“दिल्ली पुलिस की रिपोर्ट से मचा सियासी और कानूनी भूचाल; CJP ने FIR वापस न होने पर फिर आंदोलन की चेतावनी दी, सरकार और विपक्ष आमने-सामने”
नई दिल्ली: पेपर लीक के मुद्दे पर 37 दिनों तक चले आंदोलन के बाद अब राजधानी की राजनीति एक नए विवाद के केंद्र में आ गई है। दिल्ली पुलिस की जांच में सामने आए तथ्यों ने पूरे घटनाक्रम को नया मोड़ दे दिया है। पुलिस का दावा है कि 20 जुलाई को आयोजित ‘संसद चलो’ मार्च के दौरान हिंसा, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और पुलिस पर हमले के मामलों की जांच में जिन 2,873 प्रदर्शनकारियों की पहचान की गई, उनमें से 989 लोगों का आपराधिक इतिहास सामने आया है।
पुलिस अधिकारियों के अनुसार इन लोगों के खिलाफ हत्या, डकैती, लूट, अपहरण, यौन अपराध, आर्म्स एक्ट और एनडीपीएस एक्ट जैसे गंभीर मामलों में पहले से मुकदमे दर्ज हैं। दूसरी ओर आंदोलन का नेतृत्व करने वाली ‘कॉकरोच जनता पार्टी (CJP)’ ने इन दावों पर सवाल उठाते हुए कहा है कि सरकार ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मामलों को वापस लेने का वादा पूरा नहीं किया है। पार्टी ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि सभी FIR वापस नहीं ली गईं तो आंदोलन दोबारा शुरू किया जाएगा।
पुलिस जांच में सामने आया बड़ा आंकड़ा
दिल्ली पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार संसद मार्च के दौरान लगे सीसीटीवी कैमरों, वीडियो फुटेज और अन्य डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर हजारों लोगों की पहचान की गई। जांच में कुल 2,873 लोगों की पहचान हुई, जिनमें से 989 लोगों का आपराधिक रिकॉर्ड पाया गया।
पुलिस सूत्रों का कहना है कि इनमें कई ऐसे लोग शामिल हैं जो पहले से गंभीर अपराधों में आरोपी हैं और कुछ को आदतन अपराधी की श्रेणी में भी रखा गया है।
हत्या, डकैती और लूट के दर्जनों गंभीर मामले
सरकार को सौंपी गई रिपोर्ट के अनुसार पहचाने गए लोगों में—
- 101 लोगों पर हत्या के मुकदमे दर्ज हैं।
- 284 लोगों पर डकैती और लूट के मामले चल रहे हैं।
- 92 लोगों पर महिलाओं और बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों के आरोप हैं।
- 229 लोगों के खिलाफ आर्म्स एक्ट के तहत केस दर्ज हैं।
- 135 लोगों का नाम झपटमारी के मामलों में है।
- 67 लोगों पर एनडीपीएस एक्ट के तहत मुकदमे हैं।
- 19 लोगों पर अपहरण के मामले दर्ज बताए गए हैं।
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि हत्या के आरोप वाले 101 लोगों में से 42 के खिलाफ दो या उससे अधिक आपराधिक मामले दर्ज हैं, जबकि 12 लोगों के खिलाफ दस से अधिक मुकदमे लंबित बताए गए हैं। इसी प्रकार डकैती और लूट के मामलों में शामिल 284 लोगों में से 155 के खिलाफ कई मुकदमे दर्ज हैं और 31 लोगों पर दस या उससे अधिक मामले चल रहे हैं।
20 जुलाई को हुई थी हिंसक झड़प
20 जुलाई को CJP और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के आह्वान पर हजारों छात्र और समर्थक संसद की ओर मार्च करने निकले थे। पुलिस ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए उन्हें आगे बढ़ने से रोक दिया।
इसके बाद प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच तीखी झड़प हुई। पुलिस का आरोप है कि प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेड तोड़े, सरकारी वाहनों में तोड़फोड़ की और कई पुलिसकर्मियों पर हमला किया। हालात बिगड़ने पर पुलिस ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए लाठीचार्ज, आंसू गैस और अन्य भीड़ नियंत्रण उपायों का इस्तेमाल किया।
