“करोड़ों की चमक, आधुनिक रिसेप्शन और सुशासन के बड़े-बड़े दावे! लेकिन अगर आम आदमी को अपनी फरियाद सुनाने के लिए भी दरवाजों पर अनुमति तलाशनी पड़े, तो सवाल उठेगा ही—क्या नोएडा प्राधिकरण की नई इमारत में व्यवस्था बदली है या सिर्फ अफसरशाही का पता बदला है?”
नोएडा। सरकारी व्यवस्था का भी अपना एक कमाल है। यहां कभी-कभी इमारतें भविष्य की बनती हैं, लेकिन उनके भीतर बैठी कार्यशैली अतीत से बाहर निकलने को तैयार नहीं होती। बाहर चमचमाता शीशा, भीतर फाइलों का पुराना संसार; प्रवेश द्वार पर आधुनिकता का स्वागत और नागरिक के सामने प्रक्रियाओं की दीवार! नोएडा प्राधिकरण के नए कार्यालय को लेकर उठ रहे सवाल इसी विरोधाभास की ओर इशारा करते हैं।
इमारत आधुनिक हो, सुविधाएं बेहतर हों और कार्यालय का स्वरूप किसी अंतरराष्ट्रीय संस्थान जैसा दिखाई दे, तो इसमें बुराई क्या है? निश्चित रूप से यह स्वागत योग्य है। लेकिन विकास की असली परीक्षा संगमरमर, शीशे, फर्नीचर और आकर्षक रिसेप्शन से नहीं होती। परीक्षा तब होती है, जब एक आम नागरिक हाथ में शिकायत लेकर पहुंचता है और उसे यह पता लगाने में आधा दिन न लग जाए कि उसकी बात सुनेगा कौन, उसे किससे मिलना है और उसकी फाइल आखिर किस मेज पर सांस ले रही है।
यहीं से नोएडा प्राधिकरण के नए कार्यालय की कहानी एक इमारत की कहानी नहीं रह जाती। यह उस प्रशासनिक मानसिकता का सवाल बन जाती है, जिसमें जनता को सुविधा देने के लिए बनाए गए इंतजाम कहीं जनता की पहुंच नियंत्रित करने का माध्यम तो नहीं बन रहे?
उद्घाटन में आधुनिकता, संचालन में पुरानी कहानी!
28 जून 2024 को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने नोएडा प्राधिकरण के नए कार्यालय को जनता को समर्पित किया था। तत्कालीन मुख्य कार्यपालक अधिकारी लोकेश एम. की पहल पर तैयार इस कार्यालय की परिकल्पना आधुनिक स्वागत व्यवस्था और व्यवस्थित प्रशासनिक संचालन के रूप में की गई थी।
मकसद साफ था। नागरिक कार्यालय में आए, रिसेप्शन पर अपनी समस्या बताए और उसकी शिकायत संबंधित विभाग तक पहुंचाने की प्रक्रिया शुरू हो जाए। उसे यह पता लगाने के लिए गलियारों की खाक न छाननी पड़े कि किस अधिकारी का कमरा कहां है और किस कर्मचारी के पास उसकी फाइल अटकी हुई है।
यह सोच आधुनिक प्रशासन के अनुरूप थी। जनता और अधिकारी के बीच एक व्यवस्थित संपर्क बिंदु हो, शिकायत दर्ज करने की स्पष्ट प्रक्रिया हो और नागरिक का समय बचे—आखिर सरकारी कार्यालयों का आधुनिकीकरण इसी उद्देश्य से तो किया जाता है।
लेकिन अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह व्यवस्था अपने मूल उद्देश्य के अनुरूप चल रही है? क्या रिसेप्शन नागरिक की मदद करने का केंद्र बना हुआ है या प्रवेश की औपचारिकताओं का एक और पड़ाव बनता जा रहा है?
यदि नागरिकों को अधिकारियों तक पहुंचने के लिए पास, अनुमति और अतिरिक्त प्रक्रियाओं में उलझना पड़ रहा है, तो प्राधिकरण को बताना चाहिए कि इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य क्या है। सुरक्षा के लिए नियम जरूरी हैं, लेकिन सुरक्षा और ऐसी जटिलता के बीच अंतर भी समझना होगा, जो जनता की परेशानी बढ़ा दे।
आखिर रिसेप्शन बनाया किसलिए गया था—नागरिक का रास्ता आसान करने के लिए या उसके रास्ते में एक और दरवाजा खड़ा करने के लिए?
कुर्सियां बदलीं, प्राथमिकताएं बदलीं या सिर्फ नियमों की व्याख्या?
