“आप लोग गंगा को बहुत बर्बाद कर चुके हैं” — सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी, यूपी-बिहार समेत राज्यों को अतिक्रमण हटाने का आदेश; अब बहाने नहीं, कार्रवाई का वक्त
नई दिल्ली।
गंगा सिर्फ एक नदी नहीं है। करोड़ों लोगों की आस्था, करोड़ों की आजीविका और देश के विशाल भूभाग की जीवनरेखा से जुड़ा यह जलस्रोत वर्षों से प्रदूषण, अतिक्रमण, अवैध निर्माण और बाढ़ क्षेत्र में बढ़ते मानवीय हस्तक्षेप का दबाव झेल रहा है। सरकारी योजनाओं, हजारों करोड़ रुपये के खर्च और लगातार किए जाते दावों के बावजूद अगर देश की सर्वोच्च अदालत को यह कहना पड़े कि “आप लोग गंगा को बहुत बर्बाद कर चुके हैं”, तो यह केवल एक न्यायिक टिप्पणी नहीं, बल्कि व्यवस्था के कामकाज पर गंभीर सवाल है।
गंगा की बदहाल स्थिति और नदी के किनारों पर अतिक्रमण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश, बिहार समेत संबंधित राज्यों को कड़ी फटकार लगाते हुए साफ संकेत दिया है कि अब नदी संरक्षण के नाम पर केवल कागजी कार्रवाई स्वीकार नहीं की जाएगी। अदालत ने गंगा के किनारों से अवैध कब्जे हटाने और नदी तथा उसके बाढ़ क्षेत्र को अतिक्रमण से मुक्त करने की दिशा में ठोस कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।
सवाल सीधा है—अगर नदी का प्राकृतिक रास्ता ही कब्जों और निर्माण से घिर जाएगा तो बाढ़ का पानी जाएगा कहां? और अगर नदी के किनारे लगातार मानवीय दखल बढ़ता रहेगा, तो गंगा को साफ करने की तमाम योजनाओं का वास्तविक लाभ आखिर कितना होगा?
सुप्रीम कोर्ट की दो टूक—अब जिम्मेदारी आपकी है
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने गंगा की स्थिति को लेकर गंभीर चिंता जताई। अदालत की नाराजगी का केंद्र केवल प्रदूषण नहीं, बल्कि नदी के किनारों और बाढ़ क्षेत्र में मौजूद अतिक्रमण भी है।
अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया कि दशकों से नदी के संरक्षण के नाम पर निर्देश जारी होते रहे, लेकिन जमीन पर अपेक्षित परिणाम दिखाई नहीं दिए। यही वजह है कि इस बार न्यायालय का रुख पहले की तुलना में कहीं अधिक सख्त दिखाई दिया।
कोर्ट की टिप्पणी का सार बेहद गंभीर है—गंगा को नुकसान पहुंचाने के बाद अब उसे बचाने की जिम्मेदारी भी सरकारों और प्रशासन की है।
यानी अब सवाल यह नहीं कि नदी को बचाने के लिए नई योजना कब बनेगी। सवाल यह है कि जो नियम पहले से मौजूद हैं, उनका पालन कब होगा?
नदी के किनारे अवैध कब्जे हैं तो उन्हें हटाने की जिम्मेदारी किसकी है? बाढ़ क्षेत्र में निर्माण हुआ है तो उसकी निगरानी किसने की? और अगर वर्षों से अतिक्रमण मौजूद हैं तो कार्रवाई अब तक क्यों नहीं हुई?
बिहार को 12 हफ्ते की मोहलत, बाढ़ की स्थिति बनी आधार
बिहार के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य में बाढ़ और पानी के भारी बहाव की स्थिति को भी ध्यान में रखा। अदालत ने अवैध कब्जे हटाने के लिए बिहार को 12 सप्ताह का समय दिया है।
यह समय किसी राहत के तौर पर नहीं, बल्कि मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए दिया गया है। अदालत का संदेश साफ है कि बाढ़ की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए प्रशासन को व्यवस्थित कार्रवाई करनी होगी, लेकिन कार्रवाई से बचने की गुंजाइश नहीं है।
बिहार जैसे राज्य में गंगा और उसकी सहायक नदियों का नेटवर्क बाढ़ की स्थिति को सीधे प्रभावित करता है। ऐसे में नदी के प्राकृतिक बहाव क्षेत्र में अतिक्रमण का सवाल केवल पर्यावरण का विषय नहीं रह जाता। यह सीधे-सीधे जनसुरक्षा, कृषि, आवास और आपदा प्रबंधन से जुड़ जाता है।
अगर नदी का बाढ़ क्षेत्र सिकुड़ता है और पानी के प्राकृतिक फैलाव का रास्ता अवरुद्ध होता है, तो उसका असर आखिरकार उन्हीं लोगों पर पड़ता है जो नदी के आसपास रहते हैं।
पुराने आदेशों का असर क्यों नहीं दिखा?
सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि अदालत के मुताबिक पहले भी आदेश दिए जा चुके हैं। लेकिन अगर पुराने निर्देशों के बावजूद स्थिति में पर्याप्त सुधार नहीं हुआ, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि प्रशासनिक तंत्र आखिर कर क्या रहा था?
न्यायालय का आदेश कागज पर जारी होना आसान है। असली परीक्षा तब होती है जब उसे जमीन पर लागू करना होता है।
नदी के किनारे वर्षों से बने अवैध निर्माण, कब्जे और अन्य गतिविधियां अचानक पैदा नहीं होतीं। इनके लिए निर्माण होता है, जमीन का इस्तेमाल बदलता है, रास्ते बनते हैं और किसी न किसी स्तर पर प्रशासनिक निगरानी की जरूरत होती है।
ऐसे में जवाबदेही केवल उस व्यक्ति की नहीं हो सकती जिसने कथित तौर पर कब्जा किया। सवाल उस पूरी व्यवस्था से भी होना चाहिए जिसकी निगरानी के बावजूद ऐसा कब्जा लंबे समय तक बना रहा।
अगर अतिक्रमण वर्षों तक दिखाई नहीं दिया तो निगरानी व्यवस्था कितनी प्रभावी थी?
और अगर दिखाई दिया, तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
यूपी समेत 11 राज्यों पर अदालत की नजर
गंगा और उससे जुड़े नदी क्षेत्र को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश और बिहार समेत कुल 11 राज्यों को नोटिस जारी किए हैं।
इनमें उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल, झारखंड, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और दिल्ली शामिल हैं।
अदालत ने इन राज्यों से नदी के किनारों पर हुए अतिक्रमण तथा बाढ़ के मैदानों की सीमा तय करने से संबंधित विस्तृत जानकारी मांगी है।
यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि नदी को केवल उसके बहते पानी तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। नदी का अपना प्राकृतिक क्षेत्र होता है। बाढ़ के समय पानी जिन क्षेत्रों तक फैलता है, वे नदी की पारिस्थितिकी और जल प्रवाह के लिहाज से महत्वपूर्ण होते हैं।
यदि इन क्षेत्रों पर निर्माण और कब्जे बढ़ते हैं तो नदी के प्राकृतिक व्यवहार में बदलाव आता है।
यही वजह है कि बाढ़ क्षेत्र की पहचान और उसकी सीमा तय करना महज प्रशासनिक औपचारिकता नहीं, बल्कि नदी संरक्षण की बुनियादी आवश्यकता है।
गंगा की सफाई पर अरबों के सवाल, नतीजे पर निगाह
गंगा सफाई को लेकर केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से वर्षों से योजनाएं चलती रही हैं। सीवेज ट्रीटमेंट, औद्योगिक प्रदूषण पर नियंत्रण, घाटों का विकास और नदी पुनर्जीवन जैसे कई स्तरों पर काम किए जाने के दावे सामने आते रहे हैं।
लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बना देने से गंगा बच जाएगी?
अगर नदी के किनारे अतिक्रमण जारी रहे, बाढ़ क्षेत्र सिकुड़ता जाए और प्राकृतिक जलप्रवाह में लगातार हस्तक्षेप होता रहे, तो नदी की सेहत सुधारने की लड़ाई अधूरी ही रहेगी।
सुप्रीम कोर्ट की मौजूदा सख्ती इसी व्यापक समस्या की ओर इशारा करती दिखाई देती है।
नदी संरक्षण केवल सफाई अभियान नहीं है। यह नदी के पूरे पारिस्थितिक तंत्र को बचाने का सवाल है।
अतिक्रमण पर अब कार्रवाई या फिर एक और रिपोर्ट?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि राज्यों की ओर से अदालत में क्या रिपोर्ट पेश की जाएगी और उसके बाद जमीन पर कितना बदलाव दिखाई देगा।
क्योंकि देश में पर्यावरणीय मामलों में एक पुरानी समस्या रही है—आदेश आते हैं, समितियां बनती हैं, रिपोर्ट तैयार होती है और फिर अगली कार्रवाई की तारीख आ जाती है।
लेकिन नदी किनारे खड़ा अवैध निर्माण वहीं बना रहता है।
सुप्रीम कोर्ट की सख्ती ने अब राज्यों और प्रशासन के सामने एक स्पष्ट कसौटी रख दी है। उन्हें यह बताना होगा कि नदी किनारे कहां-कहां अतिक्रमण है, बाढ़ क्षेत्र की सीमा क्या है और उसे मुक्त कराने के लिए क्या कार्रवाई की जा रही है।
यहां पारदर्शिता बेहद जरूरी है।
किस क्षेत्र में कितना अतिक्रमण है?
