Tuesday, May 5, 2026
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“‘चुप्पेचाप फूले छाप’ से 200+ की सत्ता तक: 28 साल की खामोश मेहनत ने बंगाल में लिख दी बीजेपी की सबसे बड़ी जीत”

“1998 में फुसफुसाहट वाला नारा, 2026 में प्रचंड बहुमत का शोर — श्यामा प्रसाद के सपने, तपन सिकदर के संघर्ष, सत्यब्रत के संगठन और मोदी-शाह की मशीनरी ने बदल दी बंगाल की सियासत”

कोलकाता/नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की राजनीति में जो हुआ, वह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं बल्कि करीब तीन दशकों की सुनियोजित राजनीतिक साधना का विस्फोट है। जिस राज्य में कभी बीजेपी का नाम लेना भी राजनीतिक जोखिम माना जाता था, उसी बंगाल में आज पार्टी 200+ सीटों के प्रचंड आंकड़े के साथ पहली बार सत्ता के शिखर पर पहुंच गई है।

यह जीत अचानक नहीं आई। यह जीत 1998 के उस धीमे लेकिन गहरे नारे—“चुप्पेचाप फूले छाप” से शुरू हुई थी, जिसने खामोश मतदाताओं के मन में परिवर्तन का पहला बीज बोया था। और अब 2026 में वही बीज बरगद बन चुका है।


जब खुलकर बीजेपी कहना मुश्किल था, तब आया ‘चुप्पेचाप फूले छाप’

नब्बे का दशक बंगाल में वामपंथी दबदबे का दौर था।
राजनीतिक माहौल ऐसा था कि खुलकर बीजेपी के समर्थन में आना आसान नहीं था। मतदाता परिवर्तन चाहते थे, लेकिन सामने आने से हिचकते थे।

इसी मनोविज्ञान को समझते हुए बीजेपी ने 1998 में एक अनोखा नारा दिया—

“चुप्पेचाप फूले छाप”

यह सिर्फ चुनावी स्लोगन नहीं था, बल्कि साइलेंट वोटर मोबिलाइजेशन का शुरुआती मॉडल था।

मतलब साफ था— सार्वजनिक रूप से कुछ मत कहिए, लेकिन बैलेट पर कमल ही चुनिए।

इस नारे ने उन लाखों मतदाताओं को मनोवैज्ञानिक सुरक्षा दी जो सत्ता से नाराज थे, लेकिन खुलकर विद्रोह नहीं कर पा रहे थे।


पहचान छोटी थी, लेकिन नींव यहीं पड़ी

1998 में बीजेपी को सत्ता नहीं मिली, लेकिन उसे बंगाल की राजनीति में पहचान, जनाधार और वैकल्पिक संभावना जरूर मिली। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यही वह दौर था जब बीजेपी ने समझ लिया कि बंगाल में लड़ाई भाषणों से नहीं, बल्कि धीरे-धीरे घर-घर पैठ बनाकर जीती जाएगी। यहीं से शुरू हुआ लंबा संगठनात्मक सफर।


श्यामा प्रसाद मुखर्जी का सपना, तपन सिकदर का संघर्ष

बंगाल बीजेपी की जड़ों की बात श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बिना अधूरी है। जनसंघ की वैचारिक नींव रखने वाले श्यामा प्रसाद का बंगाल हमेशा बीजेपी के लिए प्रतीकात्मक भूमि रहा। लेकिन विचार को वोट में बदलना आसान नहीं था। यह काम किया तपन सिकदर जैसे नेताओं ने, जिन्होंने उस दौर में पार्टी को गांव-गांव पहुंचाने का बीड़ा उठाया जब संसाधन बेहद सीमित थे।

तपन सिकदर कार्यकर्ताओं से सीधा संपर्क रखते थे, देहरी-देहरी जाकर पार्टी का संदेश पहुंचाते थे और संगठन को नीचे से ऊपर तक जोड़ते थे। आज बीजेपी का जो डोर-टू-डोर मॉडल दिखता है, उसकी शुरुआती झलक उसी दौर में दिखने लगी थी।


