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40 लाख आबादी भगवान भरोसे! सिर्फ 250 फायरकर्मी, बर्न यूनिट भी नहीं… हाईटेक गौतमबुद्ध नगर की सुरक्षा व्यवस्था पर बड़े सवाल

बढ़ती हाईराइज सोसायटियां, औद्योगिक इकाइयां और 24 घंटे आग का खतरा… लेकिन जिले में न पर्याप्त फायर स्टाफ, न आधुनिक बर्न यूनिट; हालिया घटनाओं ने खोली तैयारियों की पोल

नोएडा/ग्रेटर नोएडा:

गौतमबुद्ध नगर को उत्तर प्रदेश का सबसे आधुनिक, सबसे तेज़ी से विकसित और सबसे ज्यादा राजस्व देने वाला जिला माना जाता है। चमचमाती एक्सप्रेसवे, हजारों हाईराइज अपार्टमेंट, फैक्ट्रियों का जाल, आईटी पार्क, डेटा सेंटर और करोड़ों का रियल एस्टेट निवेश—यह सब मिलकर जिले को ‘हाईटेक मॉडल’ की पहचान देते हैं। लेकिन इस चमकदार तस्वीर के पीछे सुरक्षा व्यवस्था की जो वास्तविक स्थिति सामने आ रही है, वह बेहद चिंताजनक और डराने वाली है।

सूत्रों के अनुसार, करीब 40 लाख की आबादी वाले गौतमबुद्ध नगर जिले की आग से सुरक्षा का जिम्मा महज़ 250 अग्निशमन कर्मियों पर टिका है, जबकि विशेषज्ञ मानकों के हिसाब से यह संख्या कम से कम दोगुनी से अधिक होनी चाहिए। जिले में लगातार बढ़ती ऊंची इमारतों और औद्योगिक जोखिमों के बीच यह संख्या बेहद अपर्याप्त मानी जा रही है। हालिया रिपोर्टों में भी हाईराइज इमारतों की तुलना में फायर संसाधनों की भारी कमी उजागर हुई है।


हजारों हाईराइज, लेकिन फायर सिस्टम पर भारी दबाव

नोएडा और ग्रेटर नोएडा में पिछले कुछ वर्षों में गगनचुंबी इमारतों का विस्फोटक विस्तार हुआ है।
हजारों परिवार 20 से 40 मंजिल तक की सोसायटियों में रह रहे हैं।

इसके साथ ही: औद्योगिक सेक्टरों में केमिकल, प्लास्टिक और इलेक्ट्रॉनिक्स यूनिट्स बढ़ी हैं , वेयरहाउस और लॉजिस्टिक हब तेजी से बने हैं, घनी आबादी वाले शहरी क्लस्टर तैयार हुए हैं

ऐसे इलाकों में आग लगने का जोखिम सामान्य शहरों से कई गुना अधिक होता है। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर फायर इंफ्रास्ट्रक्चर उसी रफ्तार से विकसित नहीं हुआ। पूर्व में राष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों ने भी सवाल उठाया कि इतने विशाल हाईराइज ज़ोन के मुकाबले जिले के पास सीमित फायर टेंडर और हाईराइज रेस्क्यू संसाधन ही उपलब्ध हैं।


हर डेढ़ लाख लोगों पर एक फायरकर्मी, बड़े हादसे में क्या होगा?

यदि उपलब्ध आंकड़ों का अनुपात निकाला जाए तो लगभग हर 1.5 से 1.6 लाख लोगों पर एक फायरकर्मी तैनात है।

यानी:

एक टीम को कई सेक्टर कवर करने पड़ते हैं

एक साथ दो या तीन घटनाएं होने पर संसाधन बंट जाते हैं

हाईराइज, फैक्ट्री और रिहायशी आग में अलग-अलग विशेषज्ञ प्रतिक्रिया दे पाना मुश्किल हो जाता है

सूत्र बताते हैं कि स्टाफ की कमी के कारण कई कर्मियों को लगातार लंबी ड्यूटी करनी पड़ती है। छुट्टियां सीमित हैं, मानसिक दबाव अधिक है और आपात स्थिति में त्वरित निर्णय की चुनौती भी बढ़ जाती है।

फायर विभाग से जुड़े लोगों का कहना है कि छोटी घटनाओं को नियंत्रित करना संभव है, लेकिन यदि किसी हाईराइज टावर, औद्योगिक यूनिट या भीड़भाड़ वाले बाजार में एक साथ बड़ी आग लग जाए, तो मौजूदा संसाधन तुरंत दबाव में आ सकते हैं।


सबसे बड़ा संकट: पूरे जिले में बर्न यूनिट नहीं

सुरक्षा व्यवस्था की सबसे चिंताजनक कड़ी स्वास्थ्य तंत्र से जुड़ी है।

सूत्रों के मुताबिक, गौतमबुद्ध नगर के सरकारी अस्पतालों में विशेषीकृत आधुनिक बर्न यूनिट उपलब्ध नहीं है। इसका सीधा मतलब यह है कि यदि किसी बड़ी आग में लोग गंभीर रूप से झुलसते हैं, तो उन्हें:

या तो निजी अस्पतालों में महंगा इलाज लेना पड़ता है,या दिल्ली/अन्य बड़े केंद्रों में रेफर करना पड़ता है ,ऐसे मामलों में इलाज का सबसे महत्वपूर्ण समय “गोल्डन ऑवर” माना जाता है। लेकिन ट्रैफिक, दूरी और रेफरल प्रक्रिया के कारण यही गोल्डन ऑवर कई बार निकल जाता है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि आग में झुलसे मरीज के लिए शुरुआती एक घंटा ही जीवन और मृत्यु के बीच निर्णायक होता है। ऐसे में हाईटेक जिले में बर्न यूनिट का न होना प्रशासनिक तैयारी पर गंभीर सवाल खड़े करता है।


राजस्व में अव्वल, लेकिन बुनियादी सुरक्षा में कमी क्यों?

