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अक्षय तृतीया पर शुरू हुआ जगन्नाथ रथ निर्माण, 79 दिनों में तैयार होगा बिना कील-मशीन का पवित्र रथ

पुरी में अक्षय तृतीया के पावन अवसर पर भगवान जगन्नाथ के रथ निर्माण की परंपरा विधिवत शुरू हो गई है। यह वही दिन माना जाता है, जब रथ यात्रा के लिए बनने वाले पवित्र रथों का निर्माण आरंभ होता है। इस वर्ष भी परंपरा के अनुसार बिना कील, बिना मशीन और पूरी तरह पारंपरिक शिल्पकला से रथ तैयार किया जा रहा है।

रिपोर्ट के मुताबिक, इस बार रथ निर्माण में कुल 865 लकड़ी की लाठियों का इस्तेमाल होगा। लगभग 230 कारीगर दिन-रात मेहनत करके इस पवित्र कार्य को पूरा करेंगे। रथ निर्माण का काम करीब 79 दिनों में पूरा होगा और यह 7 जुलाई तक तैयार कर लिया जाएगा। इसके बाद 16 जुलाई को भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा निकाली जाएगी।

रथ निर्माण की शुरुआत भी बेहद खास धार्मिक विधि के साथ की जाती है। श्रीमंदिर के पास बने रथ खला कैंप में सबसे पहले मां दक्षिण काली के मंत्रों से अभिमंत्रित सोने की तीन कुल्हाड़ियों लाई जाती हैं। पुरोहित इन कुल्हाड़ियों का स्पर्श रथ निर्माण में उपयोग होने वाली लकड़ियों से कराते हैं, जिसके बाद निर्माण कार्य विधिवत शुरू होता है।

रथ निर्माण में परंपरागत रूप से फासी, धौरा, आसन और सिमली जैसे पेड़ों की लकड़ी का उपयोग किया जाता है। सेवायतों के अनुसार, इस प्रक्रिया में न तो मशीनों का सहारा लिया जाता है और न ही कील, हथौड़ा, रंदा या लकड़ी काटने वाली आधुनिक मशीनें इस्तेमाल होती हैं। पूरा निर्माण शास्त्रीय और पारंपरिक विधि से होता है।

इस पवित्र कार्य में 60 विश्वकर्मा महाराणा, 80 भोई सेवायत, 15 लोहार, 20 से 30 चित्रकार, 10 दर्जी और 20 रुपकार सेवायत शामिल रहते हैं। बताया जाता है कि कई सेवायत बाहर नौकरी करते हैं, लेकिन रथ निर्माण के दिनों में वे विशेष रूप से पुरी लौट आते हैं और सेवा में जुट जाते हैं। निर्माण पूरा होने तक वे पूरी तरह शाकाहारी भोजन करते हैं और घर में भी प्याज-लहसुन का सेवन नहीं करते।

रथ निर्माण की प्रक्रिया सुबह 6 बजे से रात 10 बजे तक चलती है। पहले पहिए बनाए जाते हैं, उसके बाद रथ के बाकी हिस्सों का निर्माण शुरू होता है। सदियों पुरानी यह परंपरा न सिर्फ धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि भारतीय शिल्प, अनुशासन और सामूहिक सेवा की अद्भुत मिसाल भी पेश करती है।

जगन्नाथ रथ निर्माण हर वर्ष श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र रहता है। यह केवल एक रथ नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और भक्ति का जीवंत प्रतीक माना जाता है।

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VIKAS TRIPATHI
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