नई दिल्ली: पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच लगातार बढ़ते सैन्य तनाव ने अब अंतरराष्ट्रीय राजनीति को भी नई दिशा दे दी है। जहां हाल के दिनों में भारत ने अफगानिस्तान के साथ अपने संबंध मजबूत करने के संकेत दिए हैं, वहीं अमेरिका ने खुलकर पाकिस्तान का समर्थन करते हुए कहा है कि इस्लामाबाद को आतंकवादी हमलों से अपनी रक्षा करने का पूरा अधिकार है। अमेरिकी विदेश विभाग (US State Department) के इस बयान ने दक्षिण एशिया की बदलती रणनीतिक तस्वीर को और अधिक जटिल बना दिया है।
अमेरिकी बयान ऐसे समय आया है जब पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच सीमा पर लगातार हवाई हमले, ड्रोन हमले और सैन्य झड़पें हो रही हैं। दोनों देशों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज है और सीमा पर हालात बेहद तनावपूर्ण बने हुए हैं।
अमेरिका ने क्या कहा?
अमेरिकी विदेश विभाग ने अपने आधिकारिक बयान में कहा कि पाकिस्तान कई वर्षों से आतंकवाद का शिकार रहा है और उसे अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने का अधिकार है। अमेरिका ने कहा कि वह पाकिस्तान द्वारा आतंकवादी हमलों के खिलाफ उठाए गए कदमों का समर्थन करता है। इस बयान को पाकिस्तान के पक्ष में खुला समर्थन माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका का यह रुख इस बात का संकेत है कि वॉशिंगटन अभी भी आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान को एक महत्वपूर्ण साझेदार के रूप में देखता है। अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि सीमा पार सक्रिय आतंकी संगठनों से निपटने के लिए पाकिस्तान की सुरक्षा चिंताओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
27 जून की एयरस्ट्राइक से बढ़ा विवाद
तनाव की सबसे बड़ी वजह 27 जून को पाकिस्तान द्वारा अफगानिस्तान के भीतर की गई एयरस्ट्राइक बनी। पाकिस्तान का दावा था कि उसने उन ठिकानों को निशाना बनाया जहां तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) और उससे जुड़े आतंकी समूह मौजूद थे।
हालांकि संयुक्त राष्ट्र की शुरुआती रिपोर्ट के अनुसार इस कार्रवाई में कम से कम 28 नागरिकों की मौत हुई और लगभग 49 लोग घायल हुए। इनमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल बताए गए। इस घटना के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान की कार्रवाई की आलोचना भी हुई।
पाकिस्तान ने क्यों की कार्रवाई?
पाकिस्तान का कहना है कि कराची में सिंध रेंजर्स के मुख्यालय पर हुए आतंकी हमले में उसके तीन जवान मारे गए थे। इस हमले के पीछे पाकिस्तान ने TTP से जुड़े संगठन जमात-उल-अहरार का हाथ बताया।
इस्लामाबाद का आरोप है कि ऐसे आतंकी संगठन अफगानिस्तान की सीमा के भीतर सुरक्षित ठिकानों से पाकिस्तान में हमले करते हैं। पाकिस्तान लंबे समय से काबुल से इन संगठनों के खिलाफ कार्रवाई की मांग करता रहा है।
अफगानिस्तान ने क्या जवाब दिया?
अफगानिस्तान की तालिबान सरकार ने पाकिस्तान के आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। काबुल का कहना है कि पाकिस्तान अपनी आंतरिक सुरक्षा विफलताओं का दोष अफगानिस्तान पर डाल रहा है।
तालिबान सरकार ने यह भी दावा किया कि पाकिस्तान की कार्रवाई के जवाब में उसने सीमावर्ती इलाकों में जवाबी हमले किए। दोनों देशों के बीच कई दिनों तक गोलीबारी और सैन्य गतिविधियां जारी रहीं।
तालिबान ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि पाकिस्तान भविष्य में ऐसी कार्रवाई दोहराता है तो उसे और कड़ा जवाब दिया जाएगा।
सीमा पर लगातार बढ़ रहा तनाव
फरवरी से ही दोनों देशों के बीच तनाव बना हुआ है। पाकिस्तान ने पहले भी नंगरहार, पकतीका और खोस्त प्रांतों में हवाई हमले किए थे। इसके बाद अफगानिस्तान ने भी जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी थी।
अब हालात ऐसे हैं कि सीमा पर लगातार सैन्य तैनाती बढ़ाई जा रही है। ड्रोन गतिविधियों में भी तेजी आई है। दोनों देशों के बीच भरोसे का संकट गहरा गया है।
भारत की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण?
