अमेरिका के साथ हुए युद्धविराम और समझौते के बाद ईरान की राजनीति में नया संकट उभरता दिखाई दे रहा है। एक तरफ सरकार समझौते को देश के हित में उठाया गया जरूरी कदम बता रही है, तो दूसरी ओर कट्टरपंथी गुट इसे इस्लामिक रिपब्लिक के सिद्धांतों से समझौता और सत्ता के भीतर ‘सॉफ्ट तख्तापलट’ की शुरुआत मान रहे हैं। हालात ऐसे हैं कि तेहरान की सड़कों से लेकर संसद और धार्मिक मंचों तक बहस छिड़ गई है कि क्या ईरान अपनी पुरानी रणनीति बदल रहा है या फिर देश के भीतर सत्ता संतुलन बदलने की कोशिश हो रही है।
समझौते के बाद क्यों बढ़ा विवाद?
हालिया संघर्ष के बाद अमेरिका और ईरान के बीच हुए युद्धविराम ने कुछ समय के लिए क्षेत्रीय तनाव कम किया, लेकिन इसके राजनीतिक प्रभाव अब ईरान के भीतर दिखाई दे रहे हैं। कट्टरपंथी नेताओं और संगठनों का आरोप है कि सरकार ने अमेरिका के सामने जरूरत से ज्यादा नरमी दिखाई है और राष्ट्रीय हितों से समझौता किया है।
उनका दावा है कि समझौते की प्रक्रिया में ऐसे फैसले लिए गए जो देश की पारंपरिक नीतियों और सर्वोच्च नेतृत्व की सोच से मेल नहीं खाते। इसी वजह से राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन, विदेश मंत्री अब्बास अराघची और संसद अध्यक्ष मोहम्मद बघेर गालिबाफ आलोचनाओं के केंद्र में आ गए हैं।
कट्टरपंथी गुट क्यों नाराज हैं?
ईरान की राजनीति लंबे समय से दो प्रमुख धाराओं के बीच संतुलन पर टिकी रही है। पहली धारा अपेक्षाकृत व्यावहारिक और सुधारवादी मानी जाती है, जो आर्थिक सुधार, अंतरराष्ट्रीय संबंधों और प्रतिबंधों में राहत की पक्षधर है। दूसरी धारा कट्टरपंथी है, जो अमेरिका और पश्चिमी देशों के प्रति सख्त रुख बनाए रखने की वकालत करती है।
कट्टरपंथी गुटों का मानना है कि अमेरिका के साथ समझौता ईरान की वर्षों पुरानी प्रतिरोध नीति को कमजोर करता है। उनका तर्क है कि संघर्ष के दौरान मिली रणनीतिक बढ़त को राजनीतिक समझौते में बदल देना उचित नहीं था।
यही कारण है कि कई कट्टरपंथी नेताओं ने सार्वजनिक रूप से सरकार की आलोचना शुरू कर दी है। कुछ नेताओं ने इसे वैचारिक हार बताया है, जबकि कुछ ने इसे इस्लामिक गणराज्य की मूल भावना के खिलाफ कदम करार दिया है।
मुज्तबा खामेनेई की अनुपस्थिति क्यों बनी चर्चा का विषय?
विवाद का सबसे बड़ा कारण नए सर्वोच्च नेता मुज्तबा खामेनेई की रहस्यमयी चुप्पी और सार्वजनिक जीवन से दूरी बताई जा रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब देश बड़े संकट या महत्वपूर्ण फैसलों से गुजरता है, तब सर्वोच्च नेतृत्व की भूमिका निर्णायक होती है। लेकिन हालिया घटनाक्रम के दौरान उनकी सीमित सार्वजनिक मौजूदगी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
कट्टरपंथी धड़ों का दावा है कि यदि सर्वोच्च नेता खुलकर सामने आते और अपनी स्थिति स्पष्ट करते, तो इस तरह की अटकलों को रोका जा सकता था। वहीं सरकार समर्थकों का कहना है कि नेतृत्व की अनुपस्थिति को लेकर फैल रही कई बातें केवल अफवाहें हैं।
होर्मुज जलडमरूमध्य क्यों है विवाद का केंद्र?
पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को लेकर है।
यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक माना जाता है। वैश्विक तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। इसलिए इस मार्ग पर ईरान का प्रभाव लंबे समय से उसकी सबसे बड़ी रणनीतिक ताकत माना जाता रहा है।
कट्टरपंथी गुटों का आरोप है कि समझौते के तहत ईरान ने इस रणनीतिक दबाव को कम करने पर सहमति जताई है। उनका मानना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य ईरान के पास मौजूद सबसे प्रभावी भू-राजनीतिक हथियारों में से एक है और इसे कमजोर करना राष्ट्रीय हितों के खिलाफ होगा।
हालांकि सरकार का कहना है कि समझौते का उद्देश्य क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखना और आर्थिक राहत हासिल करना है, न कि किसी रणनीतिक अधिकार को छोड़ना।
सरकार का पक्ष क्या है?
