आजीविका और बेहतर जीवन के लिए व्यक्ति किसी न किसी व्यवसाय, नौकरी या कार्यक्षेत्र से जुड़ा होता है। हर व्यक्ति चाहता है कि उसका काम निरंतर आगे बढ़े, आमदनी स्थिर रहे और उसे बार-बार परेशानियों का सामना न करना पड़े। हालांकि व्यापार और कार्यक्षेत्र में उतार-चढ़ाव आना सामान्य बात है, लेकिन कई बार यह उतार-चढ़ाव इतना अधिक बढ़ जाता है कि व्यक्ति को आर्थिक संकट, काम रुकने या व्यवसाय बंद होने जैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है।
ज्योतिषाचार्य पं. नरेन्द्र कृष्ण शास्त्री के अनुसार, ज्योतिष शास्त्र में कार्यक्षेत्र या व्यापार में आने वाली ऐसी अस्थिरता का संबंध जन्मकुंडली में ग्रहों की स्थिति, उनके प्रभाव तथा महादशा-अंतरदशा से जोड़ा जाता है।
ग्रहों की स्थिति से बनती है कार्यक्षेत्र में स्थिरता या अस्थिरता
पं. नरेन्द्र कृष्ण शास्त्री बताते हैं कि व्यापार या नौकरी में उतार-चढ़ाव का अर्थ केवल लाभ-हानि नहीं, बल्कि कार्यक्षेत्र में लगातार बनी रहने वाली अस्थिरता भी हो सकता है। कई बार व्यक्ति को मेहनत के बावजूद अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते, काम में रुकावट आती है या अच्छी चल रही गतिविधियां अचानक कमजोर पड़ने लगती हैं।
ज्योतिषीय दृष्टि से ऐसी परिस्थितियों में कार्यक्षेत्र से संबंधित भाव, उसके स्वामी ग्रह और उन पर पड़ने वाले शुभ-अशुभ प्रभावों का अध्ययन किया जाता है। शुभ ग्रहों की अनुकूल दशा में परिस्थितियां अपेक्षाकृत बेहतर रह सकती हैं, जबकि प्रतिकूल ग्रह दशा में संघर्ष और बाधाएं बढ़ने की मान्यता है।
सिंह लग्न में दसवें भाव का महत्व
पं. नरेन्द्र कृष्ण शास्त्री के अनुसार, सिंह लग्न की कुंडली में दसवें भाव का संबंध कार्यक्षेत्र और कर्म से होता है तथा इसका स्वामी शुक्र माना जाता है। यदि शुक्र व्यापार या कार्यक्षेत्र के लिए अनुकूल स्थिति में हो और अच्छे योग बना रहा हो, तो व्यक्ति के काम में स्थिरता और प्रगति की संभावना मानी जाती है।
लेकिन यदि शुक्र पर अशुभ ग्रहों का प्रभाव हो, जैसे शनि की दृष्टि पड़ रही हो या दसवें भाव में किसी प्रकार का अशुभ योग बन रहा हो, तो ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार व्यापार या कार्यक्षेत्र में उतार-चढ़ाव की स्थिति बन सकती है।
ऐसे में व्यक्ति को कभी अच्छे अवसर मिल सकते हैं तो कभी अचानक रुकावटों का सामना करना पड़ सकता है। इसी कारण कुंडली में केवल एक ग्रह को देखकर निष्कर्ष निकालने के बजाय पूरे ग्रह योग और दशा व्यवस्था का अध्ययन आवश्यक माना जाता है।
कन्या लग्न में बुध की भूमिका
इसी प्रकार कन्या लग्न की कुंडली में दसवें भाव के स्वामी बुध होते हैं। ज्योतिषाचार्य के अनुसार यदि बुध कार्यक्षेत्र से संबंधित शुभ स्थिति में हो तो व्यापार और नौकरी के लिए सकारात्मक परिणाम मिल सकते हैं।
वहीं बुध के साथ बैठे ग्रहों की स्थिति, उनका अस्त होना अथवा कुंडली के छठे, आठवें जैसे भावों से संबंधित ग्रहों का प्रभाव कार्यक्षेत्र में संघर्ष और अस्थिरता से जोड़ा जाता है।
ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार ऐसी स्थिति में व्यक्ति को व्यापार में बार-बार परिवर्तन, काम में रुकावट या अपेक्षित सफलता न मिलने जैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है।
महादशा और अंतरदशा का भी महत्वपूर्ण प्रभाव
पं. नरेन्द्र कृष्ण शास्त्री के अनुसार महादशा और अंतरदशा व्यक्ति के वर्तमान समय और आने वाली परिस्थितियों को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
कुंडली में ग्रह अच्छी स्थिति में होने के बावजूद यदि किसी समय प्रतिकूल ग्रह की दशा या अंतरदशा चल रही हो, तो कार्यक्षेत्र में कठिनाइयों का दौर आ सकता है। इसके विपरीत अनुकूल ग्रह दशा आने पर परिस्थितियों में सुधार और नए अवसर मिलने की संभावना मानी जाती है।
इसी वजह से ज्योतिष में केवल जन्मकुंडली देखकर ही नहीं, बल्कि वर्तमान में चल रही महादशा-अंतरदशा का भी विश्लेषण किया जाता है।
क्या उपायों से कम हो सकता है व्यापार का उतार-चढ़ाव?
ज्योतिषाचार्य पं. नरेन्द्र कृष्ण शास्त्री के अनुसार, ग्रहों की प्रतिकूल स्थिति से उत्पन्न समस्याओं के लिए ज्योतिष शास्त्र में विभिन्न प्रकार के उपाय बताए गए हैं। ग्रहों की स्थिति, दशा-अंतरदशा और कुंडली में बनने वाले योगों के आधार पर उपाय निर्धारित किए जाने की मान्यता है।
उनका कहना है कि व्यापार, नौकरी या किसी भी कार्यक्षेत्र में लगातार अस्थिरता महसूस होने पर व्यक्ति को अपनी जन्मकुंडली का विस्तृत अध्ययन करवाकर ग्रहों की स्थिति को समझना चाहिए। इसके बाद कुंडली के अनुरूप उपाय किए जा सकते हैं।
हालांकि व्यापार की सफलता में मेहनत, सही रणनीति, बाजार की स्थिति, आर्थिक निर्णय और परिस्थितियों का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है।
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