गौतमबुद्ध नगर प्रदेश के सबसे ज्यादा कमाई कराने वाले जिलों में गिना जाता है।
रियल एस्टेट, स्टांप ड्यूटी, औद्योगिक निवेश, वाणिज्यिक कर और विकास प्राधिकरणों से सरकार को हर साल हजारों करोड़ रुपये का राजस्व मिलता है।

यानी यह जिला सरकार के लिए कमाई का इंजन है।

लेकिन सवाल यह उठता है कि:

जो जिला राजस्व देता सबसे ज्यादा है,
क्या वही जिला सुरक्षा निवेश में सबसे पीछे रह जाए?

स्थानीय लोगों में यही नाराजगी बढ़ रही है कि चमकदार परियोजनाओं पर भारी खर्च होता है, लेकिन फायर स्टेशन, आधुनिक रेस्क्यू सिस्टम, हाईराइज फायर व्हीकल और बर्न केयर जैसी मूलभूत जरूरतें अभी भी अधूरी हैं।


हालिया घटनाओं ने बढ़ाई चिंता

पिछले एक वर्ष में जिले और आसपास के क्षेत्रों में कई आग की घटनाएं सामने आईं—

फैक्ट्री अग्निकांड

हाईराइज सोसायटी में शॉर्ट सर्किट

अस्पताल परिसर में आग

रिहायशी फ्लैटों में बालकनी ब्लेज

अक्टूबर 2025 में 24 घंटे के भीतर जिले में 26 आग की घटनाएं दर्ज हुई थीं, जिन्हें विभाग ने नियंत्रित तो किया, लेकिन इसने साफ दिखा दिया कि आग की घटनाओं की आवृत्ति तेजी से बढ़ रही है।

सोशल प्लेटफॉर्म्स पर भी लगातार लोग सवाल उठा रहे हैं कि ऊंची इमारतों में लगी आग तक पहुंचने के लिए विभाग के पास पर्याप्त हाई-रीच संसाधन और जनशक्ति है या नहीं।


फायरकर्मियों पर 24 घंटे का दबाव

सूत्र बताते हैं कि उपलब्ध स्टाफ को: लगातार राउंड-द-क्लॉक अलर्ट रहना पड़ता है,कई बार एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन तक बैकअप देना पड़ता है, प्रशिक्षण, उपकरण रखरखाव और रिकवरी का समय भी कम मिल पाता है|

लगातार तनाव में काम कर रही टीमों की कार्यक्षमता पर भी इसका असर पड़ना स्वाभाविक है। विशेषज्ञ कहते हैं कि आपदा प्रबंधन केवल गाड़ियों से नहीं, बल्कि पर्याप्त प्रशिक्षित मानव संसाधन से चलता है—और यही कड़ी यहां कमजोर दिखाई दे रही है।


जनता के मन में उठ रहे तीन बड़े सवाल

आज गौतमबुद्ध नगर का आम नागरिक तीन सवाल पूछ रहा है:

क्या 40 लाख लोगों की सुरक्षा सिर्फ 250 फायरकर्मियों के भरोसे संभव है?

क्या बिना बर्न यूनिट के जिला किसी बड़े अग्निकांड के बाद मेडिकल इमरजेंसी संभाल पाएगा?

क्या हाईटेक विकास केवल बिल्डिंगों तक सीमित है, सुरक्षा तंत्र तक नहीं?

इन सवालों का जवाब फिलहाल सिस्टम के पास स्पष्ट नहीं दिखता।


विशेषज्ञों ने सुझाए तात्कालिक समाधान

स्थिति को देखते हुए विशेषज्ञ और सूत्र कुछ जरूरी कदम बताते हैं:

फायर विभाग में तत्काल बड़े स्तर पर भर्ती

हर संवेदनशील सेक्टर में नए फायर स्टेशन

हाईराइज रेस्क्यू के लिए लंबी हाइड्रोलिक मशीनें

जिला अस्पताल में आधुनिक बर्न यूनिट

सोसायटियों और फैक्ट्रियों का नियमित फायर ऑडिट

इमरजेंसी रिस्पॉन्स का डिजिटल कंट्रोल सिस्टम


हादसे का इंतजार क्यों?

गौतमबुद्ध नगर को स्मार्ट, हाईटेक और ग्लोबल निवेश का चेहरा कहा जाता है।
लेकिन अगर उसी जिले में आग से बचाव के लिए पर्याप्त हाथ नहीं और आग में झुलसे लोगों के इलाज के लिए बर्न यूनिट नहीं, तो यह विकास मॉडल अधूरा ही माना जाएगा।

क्योंकि सवाल सिर्फ इमारतों का नहीं—उन इमारतों में रहने वाली लाखों जिंदगियों का है।

और अगर व्यवस्था अभी नहीं चेती, तो किसी बड़े हादसे के बाद यही सवाल और ज्यादा कड़वे होकर लौटेंगे—

क्या चेतावनी पहले से मौजूद थी, फिर तैयारी क्यों नहीं हुई?

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VIKAS TRIPATHI
VIKAS TRIPATHIhttp://www.pardaphaas.com
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