नोएडा, 9 जुलाई: मानसून की पहली तेज बारिश ने एक बार फिर नोएडा प्राधिकरण के दावों की हकीकत सामने ला दी। करोड़ों रुपये की लागत से हर वर्ष नालों की सफाई, सीवेज व्यवस्था और जल निकासी तंत्र को दुरुस्त करने के दावे किए जाते हैं, लेकिन कुछ घंटों की बारिश ने पूरे शहर को पानी-पानी कर दिया। मुख्य सड़कें, सर्विस रोड, चौराहे, सेक्टरों की गलियां, आवासीय और औद्योगिक क्षेत्र जलमग्न हो गए। जगह-जगह घंटों लंबा जाम लगा रहा, वाहन पानी में बंद हो गए और लोगों को कमर तक पानी में उतरकर अपने गंतव्य तक पहुंचना पड़ा। इन हालात ने स्मार्ट सिटी के तमगे पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
इसी गंभीर स्थिति का जायजा लेने के लिए सामाजिक संस्था नोएडा सिटीजन फोरम (एनसीएफ) की कार्यकारी अध्यक्षा शालिनी सिंह स्वयं शहर की सड़कों पर उतरीं। उन्होंने विभिन्न सेक्टरों, प्रमुख मार्गों और जलभराव वाले इलाकों का निरीक्षण किया तथा मौके पर मौजूद नागरिकों, व्यापारियों और औद्योगिक इकाइयों के प्रतिनिधियों से बातचीत कर उनकी समस्याएं सुनीं।
सड़कों पर जलभराव, नालों से उफनता गंदा पानी और बिजली के खुले तार बने खतरा
निरीक्षण के दौरान कई स्थानों पर नालियां ओवरफ्लो होती मिलीं। कई जगह नालों के ऊपर लगे ढक्कन गायब थे, जबकि कुछ स्थानों पर खुले नालों में बिजली के तार पड़े दिखाई दिए। इस स्थिति को देखते हुए किसी भी समय बड़े हादसे की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
बारिश के कारण कई औद्योगिक क्षेत्रों में पानी फैला, जिससे फैक्ट्रियों और गोदामों में लाखों रुपये के नुकसान की जानकारी सामने आई। वहीं कई आवासीय क्षेत्रों में घरों के बाहर पानी भर गया, जिससे लोगों का सामान्य जीवन पूरी तरह प्रभावित रहा।
बारिश के बीच चलती मिली नालों की सफाई, उठे गंभीर सवाल
निरीक्षण के दौरान सबसे चौंकाने वाला दृश्य यह रहा कि जिन नालों की सफाई मानसून शुरू होने से पहले पूरी हो जानी चाहिए थी, उनकी सफाई बारिश के बीच भारी मशीनों से कराई जा रही थी। इससे साफ संकेत मिला कि मानसून पूर्व तैयारियां समय पर पूरी नहीं की गईं।
शालिनी सिंह ने इसे प्रशासनिक लापरवाही बताते हुए कहा कि यदि तय समय के भीतर नालों की सफाई और जल निकासी व्यवस्था दुरुस्त कर दी जाती, तो आज शहरवासियों को इस तरह की परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता।
उन्होंने कहा कि हर वर्ष मानसून से पहले बड़े स्तर पर तैयारियों के दावे किए जाते हैं, लेकिन पहली ही बारिश उन दावों की सच्चाई उजागर कर देती है। यदि सफाई कार्य समय पर हुआ होता तो बारिश के बीच मशीनें चलाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती।
“करोड़ों रुपये खर्च होते हैं, फिर भी पहली बारिश में डूब जाता है शहर”
शालिनी सिंह ने कहा कि हर वर्ष नालों की सफाई, सीवर लाइन, जल निकासी और ड्रेनेज सिस्टम के रखरखाव पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं। इसके बावजूद यदि पहली ही बारिश में पूरा शहर जलमग्न हो जाता है तो यह स्पष्ट संकेत है कि कहीं न कहीं गंभीर लापरवाही, निगरानी की कमी और कार्यों की गुणवत्ता में भारी खामियां हैं।
उन्होंने कहा कि केवल ठेकेदारों पर औपचारिक जुर्माना लगाकर या नोटिस जारी कर देना पर्याप्त नहीं है। जिन अधिकारियों पर इन कार्यों की निगरानी, गुणवत्ता सुनिश्चित करने और समय पर काम पूरा कराने की जिम्मेदारी थी, उनकी जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
‘शो विंडो’ की छवि पर हर साल लग रहा दाग
एनसीएफ की कार्यकारी अध्यक्षा ने कहा कि नोएडा को प्रदेश ही नहीं बल्कि देश की “शो विंडो” कहा जाता है। यहां देश-विदेश के निवेशक आते हैं और यह शहर उत्तर प्रदेश की विकास यात्रा का प्रतीक माना जाता है। लेकिन हर मानसून में जलभराव की तस्वीरें पूरे प्रदेश की छवि को धूमिल करती हैं।
