़ाने के लिए लगातार नए प्रयोग कर रहे हैं। रील्स और शॉर्ट वीडियो इसी रणनीति का हिस्सा बन गए हैं।
हालांकि राहुल गांधी ने अपने संबोधन में कहा कि युवाओं को केवल मनोरंजन में उलझाकर देश का भविष्य नहीं बनाया जा सकता। उनके अनुसार, देश के सामने रोजगार, शिक्षा, तकनीक और आर्थिक विकास जैसी गंभीर चुनौतियां हैं, जिन पर युवाओं का ध्यान केंद्रित होना चाहिए।
संसद परिसर में बन रहे वीडियो
मानसून सत्र के दौरान संसद परिसर से कई ऐसे वीडियो सामने आए जिन्होंने सोशल मीडिया पर खूब सुर्खियां बटोरीं। संसद भवन, उसके गलियारे, लॉन और अन्य हिस्से वीडियो कंटेंट के बैकग्राउंड के रूप में इस्तेमाल किए गए।
कई सांसदों ने संसद परिसर की भव्यता, मानसून के मौसम और अपने संसदीय अनुभवों को रील्स के जरिए साझा किया। इन वीडियो को लाखों व्यूज मिले और हजारों लोगों ने उन पर प्रतिक्रिया दी। समर्थकों ने इसे जनता से जुड़ने का आधुनिक तरीका बताया, जबकि आलोचकों ने इसे संसद की गंभीरता के विपरीत करार दिया।
सायनी घोष की रील बनी चर्चा का विषय
इस बहस के केंद्र में सबसे ज्यादा चर्चा पश्चिम बंगाल की सांसद और अभिनेत्री सायनी घोष की रही। उन्होंने संसद परिसर में बारिश के दौरान एक मॉनसून-थीम रील बनाई और उसे इंस्टाग्राम पर साझा किया। वीडियो में वह बारिश का आनंद लेती दिखाई दीं और उसके साथ एक लोकप्रिय शायरी भी लिखी गई।
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वीडियो पोस्ट होते ही तेजी से वायरल हो गया। लाखों लोगों ने इसे देखा और साझा किया। हालांकि जहां एक वर्ग ने इसे सहज और रचनात्मक अभिव्यक्ति बताया, वहीं दूसरे वर्ग ने इसकी आलोचना की। आलोचकों का कहना था कि जब संसद में कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर गतिरोध चल रहा था, तब जनप्रतिनिधियों को सोशल मीडिया कंटेंट बनाने के बजाय जनता के मुद्दों पर अधिक ध्यान देना चाहिए था।
सायनी घोष को सोशल मीडिया पर तीखी टिप्पणियों का सामना करना पड़ा। कई यूजर्स ने सवाल उठाया कि क्या संसद परिसर मनोरंजन के लिए है या गंभीर लोकतांत्रिक जिम्मेदारियों के निर्वहन के लिए।
जब संसद में चल रहा था गतिरोध
सायनी घोष की रील ऐसे समय सामने आई जब संसद में कई मुद्दों को लेकर विपक्ष और सरकार के बीच टकराव चल रहा था। विभिन्न परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों, शिक्षा से जुड़े प्रश्नों और अन्य राजनीतिक मुद्दों को लेकर लगातार हंगामा हो रहा था। कई दिनों तक सदन की कार्यवाही प्रभावित रही।
ऐसे माहौल में सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो ने राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया। विपक्षी दलों के समर्थकों और विरोधियों के बीच भी इस मुद्दे पर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं।
महुआ मोइत्रा और अन्य सांसद भी सक्रिय
सायनी घोष अकेली सांसद नहीं हैं जो सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं। पश्चिम बंगाल की चर्चित सांसद महुआ मोइत्रा भी नियमित रूप से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अपनी गतिविधियां साझा करती रही हैं। उन्होंने भी संसद परिसर से वीडियो और रील्स पोस्ट किए, जिन्हें बड़ी संख्या में लोगों ने देखा।
महुआ मोइत्रा का तर्क रहा है कि सोशल मीडिया जनता से सीधा संवाद स्थापित करने का माध्यम है। उनके समर्थकों का कहना है कि लोकतंत्र में जनता और जनप्रतिनिधियों के बीच संवाद जितना मजबूत होगा, उतना ही लोकतांत्रिक व्यवस्था को लाभ मिलेगा।
राघव चड्ढा के वीडियो भी रहे वायरल
