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नेतन्याहू की सत्ता गई तो भारत-इजराइल संबंधों पर क्या होगा असर? रक्षा सौदों से लेकर कारोबार तक, समझिए पूरा समीकरण

नई दिल्ली। इजराइल में सत्ता का समीकरण बदलने की आशंका के बीच भारत और इजराइल के भविष्य के संबंधों को लेकर चर्चा तेज हो गई है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व वाले गठबंधन को एग्जिट पोल में स्पष्ट बहुमत मिलता नहीं दिख रहा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि अगर नेतन्याहू दोबारा प्रधानमंत्री नहीं बनते हैं, तो क्या भारत और इजराइल की रणनीतिक साझेदारी कमजोर पड़ सकती है? क्या भारत को मिलने वाले आधुनिक हथियारों की आपूर्ति, रक्षा समझौतों और व्यापारिक संबंधों पर इसका असर पड़ेगा?

भारत और इजराइल के बीच पिछले कुछ वर्षों में रक्षा, कृषि, जल प्रबंधन, साइबर सुरक्षा और आधुनिक तकनीक के क्षेत्र में सहयोग तेजी से बढ़ा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बेंजामिन नेतन्याहू की करीबी दोस्ती ने भी इन संबंधों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खास पहचान दी है। हालांकि, दोनों देशों के रिश्तों की मजबूती केवल दो नेताओं की व्यक्तिगत केमिस्ट्री पर निर्भर नहीं करती। इसके पीछे साझा रणनीतिक हित और लंबे समय से विकसित हुआ संस्थागत सहयोग भी है।

इजराइल चुनाव में किसके हाथ लगेगी सत्ता की चाबी?

इजराइल में 27 अक्टूबर को हुए मतदान के बाद राजनीतिक तस्वीर पूरी तरह स्पष्ट नहीं हुई है। समाचार रिपोर्ट में उद्धृत एग्जिट पोल के अनुसार, नेतन्याहू के गठबंधन को लगभग 50 से 52 सीटें मिलने का अनुमान है। वहीं, उनके प्रमुख प्रतिद्वंद्वी गादी आइजनकोट के नेतृत्व वाले खेमे को लगभग 49 से 53 सीटें मिलने की संभावना जताई गई है।

इजराइल की संसद, जिसे क्नेसेट कहा जाता है, में कुल 120 सीटें हैं। सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जरूरी है। ऐसे में यदि किसी भी खेमे को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता, तो छोटे राजनीतिक दलों की भूमिका निर्णायक हो सकती है।

हालांकि, एग्जिट पोल अंतिम चुनाव परिणाम नहीं होते। वास्तविक नतीजों और गठबंधन वार्ताओं के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि इजराइल की अगली सरकार किसकी बनेगी।

मोदी-नेतन्याहू की दोस्ती ने रिश्तों को दी नई पहचान

भारत और इजराइल के संबंधों को नई गति देने में नरेंद्र मोदी और बेंजामिन नेतन्याहू की अहम भूमिका रही है। वर्ष 2017 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इजराइल का दौरा करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने थे। इसके बाद 2018 में नेतन्याहू भारत आए।

दोनों नेताओं की मुलाकातों और आपसी गर्मजोशी ने द्विपक्षीय संबंधों को व्यापक राजनीतिक पहचान दी। रक्षा और तकनीक के अलावा कृषि, सिंचाई, जल संरक्षण तथा नवाचार जैसे क्षेत्रों में भी सहयोग का विस्तार हुआ।

लेकिन इस रिश्ते की नींव केवल व्यक्तिगत मित्रता नहीं है। भारत के लिए इजराइल आधुनिक रक्षा तकनीक और सुरक्षा सहयोग का महत्वपूर्ण साझेदार है, जबकि इजराइल के लिए भारत एक बड़ा बाजार और दीर्घकालिक रणनीतिक भागीदार है।

यही वजह है कि इजराइल में नेतृत्व परिवर्तन होने पर भी दोनों देशों के संबंध पूरी तरह बदल जाने की संभावना कम मानी जा सकती है।

भारत के लिए इजराइल क्यों है इतना महत्वपूर्ण?

