“टीएमसी छोड़कर एनसीपीआई में शामिल हुए 20 सांसदों में तीन मुस्लिम चेहरे रहे नदारद, बंगाल की राजनीति में नए समीकरणों पर चर्चा तेज”
कोलकाता/नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में हुई बड़ी टूट ने राज्य की राजनीति को नई दिशा दे दी है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ बगावत करते हुए 20 सांसदों ने पार्टी छोड़कर एनसीपीआई में विलय का ऐलान किया था और खुद को राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का सहयोगी बताया था। हालांकि अब इस नए राजनीतिक प्रयोग के भीतर भी मतभेदों की आहट सुनाई देने लगी है। एनडीए की हालिया बैठक में एनसीपीआई के अधिकांश सांसदों की मौजूदगी के बीच तीन मुस्लिम सांसदों—अबू ताहिर, खलीलुर रहमान और यूसुफ पठान—की अनुपस्थिति ने सियासी गलियारों में कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह गैरहाजिरी महज संयोग नहीं भी हो सकती। ऐसे समय में जब एनसीपीआई और भाजपा के बीच रिश्तों को लेकर लगातार अटकलें लग रही हैं, तीन मुस्लिम सांसदों का बैठक से दूर रहना बंगाल की राजनीति में संभावित नए घटनाक्रमों का संकेत माना जा रहा है।
टीएमसी से अलग होकर बना नया राजनीतिक मोर्चा
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद टीएमसी के भीतर लंबे समय से चल रही असंतोष की राजनीति खुलकर सामने आई। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और सांसदों के एक बड़े समूह ने नेतृत्व शैली और संगठनात्मक फैसलों को लेकर नाराजगी जाहिर की। इसके बाद 20 सांसदों ने सामूहिक रूप से टीएमसी से अलग होकर एनसीपीआई में शामिल होने की घोषणा कर दी।
इस समूह में काकोली घोष दस्तीदार, सुदीप बंद्योपाध्याय, शताब्दी रॉय और सयानी घोष जैसे प्रमुख चेहरे शामिल हैं। इन सांसदों ने दावा किया कि वे संसद और राष्ट्रीय राजनीति में एनडीए के सहयोगी दल के रूप में कार्य करेंगे। साथ ही लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से एनसीपीआई को अलग संसदीय दल के रूप में मान्यता देने की मांग भी की गई।
हालांकि अभी तक स्पीकर की ओर से इस संबंध में कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया है, लेकिन इसके बावजूद इन सांसदों की राजनीतिक सक्रियता लगातार बनी हुई है।
एनडीए बैठक में मिली अहमियत
बीते दिनों आयोजित एनडीए की बैठक में एनसीपीआई के सांसदों को आमंत्रित किया गया। यह कदम अपने आप में राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना गया क्योंकि पार्टी को अभी तक संसद में आधिकारिक मान्यता प्राप्त नहीं हुई है।
बैठक में शामिल होकर बाहर निकलने के बाद काकोली घोष दस्तीदार और अन्य नेताओं ने दावा किया कि प्रधानमंत्री ने उन्हें एनडीए के सहयोगी दल के प्रतिनिधियों के रूप में सभी नेताओं से परिचित कराया। इससे यह संदेश गया कि केंद्र की राजनीति में एनसीपीआई को गंभीरता से लिया जा रहा है।
यही वजह है कि विपक्षी दलों और विशेष रूप से टीएमसी ने इस पर सवाल उठाए। उनका कहना था कि जिस समूह को अभी तक संसदीय मान्यता नहीं मिली है, उसे एनडीए की आधिकारिक बैठक में बुलाना राजनीतिक संदेश देने की कोशिश है।
तीन मुस्लिम सांसदों की गैरहाजिरी बनी चर्चा का विषय
एनडीए बैठक की सबसे बड़ी चर्चा उन तीन सांसदों की अनुपस्थिति रही जो एनसीपीआई के गठन के समय प्रमुख चेहरों में शामिल थे। अबू ताहिर, खलीलुर रहमान और यूसुफ पठान बैठक में नहीं पहुंचे, जबकि सूत्रों के अनुसार वे उस समय दिल्ली में मौजूद थे।
यही तथ्य राजनीतिक अटकलों को और बल देता है। यदि सांसद दिल्ली में थे तो उन्होंने बैठक में हिस्सा क्यों नहीं लिया? क्या यह व्यक्तिगत व्यस्तता थी, कोई रणनीतिक निर्णय था या फिर राजनीतिक असहमति का संकेत?
फिलहाल तीनों सांसदों या उनके करीबी सूत्रों की ओर से कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है। लेकिन उनकी गैरमौजूदगी को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है।
क्या भाजपा से बढ़ती नजदीकियां बनीं वजह?