किसके आदेश से या किसकी अनुमति से निर्माण हुआ?
किसे नोटिस दिया गया?
कितने कब्जे हटाए गए?
कितने मामलों में कार्रवाई लंबित है?
इन सवालों के जवाब केवल सरकारी फाइलों में नहीं, बल्कि जमीन पर भी दिखाई देने चाहिए।
केंद्र का हलफनामा भी महत्वपूर्ण, जलविद्युत परियोजनाओं पर रुख साफ
इसी मामले में केंद्र सरकार के पर्यावरण, जल शक्ति और बिजली मंत्रालयों की ओर से सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा भी दाखिल किया गया है।
केंद्र ने कहा है कि उत्तराखंड की अलकनंदा और भागीरथी नदी घाटियों में पहले से मंजूर सात परियोजनाओं के अलावा किसी नई जलविद्युत परियोजना का समर्थन नहीं किया जाएगा।
यह रुख इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हिमालयी नदी घाटियों में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन को लेकर लंबे समय से बहस चलती रही है।
ऊर्जा की जरूरत अपनी जगह है और देश के विकास के लिए बिजली परियोजनाओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। लेकिन सवाल यह है कि विकास की कीमत नदी के प्राकृतिक प्रवाह और पारिस्थितिकी से कितनी वसूली जा सकती है?
उत्तराखंड की नदियां केवल बिजली उत्पादन का स्रोत नहीं हैं। वे गंगा नदी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
इसलिए किसी भी परियोजना का मूल्यांकन केवल बिजली उत्पादन की क्षमता से नहीं, बल्कि उसके दीर्घकालिक पर्यावरणीय प्रभावों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।
गंगा को बचाने के लिए अब ‘कागज’ नहीं, जमीन पर दिखनी चाहिए कार्रवाई
सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी को एक चेतावनी की तरह देखा जाना चाहिए। यह चेतावनी केवल उत्तर प्रदेश या बिहार के लिए नहीं है। गंगा बेसिन से जुड़े सभी राज्यों के लिए यह संदेश है कि नदी संरक्षण को अब घोषणाओं और योजनाओं के दायरे से निकालकर वास्तविक कार्रवाई में बदलना होगा।
गंगा की सफाई के नाम पर वर्षों से अभियान चल रहे हैं। लेकिन अगर नदी किनारे अतिक्रमण हटाने के लिए अदालत को बार-बार हस्तक्षेप करना पड़े, तो सवाल उठना लाजिमी है कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति कहां है?
गंगा को बचाने का मतलब सिर्फ गंदा पानी रोकना नहीं है।
गंगा को बचाने का मतलब उसके किनारे, उसका बाढ़ क्षेत्र, उसका प्राकृतिक प्रवाह और उसका पूरा पारिस्थितिक तंत्र बचाना भी है।
अब गेंद राज्यों के पाले में है।
अदालत ने समय दिया है। आदेश दिया है। सवाल उठाए हैं।
अब देखना यह है कि सरकारें और प्रशासन इस बार भी रिपोर्टों का पुलिंदा लेकर अदालत पहुंचेंगे या गंगा के किनारों पर वास्तविक बदलाव दिखाई देगा।
क्योंकि गंगा की हालत पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी केवल एक न्यायिक टिप्पणी बनकर नहीं रहनी चाहिए।
यह उस व्यवस्था के लिए आईना है, जो वर्षों से नदी को बचाने का दावा करती रही है।
अब दावा नहीं—नतीजा चाहिए।
कागज नहीं—कार्रवाई चाहिए।
और सबसे बढ़कर, गंगा के किनारों पर कब्जे नहीं—नदी का अपना प्राकृतिक अधिकार चाहिए।