हाल के महीनों में भारत और अफगानिस्तान के बीच संपर्क बढ़ा है। भारत मानवीय सहायता, विकास परियोजनाओं और कूटनीतिक संवाद के जरिए अफगानिस्तान के साथ रिश्ते मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।
भारत ने हमेशा यह कहा है कि अफगानिस्तान की धरती का इस्तेमाल किसी भी देश के खिलाफ आतंकवाद के लिए नहीं होना चाहिए। साथ ही भारत क्षेत्रीय स्थिरता और शांतिपूर्ण समाधान का समर्थन करता रहा है।
इसी वजह से अमेरिका का पाकिस्तान समर्थक बयान दक्षिण एशिया की कूटनीतिक राजनीति में नई चर्चा का विषय बन गया है।
अमेरिका-पाकिस्तान संबंध फिर क्यों मजबूत हो रहे हैं?
विश्लेषकों के अनुसार राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दोबारा व्हाइट हाउस लौटने के बाद अमेरिका और पाकिस्तान के संबंधों में सुधार देखने को मिला है।
इसके पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं—
आतंकवाद विरोधी सहयोग।
क्षेत्रीय सुरक्षा में पाकिस्तान की भूमिका।
ईरान और पश्चिम एशिया से जुड़े कूटनीतिक प्रयास।
अफगानिस्तान की बदलती सुरक्षा स्थिति।
पाकिस्तान लंबे समय से अमेरिका का एक प्रमुख Non-NATO Ally रहा है। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में दोनों देशों के संबंधों में उतार-चढ़ाव देखने को मिला था, लेकिन अब दोनों के बीच सहयोग फिर बढ़ता दिखाई दे रहा है।
TTP क्यों है सबसे बड़ी चुनौती?
तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) पाकिस्तान के लिए सबसे बड़े आतंकी खतरों में से एक है। यह संगठन पाकिस्तान के भीतर सुरक्षा बलों, सरकारी प्रतिष्ठानों और नागरिकों पर हमलों के लिए जिम्मेदार माना जाता है।
पाकिस्तान का आरोप है कि TTP के कई लड़ाके अफगानिस्तान में शरण लेते हैं और वहीं से पाकिस्तान के खिलाफ हमलों की योजना बनाते हैं।
दूसरी ओर अफगानिस्तान इन आरोपों को लगातार नकारता रहा है।
संयुक्त राष्ट्र की चिंता
संयुक्त राष्ट्र ने दोनों देशों से संयम बरतने की अपील की है। संगठन ने सीमा पार सैन्य कार्रवाई में नागरिकों की मौत पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि किसी भी प्रकार की सैन्य कार्रवाई में अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानूनों का पालन किया जाना चाहिए।
संयुक्त राष्ट्र ने दोनों पक्षों से बातचीत के जरिए विवाद सुलझाने की अपील भी की है।
आगे क्या हो सकता है?
अमेरिका के बयान के बाद पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कूटनीतिक समर्थन जरूर मिला है, लेकिन इससे क्षेत्रीय तनाव कम होने की संभावना फिलहाल कम दिखाई देती है।
यदि सीमा पर सैन्य कार्रवाई जारी रहती है तो दक्षिण एशिया की सुरक्षा स्थिति और अधिक गंभीर हो सकती है। भारत, चीन, ईरान, रूस और मध्य एशियाई देशों की भी इस पूरे घटनाक्रम पर नजर बनी हुई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस विवाद का स्थायी समाधान केवल कूटनीतिक बातचीत, आतंकवाद के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई और सीमा प्रबंधन को मजबूत बनाने से ही संभव है।
अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा विवाद अब केवल दो देशों का मामला नहीं रह गया है। अमेरिका के पाकिस्तान समर्थक बयान ने इस संघर्ष को वैश्विक कूटनीतिक महत्व दे दिया है। एक ओर पाकिस्तान आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई का दावा कर रहा है, वहीं अफगानिस्तान इसे अपनी संप्रभुता पर हमला बता रहा है। ऐसे में आने वाले दिनों में दक्षिण एशिया की सुरक्षा, कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर इस घटनाक्रम का गहरा असर पड़ सकता है।