उन्होंने कहा कि जब उद्योगों में पानी भरता है, व्यापार प्रभावित होता है और आम नागरिक घंटों जाम में फंसकर परेशान होते हैं, तब इसका सीधा असर शहर की आर्थिक गतिविधियों पर पड़ता है। इससे निवेशकों और उद्योगपतियों के बीच भी नकारात्मक संदेश जाता है।
महिलाएं, बच्चे और नौकरीपेशा लोग सबसे अधिक हुए परेशान
बारिश के बाद शहर के कई हिस्सों में लोगों को कमर तक पानी में चलकर निकलना पड़ा। महिलाएं, स्कूली बच्चे, बुजुर्ग और नौकरीपेशा लोग सबसे अधिक परेशान दिखाई दिए। कई स्थानों पर ई-रिक्शा और दोपहिया वाहन पानी में बंद हो गए, जिन्हें लोगों को धक्का लगाकर बाहर निकालना पड़ा।
घंटों तक लगे जाम के कारण कार्यालयों में पहुंचने वाले कर्मचारियों को भारी परेशानी उठानी पड़ी। कई लोग समय पर अपने कार्यस्थल तक नहीं पहुंच सके, जबकि स्कूली बच्चों और अभिभावकों को भी जलभराव के बीच जोखिम उठाकर सफर करना पड़ा।
एनसीएफ ने विधायक से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की
शहर की मौजूदा स्थिति को गंभीर बताते हुए नोएडा सिटीजन फोरम ने क्षेत्रीय विधायक से तत्काल हस्तक्षेप करने की मांग की है। संस्था ने कहा कि अब केवल बयानबाजी या औपचारिक समीक्षा बैठकों से काम नहीं चलेगा, बल्कि जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ ठोस कार्रवाई होनी चाहिए।
एनसीएफ ने पांच प्रमुख मांगें रखीं—
- नोएडा प्राधिकरण के मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) से मानसून पूर्व तैयारियों और जलभराव के कारणों पर विस्तृत रिपोर्ट लेकर उसे सार्वजनिक किया जाए।
- नालों की सफाई और जल निकासी के लिए जिन कंपनियों को ठेके दिए गए हैं, उनके नाम, कार्यों का विवरण, भुगतान और संबंधित अधिकारियों की जानकारी सार्वजनिक की जाए।
- जलभराव रोकने में विफल कंपनियों को तत्काल ब्लैकलिस्ट किया जाए।
- कार्यों की निगरानी में लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ विभागीय एवं प्रशासनिक कार्रवाई की जाए।
- भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न बने, इसके लिए समयबद्ध, पारदर्शी और जवाबदेह कार्ययोजना बनाकर जनता के सामने प्रस्तुत की जाए।
“एसी दफ्तरों से निकलकर सड़कों की हकीकत देखें अधिकारी”
शालिनी सिंह ने कहा कि प्राधिकरण के अधिकारियों को वातानुकूलित कार्यालयों से बाहर निकलकर सड़कों और नालों की वास्तविक स्थिति देखनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जब मामूली बारिश में पूरा शहर ठहर जाता है, उद्योगों को नुकसान होता है और नागरिक अपनी जान जोखिम में डालकर पानी के बीच से गुजरने को मजबूर होते हैं, तब इसे केवल प्राकृतिक आपदा नहीं कहा जा सकता।
उन्होंने कहा कि यह पूरी तरह प्रशासनिक विफलता का उदाहरण है। यदि योजनाएं समय पर लागू हों, कार्यों की गुणवत्ता की निष्पक्ष निगरानी हो और अधिकारियों की जवाबदेही तय हो, तो हर वर्ष होने वाली इस समस्या से काफी हद तक राहत मिल सकती है।
जनता पूछ रही है—जिम्मेदार कौन?
लगातार सामने आ रही जलभराव की घटनाओं ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर हर वर्ष करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद स्थिति में सुधार क्यों नहीं हो रहा। शहरवासियों का कहना है कि यदि पहली ही बारिश में सड़कें तालाब बन जाएं, नालियां उफनने लगें और उद्योगों से लेकर आम नागरिक तक प्रभावित हों, तो जिम्मेदारी तय होना स्वाभाविक है।
अब निगाहें नोएडा प्राधिकरण और जनप्रतिनिधियों पर टिकी हैं कि वे इस बार केवल आश्वासन देते हैं या वास्तव में जवाबदेही तय कर शहर को हर साल होने वाली इस समस्या से स्थायी राहत दिलाने की दिशा में ठोस कदम उठाते हैं। जनता का साफ संदेश है कि अब केवल दावे नहीं, जमीन पर परिणाम दिखाई देने चाहिए।