युवा नेताओं में राघव चड्ढा सोशल मीडिया पर काफी लोकप्रिय माने जाते हैं। संसद परिसर में उनके द्वारा बनाए गए वीडियो भी कई बार वायरल हो चुके हैं। उनके वीडियो की प्रस्तुति और तकनीकी गुणवत्ता को लेकर भी चर्चा होती रही है।
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राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि युवा नेता डिजिटल प्लेटफॉर्म को अपनी राजनीतिक पहचान मजबूत करने के साधन के रूप में देख रहे हैं। यही कारण है कि वे सोशल मीडिया पर लगातार सक्रिय रहते हैं।
कांग्रेस सांसद भी पीछे नहीं
दिलचस्प बात यह है कि सोशल मीडिया पर सक्रिय नेताओं की सूची में केवल अन्य दलों के सांसद ही नहीं, बल्कि कांग्रेस के नेता भी शामिल हैं। कांग्रेस सांसद इमरान प्रतापगढ़ी नियमित रूप से अपने वीडियो और संदेश सोशल मीडिया पर साझा करते रहते हैं।
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संसद के मानसून सत्र के दौरान उन्होंने भी संसद परिसर में रिकॉर्ड किया गया एक वीडियो पोस्ट किया था। इससे यह स्पष्ट होता है कि रील्स और शॉर्ट वीडियो का उपयोग अब लगभग सभी राजनीतिक दलों के नेताओं द्वारा किया जा रहा है।
रवि किशन और डिजिटल राजनीति का चेहरा
भाजपा सांसद और अभिनेता रवि किशन भी सोशल मीडिया पर काफी सक्रिय हैं। उनके वीडियो और पोस्ट अक्सर चर्चा में रहते हैं। संसद परिसर से साझा किए गए उनके वीडियो को भी बड़ी संख्या में लोगों ने देखा है।
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रवि किशन जैसे नेताओं का मानना है कि सोशल मीडिया के माध्यम से जनता तक सीधे पहुंचना आसान हो गया है। इससे पारंपरिक मीडिया पर निर्भरता कम होती है और संदेश बिना किसी मध्यस्थ के लोगों तक पहुंच जाता है।
क्या संसद की गरिमा प्रभावित हो रही है?
रील्स को लेकर सबसे बड़ा सवाल संसद की गरिमा का है। आलोचकों का कहना है कि संसद देश का सर्वोच्च लोकतांत्रिक मंच है, जहां कानून बनते हैं और राष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा होती है। ऐसे में वहां मनोरंजन शैली के वीडियो बनाना उचित नहीं माना जा सकता।
दूसरी ओर, समर्थकों का कहना है कि समय बदल चुका है और जनप्रतिनिधियों को आधुनिक माध्यमों का उपयोग करने का अधिकार है। यदि सांसद संसद परिसर से अपने अनुभव साझा करते हैं और इससे जनता लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के प्रति अधिक जागरूक होती है, तो इसमें कोई बुराई नहीं है।
सोशल मीडिया के युग में राजनीति का बदलता चेहरा
विशेषज्ञों के अनुसार राजनीति अब केवल भाषणों और रैलियों तक सीमित नहीं रही। डिजिटल प्लेटफॉर्म ने नेताओं को नया मंच दिया है, जहां वे अपनी छवि बना सकते हैं, समर्थकों से जुड़ सकते हैं और अपने विचारों को तेजी से प्रसारित कर सकते हैं।
यही कारण है कि आज लगभग हर प्रमुख नेता सोशल मीडिया टीम के साथ काम करता है। कंटेंट निर्माण, वीडियो एडिटिंग और डिजिटल रणनीति अब चुनावी राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं।
बहस अभी जारी है
राहुल गांधी के रील्स संबंधी बयान और संसद परिसर में वायरल हो रहे सांसदों के वीडियो ने एक महत्वपूर्ण बहस को जन्म दिया है। एक ओर यह चिंता है कि कहीं सोशल मीडिया की चमक गंभीर मुद्दों को पीछे न धकेल दे, वहीं दूसरी ओर यह भी सच है कि डिजिटल माध्यम आज के दौर की सबसे प्रभावशाली संचार शक्ति बन चुके हैं।
ऐसे में सवाल केवल रील्स का नहीं, बल्कि उस बदलती राजनीतिक संस्कृति का है जिसमें नेता और जनता दोनों तेजी से डिजिटल दुनिया की ओर बढ़ रहे हैं। आने वाले समय में यह बहस और गहरी हो सकती है कि रील्स वास्तव में “21वीं सदी का नशा” हैं या लोकतंत्र और जनसंपर्क का नया और प्रभावशाली माध्यम।