भारत और इजराइल के बीच रक्षा सहयोग सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में से एक है। भारतीय सशस्त्र बल विभिन्न इजराइली रक्षा प्रणालियों, ड्रोन और सटीक निशाना लगाने वाले हथियारों का इस्तेमाल करते हैं।

स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) के आंकड़ों के अनुसार, 2020 से 2024 के बीच इजराइल के प्रमुख हथियार निर्यात में भारत की हिस्सेदारी लगभग 34 प्रतिशत रही। इससे दोनों देशों के रक्षा संबंधों के रणनीतिक महत्व का अंदाजा लगाया जा सकता है।

भारत इजराइल से विभिन्न प्रकार की मिसाइल प्रणालियों, निगरानी उपकरणों, ड्रोन तकनीक और आधुनिक रक्षा उपकरणों से जुड़ा सहयोग प्राप्त करता है। दोनों देशों की कंपनियों के बीच साझेदारी और भारत में रक्षा उत्पादन की संभावनाएं भी इस रिश्ते को मजबूत बनाती हैं।

अगर इजराइल में नई सरकार बनती है, तो रक्षा समझौतों की प्राथमिकताओं और बातचीत की शैली में कुछ बदलाव संभव हैं। लेकिन भारत जैसे बड़े रक्षा साझेदार के साथ मौजूदा सहयोग को अचानक समाप्त करना इजराइल के लिए भी आसान फैसला नहीं होगा।

क्या रक्षा सौदों और व्यापार पर पड़ेगा असर?

भारत और इजराइल के बीच आर्थिक संबंध भी महत्वपूर्ण हैं। समाचार रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 में दोनों देशों के बीच वस्तुओं, सेवाओं और हीरों सहित कुल व्यापार लगभग 5 अरब डॉलर रहा।

दोनों देश निवेश बढ़ाने और आर्थिक सहयोग को व्यापक बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं। मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर बातचीत भी इस साझेदारी के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

नेतृत्व परिवर्तन होने पर व्यापारिक वार्ताओं की गति प्रभावित हो सकती है। नई सरकार अपनी आर्थिक प्राथमिकताओं के अनुसार कुछ मुद्दों की समीक्षा भी कर सकती है। फिर भी, दोनों देशों के कारोबारी हित और लंबे समय से चल रहे समझौते संबंधों को निरंतरता देने में मदद कर सकते हैं।

भारत के लिए आधुनिक तकनीक, रक्षा उत्पादन और कृषि संबंधी नवाचार महत्वपूर्ण हैं। वहीं, इजराइल के लिए भारत का विशाल बाजार और निवेश की संभावनाएं आकर्षक हैं। इसलिए दोनों देशों के पास सहयोग जारी रखने के पर्याप्त व्यावहारिक कारण मौजूद हैं।

नेतन्याहू के बिना भी जारी रह सकता है सहयोग

भारत-इजराइल संबंधों का पिछला अनुभव भी इस संभावना को मजबूत करता है। वर्ष 2021 में नेतन्याहू के सत्ता से बाहर होने के बाद नफ्ताली बेनेट और याइर लापिड के नेतृत्व में सरकार बनी थी। उस दौरान भी दोनों देशों के बीच रक्षा और रणनीतिक सहयोग जारी रहा।

भारत, इजराइल, अमेरिका और संयुक्त अरब अमीरात के बीच I2U2 समूह के गठन ने भी क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग को आगे बढ़ाने में भूमिका निभाई। रक्षा क्षेत्र में बातचीत और विभिन्न साझेदारियां भी जारी रहीं।

इससे संकेत मिलता है कि भारत-इजराइल संबंध किसी एक राजनीतिक दल या प्रधानमंत्री तक सीमित नहीं हैं। दोनों देशों की नौकरशाही, रक्षा प्रतिष्ठान, कारोबारी संस्थाएं और रणनीतिक जरूरतें भी इस रिश्ते को दिशा देती हैं।

यदि गादी आइजनकोट के नेतृत्व वाले खेमे को सरकार बनाने का अवसर मिलता है, तो नई सरकार के सामने भी सुरक्षा और रक्षा क्षेत्र की चुनौतियां बनी रहेंगी। ऐसे में भारत के साथ सहयोग जारी रखना उसके लिए व्यावहारिक विकल्प हो सकता है।

गाजा और फिलिस्तीन के मुद्दे पर बदल सकता है कूटनीतिक संतुलन

भारत-इजराइल संबंधों पर चर्चा करते समय गाजा और फिलिस्तीन का मुद्दा भी महत्वपूर्ण है। भारत इजराइल के साथ रणनीतिक संबंध बनाए रखने के साथ-साथ फिलिस्तीन के लोगों के अधिकारों और दो-राज्य समाधान के समर्थन की अपनी घोषित नीति भी रखता है।