सत्यब्रत मुखर्जी ने दिया संगठन को ढांचा

अगर तपन सिकदर ने जड़ें सींचीं, तो सत्यब्रत मुखर्जी ने शाखाएं तैयार कीं। सत्यब्रत मुखर्जी को बंगाल बीजेपी का संगठनात्मक शिल्पकार माना जाता है। उन्होंने स्थानीय मुद्दों को पार्टी की भाषा बनाया, कार्यकर्ताओं की क्षमता के हिसाब से जिम्मेदारियां तय कीं और सीमित संसाधनों में पार्टी को शहर से गांव तक पहचान दिलाई।

उनकी रणनीति ने बीजेपी को “बाहरी पार्टी” की छवि से निकालकर “संभावित विकल्प” में बदला।


फिर आया ‘पोरिबर्तन’ का दौर — और बीजेपी ने पकड़ ली जनता की नब्ज

समय बदला। लेफ्ट गया, लेकिन सत्ता विरोध की भावना खत्म नहीं हुई।

बंगाल में “परिवर्तन” की चाह बनी रही।

बीजेपी ने इसी भाव को नए दौर में “पोरिबर्तन” के राजनीतिक नैरेटिव से जोड़ा और धीरे-धीरे खुद को मुख्य विपक्ष के रूप में स्थापित कर लिया। अब पार्टी सिर्फ विचारधारा नहीं बेच रही थी, वह विकल्प बेच रही थी।


बूथ-बूथ पर संगठन, गांव-गांव में कमल

2026 की जीत का सबसे बड़ा आधार बना—मजबूत बूथ नेटवर्क

बीजेपी ने वर्षों तक लगातार:

बूथ समितियां खड़ी कीं

पन्ना प्रमुख बनाए

गांवों में संपर्क अभियान चलाए

कार्यकर्ताओं को एक्टिव रखा

और हर चुनाव को संगठन विस्तार के मौके में बदला

इसका असर यह हुआ कि पार्टी का वोट प्रतिशत ही नहीं, उसकी स्थायी चुनावी मशीनरी तैयार हो गई।


Narendra Modi की रैलियां, Amit Shah का मैनेजमेंट और लो-प्रोफाइल हाई परफॉर्मेंस टीम

2026 आते-आते केंद्रीय नेतृत्व पूरी तरह एक्शन मोड में उतर चुका था।Narendra Modi ने विशाल रैलियों से चुनाव को भावनात्मक और राष्ट्रीय मुद्दों से जोड़ा, जबकि Amit Shah ने बूथ से लेकर उम्मीदवार चयन तक पूरे चुनावी ऑपरेशन को धार दी।

साथ ही: सुनील बंसलl,भूपेंद्र यादव, सुवेंदु अधिकारी, सुकांता मजूमदार,दिलीप घोष जैसे नेताओं ने लो-प्रोफाइल लेकिन हाई-इम्पैक्ट भूमिका निभाई।


खामोश स्लोगन से प्रचंड शोर तक—यही है 28 साल की कहानी

1998 में बीजेपी बंगाल के मतदाताओं से कह रही थी—
“चुप्पेचाप फूले छाप”

2026 में बंगाल की जनता ने जवाब दिया—
“अब खुलकर पोरिबर्तन”

यह सफर बताता है कि राजनीति में कोई जीत अचानक नहीं होती।वह वर्षों के धैर्य, संगठन, सही नारे, सही चेहरे और सही समय का परिणाम होती है।

बंगाल में कमल एक चुनाव में नहीं खिला… उसे 28 साल तक खामोशी से सींचा गया, तब जाकर 200+ का शोर उठा।

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VIKAS TRIPATHI
VIKAS TRIPATHIhttp://www.pardaphaas.com
VIKAS TRIPATHI भारत देश की सभी छोटी और बड़ी खबरों को सामने दिखाने के लिए "पर्दाफास न्यूज" चैनल को लेके आए हैं। जिसके लोगो के बीच में करप्शन को कम कर सके। हम देश में समान व्यवहार के साथ काम करेंगे। देश की प्रगति को बढ़ाएंगे।
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