इस घटना के बाद राजधानी में कानून-व्यवस्था को लेकर व्यापक बहस छिड़ गई थी।
आंदोलन की शुरुआत पेपर लीक से
यह आंदोलन देशभर में विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित पेपर लीक और परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता को लेकर शुरू हुआ था। CJP ने तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और परीक्षा सुधार की मांग को लेकर जंतर-मंतर पर धरना शुरू किया था।
बाद में सोनम वांगचुक के अनिश्चितकालीन अनशन में शामिल होने से आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक समर्थन मिला। हजारों छात्रों और युवाओं ने इसमें भाग लिया।
लगातार बढ़ते दबाव के बाद केंद्र सरकार और आंदोलनकारियों के बीच कई दौर की बातचीत हुई।
सरकार ने मानी थीं कई प्रमुख मांगें
बातचीत के बाद केंद्र सरकार ने आंदोलनकारियों की कई प्रमुख मांगें स्वीकार करने का दावा किया। इनमें शिक्षा मंत्री का इस्तीफा, परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार तथा तकनीकी विशेषज्ञ नंदन नीलकेणि की अध्यक्षता में सुधार संबंधी टास्क फोर्स के गठन जैसे निर्णय शामिल बताए गए।
इन घोषणाओं के बाद CJP ने 25 जुलाई को 37 दिनों से चल रहे आंदोलन को समाप्त करने की घोषणा की थी। उस समय यह भी कहा गया था कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ किसी प्रकार की प्रतिशोधात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी।
FIR वापस न होने पर CJP नाराज
अब CJP का आरोप है कि सरकार ने अपना वादा पूरा नहीं किया है। पार्टी का कहना है कि कई छात्रों और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर अब भी कायम हैं और कुछ लोगों को हिरासत में भी रखा गया है।
CJP के प्रवक्ता आशुतोष रांका ने कहा कि यदि सरकार ने तत्काल सभी मुकदमे वापस नहीं लिए तो संगठन दोबारा देशव्यापी आंदोलन शुरू करेगा।
उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की कि छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज सभी FIR तुरंत समाप्त की जाएं, हिरासत में लिए गए छात्रों को रिहा किया जाए तथा भविष्य में आंदोलन में भाग लेने वाले छात्रों के खिलाफ किसी भी प्रकार की पुलिस कार्रवाई न की जाए।
सरकार के सामने कानून और राजनीति दोनों की चुनौती
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला अब केवल छात्र आंदोलन तक सीमित नहीं रह गया है। एक ओर दिल्ली पुलिस गंभीर आपराधिक रिकॉर्ड वाले लोगों की मौजूदगी को लेकर कानून-व्यवस्था का मुद्दा उठा रही है, वहीं दूसरी ओर आंदोलनकारी संगठनों का कहना है कि बड़ी संख्या में शांतिपूर्ण छात्रों को भी मुकदमों में फंसाया जा रहा है।
यदि पुलिस अपने दावों पर कायम रहती है और दूसरी ओर CJP आंदोलन दोबारा शुरू करता है, तो यह विवाद आने वाले दिनों में राष्ट्रीय राजनीति का बड़ा विषय बन सकता है।
आगे क्या होगा?
दिल्ली पुलिस की जांच अभी जारी है और वीडियो फुटेज के आधार पर अन्य लोगों की पहचान भी की जा रही है। दूसरी ओर CJP ने केंद्र सरकार को चेतावनी दी है कि यदि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज सभी मामले वापस नहीं लिए गए तो फिर से व्यापक विरोध प्रदर्शन आयोजित किए जाएंगे।
अब सभी की निगाहें केंद्र सरकार, दिल्ली पुलिस और आंदोलनकारी संगठनों के अगले कदम पर टिकी हैं। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार अपने आश्वासनों और कानून-व्यवस्था के बीच किस प्रकार संतुलन स्थापित करती है, क्योंकि इस पूरे घटनाक्रम का प्रभाव न केवल छात्र राजनीति बल्कि राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श पर भी पड़ सकता है।