यदि इजराइल में नई सरकार गाजा और फिलिस्तीन के मामले में अपेक्षाकृत अलग दृष्टिकोण अपनाती है, तो भारत के लिए पश्चिम एशिया में अपने कूटनीतिक संतुलन को साधने के कुछ नए अवसर बन सकते हैं।

भारत के अरब देशों के साथ ऊर्जा, व्यापार, निवेश और भारतीय प्रवासियों से जुड़े महत्वपूर्ण हित हैं। इसलिए नई दिल्ली के लिए इजराइल के साथ सहयोग और अरब देशों के साथ मजबूत संबंधों के बीच संतुलन बनाए रखना लगातार महत्वपूर्ण रहेगा।

हालांकि, केवल सरकार बदलने से इजराइल की नीतियों में बड़े बदलाव की गारंटी नहीं है। वहां की घरेलू राजनीति, सुरक्षा स्थिति और गठबंधन की संरचना भी निर्णयों को प्रभावित करेगी।

IMEC कॉरिडोर पर भी रहेगी दुनिया की नजर

भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) भारत की कनेक्टिविटी और व्यापार रणनीति का एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव है। इसका उद्देश्य भारत, पश्चिम एशिया और यूरोप के बीच परिवहन तथा आर्थिक संपर्क को बेहतर बनाना है।

इस परियोजना की प्रगति क्षेत्रीय सहयोग और राजनीतिक स्थिरता से जुड़ी हुई है। इजराइल तथा अरब देशों के बीच संबंधों में सुधार होने पर इसके क्रियान्वयन के लिए अनुकूल माहौल बन सकता है। दूसरी ओर, क्षेत्रीय तनाव बढ़ने पर परियोजना की रफ्तार प्रभावित हो सकती है।

इसलिए भारत के लिए इजराइल में राजनीतिक स्थिरता और पश्चिम एशिया में शांति दोनों महत्वपूर्ण हैं।

भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या होगी?

यदि नेतन्याहू सत्ता में वापस नहीं आते, तो भारत को नई सरकार के साथ राजनीतिक संवाद और आपसी विश्वास मजबूत करने की जरूरत होगी। प्रधानमंत्री मोदी और नेतन्याहू के बीच दिखाई देने वाली व्यक्तिगत गर्मजोशी की जगह नई नेतृत्व शैली ले सकती है।

नई सरकार की प्राथमिकताओं को समझना, लंबित व्यापारिक वार्ताओं को आगे बढ़ाना और रक्षा सहयोग को मजबूत बनाए रखना भारत की कूटनीति के लिए अहम होगा।

इसके अलावा, यदि गठबंधन बनाने में लंबा समय लगता है या दोबारा चुनाव कराने की नौबत आती है, तो कुछ बड़े नीतिगत फैसलों में देरी हो सकती है। ऐसी स्थिति में भारत को धैर्य और निरंतर संवाद की नीति अपनानी पड़ सकती है।

निष्कर्ष: चेहरा बदल सकता है, साझेदारी नहीं

इजराइल में नेतन्याहू की राजनीतिक स्थिति भारत के लिए निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन दोनों देशों के संबंधों का भविष्य केवल उनके राजनीतिक भविष्य से तय नहीं होगा।

रक्षा सहयोग, आधुनिक तकनीक, कृषि, व्यापार और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे साझा हित भारत और इजराइल को करीब लाते हैं। पिछला अनुभव भी बताता है कि इजराइल में सरकार बदलने के बावजूद द्विपक्षीय सहयोग जारी रह सकता है।

ऐसे में यदि नेतन्याहू चुनाव के बाद सत्ता से बाहर होते हैं, तो भारत-इजराइल संबंधों में संवाद की शैली और कूटनीतिक प्राथमिकताओं में बदलाव संभव है। लेकिन रक्षा सौदों और रणनीतिक साझेदारी के पूरी तरह टूटने की आशंका को फिलहाल बढ़ा-चढ़ाकर देखना उचित नहीं होगा।

सीधी बात यह है कि नेतन्याहू का राजनीतिक भविष्य भारत के लिए अहम है, लेकिन भारत-इजराइल संबंधों की असली ताकत दोनों देशों के साझा हितों में है। नई सरकार चाहे जिसकी बने, दिल्ली की कोशिश यही होगी कि यह महत्वपूर्ण साझेदारी मजबूत बनी रहे।

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