लंदन: ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री ऋषि सुनक ने देश में राष्ट्रीय पहचान, नस्ल, आप्रवासन और सामाजिक एकीकरण को लेकर चल रही बहस के बीच अपनी बात रखी है। सुनक ने कहा कि किसी व्यक्ति की त्वचा का रंग यह तय नहीं कर सकता कि वह ब्रिटिश या अंग्रेज है या नहीं। उन्होंने अपनी पहचान का जिक्र करते हुए कहा कि वह अंग्रेज भी हैं और हिंदू भी।
सुनक ने यह बात द संडे टाइम्स में लिखे अपने लेख में कही। उनका लेख हाल ही में मैरीलेबोन क्रिकेट क्लब में दिए गए उनके कॉडरे लेक्चर के बाद ब्रिटेन में पहचान और एकीकरण को लेकर हुई चर्चा से जुड़ा है।
‘त्वचा के रंग को राष्ट्रीयता से जोड़ना सही नहीं’
सुनक ने ब्रिटेन की बहु-धार्मिक और बहु-जातीय लोकतांत्रिक व्यवस्था का जिक्र करते हुए कहा कि देश में ऐसी स्थिति नहीं बननी चाहिए जहां किसी व्यक्ति की राष्ट्रीय पहचान उसके रंग या नस्ल के आधार पर तय की जाए।
उनका कहना है कि अगर ब्रिटेन में लोगों को उनके परिवार की पृष्ठभूमि या त्वचा के रंग के आधार पर अलग-अलग नजर से देखा जाने लगे, तो इससे समाज में दूरी और अलगाव बढ़ सकता है।
सुनक ने अपने अनुभव का हवाला देते हुए कहा कि वह इंग्लैंड में पले-बढ़े और बचपन से ही इंग्लैंड को अपना घर मानते रहे हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर कोई व्यक्ति इंग्लैंड में जन्मा और पला-बढ़ा है तथा उसे यही अपना घर लगता है, तो उसकी अंग्रेज पहचान पर सवाल क्यों उठाया जाना चाहिए।
‘मैं अंग्रेज भी हूं और हिंदू भी’
ऋषि सुनक भारतीय मूल के पहले ब्रिटिश प्रधानमंत्री रहे हैं। वह हिंदू धर्म का पालन करते हैं और लंबे समय से अपनी ब्रिटिश तथा भारतीय विरासत दोनों के बारे में सार्वजनिक रूप से बात करते रहे हैं।
अपने लेख में उन्होंने उस बहस का जिक्र किया जिसमें प्रधानमंत्री पद छोड़ने के बाद कुछ लोगों ने उनकी अंग्रेज पहचान पर सवाल उठाया। सुनक के अनुसार, उन्हें ‘ब्राउन हिंदू’ होने के कारण अंग्रेज नहीं मानने जैसी बातें कही गईं।
उन्होंने इसी संदर्भ में ‘रिवर्स टेबिट टेस्ट’ शब्द का इस्तेमाल किया। उनके अनुसार, पहले बहस इस बात पर होती थी कि प्रवासी क्रिकेट में इंग्लैंड का समर्थन करते हैं या अपने मूल देश का। लेकिन अब स्थिति ऐसी हो सकती है जहां किसी गैर-गोरे व्यक्ति के लिए इंग्लैंड का समर्थन करना भी उसकी अंग्रेज पहचान साबित करने के लिए पर्याप्त न माना जाए।
क्या है ‘टेबिट टेस्ट’?