सरकार समर्थक नेताओं का तर्क है कि लंबे समय से जारी आर्थिक प्रतिबंधों और सैन्य तनाव ने ईरान की अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव डाला है। उनका कहना है कि यदि संघर्ष जारी रहता, तो देश को और अधिक आर्थिक तथा सामाजिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता।
सरकार के अनुसार:
– समझौते से युद्ध का खतरा कम होगा।
– प्रतिबंधों में राहत मिलने की संभावना बढ़ेगी।
– अंतरराष्ट्रीय व्यापार और निवेश के रास्ते खुल सकते हैं।
– क्षेत्रीय तनाव कम होने से आर्थिक स्थिरता आएगी।
सरकारी खेमे का मानना है कि यह कोई आत्मसमर्पण नहीं बल्कि व्यावहारिक कूटनीति का हिस्सा है।
ईरान की अर्थव्यवस्था पर क्या असर?
पिछले कई वर्षों से ईरान अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों, मुद्रास्फीति और मुद्रा संकट जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। बेरोजगारी, बढ़ती कीमतें और निवेश की कमी आम लोगों के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ संबंधों में सुधार होता है तो ईरान को आर्थिक राहत मिल सकती है। तेल निर्यात बढ़ सकता है, विदेशी निवेश आकर्षित हो सकता है और अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग प्रणाली तक पहुंच आसान हो सकती है।
इसी वजह से देश का एक बड़ा वर्ग समझौते को आर्थिक दृष्टि से सकारात्मक कदम मान रहा है।
क्या वास्तव में तख्तापलट की आशंका है?
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार फिलहाल ईरान में किसी पारंपरिक सैन्य तख्तापलट जैसी स्थिति के संकेत नहीं हैं। हालांकि सत्ता प्रतिष्ठान के भीतर विचारधारात्मक संघर्ष जरूर दिखाई दे रहा है।
कट्टरपंथी गुट ‘सॉफ्ट कूप’ या ‘सॉफ्ट तख्तापलट’ शब्द का इस्तेमाल इस अर्थ में कर रहे हैं कि सरकार धीरे-धीरे देश की विदेश नीति और वैचारिक दिशा बदल रही है। लेकिन अब तक ऐसा कोई ठोस प्रमाण सामने नहीं आया है जिससे यह कहा जा सके कि संवैधानिक व्यवस्था को बदलने की संगठित कोशिश हो रही है।
विशेषज्ञ इसे सत्ता के विभिन्न धड़ों के बीच बढ़ती राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के रूप में देखते हैं।
ईरान की राजनीति का नया त्रिकोण
मौजूदा परिस्थितियों में ईरान की राजनीति तीन प्रमुख ध्रुवों में बंटी दिखाई देती है।
पहला ध्रुव सुधारवादी और व्यावहारिक नेतृत्व का है, जो आर्थिक सुधार और कूटनीतिक समाधान चाहता है।
दूसरा ध्रुव कट्टरपंथी गुटों का है, जो अमेरिका के साथ किसी भी प्रकार की नरमी का विरोध करते हैं और टकराव की नीति को जारी रखना चाहते हैं।
तीसरा ध्रुव सर्वोच्च नेतृत्व का है, जिसकी भूमिका और रुख को लेकर अभी भी कई सवाल बने हुए हैं।
आने वाले महीनों में इन तीनों शक्तियों के बीच संतुलन ही यह तय करेगा कि ईरान किस दिशा में आगे बढ़ेगा।
आग क्या?
ईरान के सामने फिलहाल दोहरी चुनौती है। एक ओर उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने हितों की रक्षा करनी है, वहीं दूसरी ओर घरेलू राजनीतिक असंतोष को भी संभालना है।
यदि समझौते से आर्थिक लाभ दिखाई देते हैं, तो सरकार की स्थिति मजबूत हो सकती है। लेकिन यदि अपेक्षित परिणाम नहीं मिले या क्षेत्रीय तनाव फिर बढ़ा, तो कट्टरपंथी गुटों को और अधिक राजनीतिक समर्थन मिल सकता है।
फिलहाल इतना स्पष्ट है कि अमेरिका के साथ हुए समझौते ने केवल क्षेत्रीय राजनीति को ही नहीं बदला, बल्कि ईरान के भीतर सत्ता, विचारधारा और नेतृत्व को लेकर नई बहस भी शुरू कर दी है। आने वाले समय में यही बहस देश की राजनीतिक दिशा तय कर सकती है।














