वाराणसी: उत्तर प्रदेश में वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं। इसी क्रम में 26 अप्रैल को वाराणसी में सुभासपा और निषाद पार्टी अपने-अपने शक्ति प्रदर्शन के जरिए राजनीतिक संदेश देने जा रही हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र में होने वाली इन जनसभाओं को आगामी चुनावी रणनीति की अहम कड़ी माना जा रहा है।
जानकारी के अनुसार, निषाद पार्टी की जनसभा कटिंग मेमोरियल में आयोजित होगी, जबकि सुभासपा प्रमुख ओमप्रकाश राजभर पिंडरा स्थित नेशनल इंटर कॉलेज में जनसभा करेंगे। दोनों ही दलों ने अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं और बड़े पैमाने पर कार्यकर्ताओं को जुटाने का काम शुरू कर दिया है।
निषाद पार्टी के प्रमुख डॉ. संजय निषाद इस समय वाराणसी में डेरा डाले हुए हैं। वे पूर्वांचल के विभिन्न जिलों से कार्यकर्ताओं को जोड़कर इस जनसभा को सफल बनाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। पार्टी नेताओं के अनुसार, गोरखपुर से लेकर बलिया तक के पदाधिकारी और कार्यकर्ता इस आयोजन को ऐतिहासिक बनाने के लिए जुटे हुए हैं।
डॉ. संजय निषाद ने कहा कि निषाद समाज लंबे समय से अपने अधिकारों से वंचित रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि पहले अंग्रेजों, फिर कांग्रेस, और बाद में बसपा तथा सपा ने निषाद समाज को हक और अवसरों से दूर रखा। उन्होंने कहा कि अब समाज को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उम्मीद है कि वे उनकी बात सुनेंगे। निषाद समाज की ओर से एससी आरक्षण सहित कई मुद्दे इस जनसभा में उठाए जाएंगे।
इसी दिन सुभासपा भी अपनी अलग जनसभा करेगी। पहले यह कार्यक्रम 19 अप्रैल को प्रस्तावित था, लेकिन बाद में इसे 26 अप्रैल को कर दिया गया। पार्टी नेताओं के अनुसार, वाराणसी को इसलिए चुना गया क्योंकि एसटी आरक्षण का मुद्दा यहीं से उठाया गया था। सुभासपा जिलाध्यक्ष उमेश राजभर ने कहा कि यह जनसभा समाज के अधिकारों और मुद्दों को उठाने के लिए आयोजित की जा रही है और इसमें हजारों कार्यकर्ताओं के शामिल होने की संभावना है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह दोनों जनसभाएं केवल भीड़ जुटाने का कार्यक्रम नहीं हैं, बल्कि इनके जरिए अपनी राजनीतिक ताकत का प्रदर्शन किया जाएगा। विश्लेषक विजय नारायण के अनुसार, संजय निषाद और ओमप्रकाश राजभर जैसे नेताओं के लिए अपनी शक्ति दिखाना जरूरी है, क्योंकि यदि वे ऐसा नहीं करेंगे तो बड़े दल उन्हें कमजोर मानकर नजरअंदाज कर सकते हैं।
उन्होंने कहा कि यूपी और बिहार की राजनीति में जातीय आधार वाली पार्टियों के लिए जनसभा के जरिए अपनी संख्या और संगठनात्मक ताकत दिखाना एक सामान्य रणनीति है। इसी ताकत के आधार पर आगे सीटों की बातचीत और गठबंधन की राजनीति तय होती है। उनका कहना है कि वाराणसी में दिखने वाली ताकत का असर आगे दिल्ली तक दिखाई देगा, जहां 2027 के लिए गठबंधन और सीट बंटवारे पर चर्चा होगी।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि इन रैलियों में संबंधित समुदायों से जुड़े मुद्दे प्रमुखता से उठाए जाएंगे। साथ ही यह संदेश देने की कोशिश भी होगी कि इन दलों की अनदेखी अब आसान नहीं होगी। आने वाले दिनों में वाराणसी की यह राजनीतिक हलचल प्रदेश की चुनावी दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकती है।