राजनीतिक हलकों में एक चर्चा यह भी है कि एनसीपीआई भविष्य में भाजपा के साथ और गहरे राजनीतिक संबंध बना सकती है। कुछ सूत्रों का दावा है कि पार्टी के भीतर भाजपा में पूर्ण विलय की संभावनाओं पर भी अनौपचारिक स्तर पर चर्चा हो रही है।
यदि ऐसा होता है तो मुस्लिम बहुल क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले सांसदों के सामने राजनीतिक चुनौती खड़ी हो सकती है। बंगाल के कई निर्वाचन क्षेत्रों में मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं। ऐसे में भाजपा से खुली नजदीकी उनके लिए राजनीतिक रूप से जोखिम भरा कदम साबित हो सकती है।
विश्लेषकों का मानना है कि इसी कारण तीनों मुस्लिम सांसद किसी भी ऐसे मंच से दूरी बनाना चाह रहे हों, जिसे भाजपा के साथ पूर्ण राजनीतिक एकीकरण की दिशा में कदम माना जाए।
वापसी की अटकलों को भी मिला बल
तीनों सांसदों की गैरहाजिरी के बाद यह चर्चा भी शुरू हो गई है कि क्या वे भविष्य में फिर से तृणमूल कांग्रेस की ओर लौट सकते हैं।
टीएमसी नेतृत्व की ओर से इस विषय पर कोई सार्वजनिक बयान नहीं आया है, लेकिन पार्टी के भीतर ऐसे नेताओं की कमी नहीं है जो मानते हैं कि बागी सांसदों के लिए वापसी के रास्ते पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं। यदि राजनीतिक परिस्थितियां बदलती हैं तो कुछ सांसद पुनर्विचार कर सकते हैं।
हालांकि यह भी सच है कि अभी तक किसी सांसद ने टीएमसी में लौटने की इच्छा जाहिर नहीं की है। इसलिए इस तरह की चर्चाओं को फिलहाल राजनीतिक अटकलों से ज्यादा नहीं माना जा सकता।
बंगाल के मुस्लिम वोट बैंक पर नजर
पश्चिम बंगाल की राजनीति में मुस्लिम मतदाता हमेशा से निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं। राज्य के कई जिलों—मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर दिनाजपुर और दक्षिण 24 परगना—में मुस्लिम आबादी चुनावी परिणामों को प्रभावित करती है।
अबू ताहिर और खलीलुर रहमान जैसे नेताओं का राजनीतिक आधार भी इन्हीं क्षेत्रों में माना जाता है। ऐसे में उनके हर राजनीतिक कदम का सीधा असर उनके जनाधार पर पड़ सकता है।
राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि यदि एनसीपीआई की राजनीति भाजपा समर्थक छवि के साथ आगे बढ़ती है तो मुस्लिम सांसदों को अपने क्षेत्रीय समीकरणों को ध्यान में रखते हुए बेहद सावधानी से कदम उठाने होंगे।
टीएमसी के लिए भी राहत नहीं
हालांकि तीन सांसदों की गैरहाजिरी ने एनसीपीआई के भीतर संभावित मतभेदों की चर्चा शुरू कर दी है, लेकिन इससे टीएमसी को तत्काल राहत मिलती दिखाई नहीं देती। पार्टी पहले ही 20 सांसदों के अलग होने से बड़ा राजनीतिक झटका झेल चुकी है।
ममता बनर्जी के सामने अब चुनौती सिर्फ बागियों का मुकाबला करने की नहीं, बल्कि संगठन को फिर से एकजुट रखने की भी है। यदि एनसीपीआई अपने सांसदों को साथ रखने में सफल रहती है तो यह टीएमसी के लिए आने वाले समय में बड़ी राजनीतिक चुनौती बन सकती है।
आगे क्या होगा?
फिलहाल तीनों मुस्लिम सांसदों की गैरहाजिरी को लेकर कोई आधिकारिक कारण सामने नहीं आया है। लेकिन राजनीति में अक्सर अनुपस्थिति भी उतना ही बड़ा संदेश देती है जितना किसी मंच पर मौजूद रहना।
एनडीए बैठक से दूरी ने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि क्या एनसीपीआई के भीतर सभी नेता एक जैसी राजनीतिक दिशा पर सहमत हैं या फिर पार्टी के अंदर भी अलग-अलग विचारधारात्मक धाराएं मौजूद हैं।
आने वाले दिनों में यदि इन सांसदों की ओर से कोई बयान आता है या एनसीपीआई और भाजपा के रिश्तों को लेकर कोई नया घटनाक्रम सामने आता है, तो बंगाल की राजनीति में एक और बड़ा मोड़ देखने को मिल सकता है। फिलहाल इतना तय है कि तीन मुस्लिम सांसदों की गैरमौजूदगी ने ममता बनर्जी के खिलाफ खड़ी हुई बगावत की कहानी में नया रहस्य और नई राजनीतिक जिज्ञासा जोड़ दी है।