सुनक ने अपने लेख में ब्रिटेन के पूर्व कंजरवेटिव सांसद नॉर्मन टेबिट द्वारा 1990 में उठाए गए सवाल का संदर्भ दिया। टेबिट ने क्रिकेट को उदाहरण बनाते हुए पूछा था कि प्रवासी समुदाय के लोग इंग्लैंड की टीम का समर्थन करते हैं या उस देश की टीम का, जहां से उनके परिवार आए हैं।
सुनक ने कहा कि इस विचार की आलोचना के बावजूद इसमें एक ऐसी बात थी कि कोई व्यक्ति इंग्लैंड को अपना घर मानकर उसके साथ जुड़ाव दिखा सकता था।
इसके विपरीत, सुनक जिस ‘रिवर्स टेबिट टेस्ट’ की बात कर रहे हैं, उसमें उनका तर्क है कि यदि किसी व्यक्ति को उसके रंग के आधार पर ही अंग्रेज मानने से इनकार कर दिया जाए, तो वह व्यक्ति अपनी पहचान साबित करने के लिए कुछ भी करे, उसे स्वीकार नहीं किया जाएगा।
इमिग्रेशन पर भी सुनक ने रखी अपनी बात
ऋषि सुनक ने अपने लेख में केवल नस्ल और पहचान की बात नहीं की, बल्कि इमिग्रेशन और एकीकरण को भी चर्चा का हिस्सा बनाया।
उन्होंने कहा कि ब्रिटेन में इमिग्रेशन को नियंत्रित करने और सामाजिक एकीकरण को मजबूत करने की मांग करना अपने आप में किसी व्यक्ति की नस्ल या त्वचा के रंग को उसकी राष्ट्रीय पहचान का आधार बनाने के बराबर नहीं है।
सुनक ने अपने प्रधानमंत्री कार्यकाल का जिक्र करते हुए अवैध इमिग्रेशन और शरणार्थियों से जुड़े मुद्दों पर उठाए गए कदमों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि कानूनी प्रवासन के लिए मानक ऊंचे रखे जा सकते हैं और साथ ही ब्रिटिश पहचान को नस्ल से जोड़ने का विरोध भी किया जा सकता है।
इस्लामवाद और इमिग्रेशन को लेकर भी जताई चिंता
सुनक ने ब्रिटेन के सामने मौजूद चुनौतियों में इमिग्रेशन से जुड़े मुद्दों और इस्लामवाद को भी शामिल किया। उन्होंने कहा कि सरकारों के सामने इमिग्रेशन को नियंत्रित करने और समाज में बेहतर एकीकरण सुनिश्चित करने की चुनौती है।
हालांकि, उन्होंने इन मुद्दों को नस्ल या त्वचा के रंग के आधार पर ब्रिटिश पहचान तय करने से अलग रखने की बात कही। यानी उनके तर्क में इमिग्रेशन नीति और राष्ट्रीय पहचान दो अलग-अलग बहसें हैं।
क्रिकेट को बताया लोगों को जोड़ने वाला माध्यम
ऋषि सुनक ने अपने लेख में क्रिकेट को भी ब्रिटिश समाज को जोड़ने वाले माध्यम के तौर पर पेश किया। उन्होंने अपने बचपन की यादों का जिक्र करते हुए बताया कि उनका क्रिकेट से गहरा जुड़ाव रहा है।
उनके मुताबिक खेल अलग-अलग समुदायों के लोगों को एक साथ ला सकता है। उन्होंने ब्रिटिश-एशियाई बच्चों और दूसरे समुदायों के बच्चों के बीच क्रिकेट के प्रति साझा रुचि को सामाजिक एकीकरण का उदाहरण बताया।
सुनक की चिंता क्या है?
सुनक की पूरी दलील का मुख्य केंद्र यह है कि ब्रिटिश पहचान को नस्ल या वंश के आधार पर तय नहीं किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि कोई व्यक्ति यदि ब्रिटेन में पैदा हुआ, वहीं पला-बढ़ा और उस देश को अपना घर मानता है, तो केवल त्वचा के रंग के कारण उसकी ब्रिटिश या अंग्रेज पहचान पर सवाल नहीं उठना चाहिए।
वहीं, सुनक ने इमिग्रेशन को लेकर सख्त नीति और बेहतर एकीकरण की जरूरत की बात भी कही है। इस तरह उन्होंने अपनी टिप्पणी में इमिग्रेशन पर बहस और नस्ल आधारित पहचान की बहस को अलग-अलग रखने की कोशिश की है।
ब्रिटेन में पहचान की बहस फिर चर्चा में
ऋषि सुनक का यह बयान ऐसे समय आया है जब ब्रिटेन में इमिग्रेशन, राष्ट्रीय पहचान, नस्ल और सामाजिक एकीकरण पर राजनीतिक और सामाजिक बहस जारी है।
सुनक ने अपने व्यक्तिगत अनुभव को इस व्यापक बहस से जोड़ते हुए कहा है कि ब्रिटिश समाज में लोगों को उनकी त्वचा के रंग के आधार पर अलग-अलग वर्गों में नहीं बांटा जाना चाहिए। उनका संदेश यह है कि ब्रिटिश पहचान को केवल नस्ल या पारिवारिक मूल से जोड़ना समाज में अलगाव की भावना को बढ़ा सकता है।
उनके बयान के बाद एक बार फिर यह सवाल चर्चा में है कि आधुनिक ब्रिटेन में ‘ब्रिटिश’ या ‘इंग्लिश’ होने की पहचान को किस आधार पर समझा जाए—नागरिकता, जन्म, संस्कृति, पारिवारिक विरासत या समाज के साथ जुड़ाव के आधार पर।