सरकारी संस्थानों में एक पुरानी समस्या है। योजनाएं किसी दूरदर्शी सोच के साथ शुरू होती हैं, लेकिन समय के साथ उनका स्वरूप बदलने लगता है। अधिकारी बदलते हैं, जिम्मेदारियां बदलती हैं, प्राथमिकताएं बदलती हैं और कभी-कभी व्यवस्था का मूल उद्देश्य भी फाइलों के बीच कहीं खो जाता है।
नोएडा प्राधिकरण के नए कार्यालय को लेकर उठ रहे सवालों में भी यही आशंका दिखाई देती है। यदि नागरिकों की सुविधा को ध्यान में रखकर तैयार की गई व्यवस्था अब अधिक प्रतिबंधात्मक होती जा रही है, तो यह देखना जरूरी है कि बदलाव किसने किया, क्यों किया और उससे जनता को क्या लाभ मिला।
यह किसी व्यक्ति विशेष की तारीफ या आलोचना का मामला भर नहीं है। असली सवाल संस्थागत निरंतरता का है। क्या अच्छी व्यवस्था किसी अधिकारी के कार्यकाल तक ही सीमित रहती है, या उसके जाने के बाद भी उसी उद्देश्य के साथ चलती है?
अगर हर नए प्रबंधन के साथ नागरिक सुविधाओं की परिभाषा बदलने लगे, तो फिर योजनाओं की सफलता किस आधार पर मापी जाएगी?
सरकारी व्यवस्था में अधिकारी का पद महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन पद से भी अधिक महत्वपूर्ण उस पद की जिम्मेदारी है। जनता की सुविधा किसी व्यक्ति की निजी पसंद नहीं, प्रशासनिक दायित्व होनी चाहिए।
आम आदमी के लिए पास, रसूखदार के लिए रास्ता? यही है असली सवाल!
इस पूरे प्रकरण का सबसे संवेदनशील पहलू प्रवेश व्यवस्था में समानता को लेकर उठने वाली आशंकाएं हैं। आरोप लगाए जा रहे हैं कि आम नागरिकों को अधिकारियों तक पहुंचने में औपचारिकताओं का सामना करना पड़ सकता है, जबकि प्रॉपर्टी कारोबार से जुड़े कुछ लोगों, ठेकेदारों और बिचौलियों की आवाजाही अपेक्षाकृत सहज दिखाई देती है।
इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना जरूरी है। किसी व्यक्ति का प्राधिकरण में आना-जाना अपने आप में किसी गड़बड़ी का प्रमाण नहीं है। आवंटी, अधिवक्ता, ठेकेदार और कारोबारी अपने वैध काम के लिए अधिकारियों से मिल सकते हैं। लेकिन यदि अलग-अलग लोगों के लिए नियम अलग-अलग ढंग से लागू होते हैं, तो यह प्रशासनिक निष्पक्षता का गंभीर प्रश्न बन जाता है।
क्योंकि सरकारी दफ्तर कोई निजी बैठकखाना नहीं है, जहां पहचान के आधार पर प्रवेश की सुविधा तय हो। यहां नियम सबके लिए समान होने चाहिए।
व्यंग्य देखिए—एक नागरिक अपनी जमीन, आवंटन, नक्शे, बकाया या शिकायत को लेकर आता है। उसे बताया जाए कि पहले प्रक्रिया पूरी कीजिए, अनुमति लीजिए, फिर आगे बढ़िए। दूसरी ओर, यदि किसी प्रभावशाली व्यक्ति को सहज पहुंच मिलती दिखाई दे, तो नागरिक के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर व्यवस्था किसके लिए सरल है?
लोकतंत्र में जनता मालिक कही जाती है, लेकिन सरकारी दफ्तरों में उसे कई बार अपनी ही समस्या पर सुनवाई पाने के लिए अनुमति तलाशनी पड़ती है। यही वह विरोधाभास है, जिसे दूर करना किसी भी जिम्मेदार प्रशासन की प्राथमिकता होनी चाहिए।
पर्दे के पीछे ठेकेदारी का खेल या महज प्रशासनिक व्यवस्था?
प्राधिकरण की स्वागत व्यवस्था, नागरिक सहायता और सिटीजन चार्टर से जुड़ी प्रक्रियाओं के बीच मैनपावर उपलब्ध कराने वाली एजेंसियों की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। लेकिन केवल चर्चाओं के आधार पर किसी ठेकेदार या अधिकारी को किसी निर्णय के पीछे का सूत्रधार घोषित कर देना उचित नहीं होगा।
फिर भी एक बुनियादी सवाल पूछना पूरी तरह जायज है—यदि व्यवस्था में बदलाव किया गया है, तो उसका लिखित आधार क्या है?
क्या प्रवेश प्रक्रिया बदलने का कोई आदेश जारी हुआ? क्या नागरिकों की सुविधा पर उसके प्रभाव का आकलन किया गया? रिसेप्शन और सहायता सेवाओं के संचालन की जिम्मेदारी किसकी है? संबंधित एजेंसी का कार्यक्षेत्र क्या है? और यदि नागरिकों को परेशानी हो रही है, तो उसकी शिकायत किस अधिकारी तक पहुंचेगी?
इन सवालों के जवाब आरोपों से नहीं, दस्तावेजों और पारदर्शिता से मिलने चाहिए।
किसी भी एजेंसी का काम सेवा उपलब्ध कराना है, जबकि नीतिगत निर्णयों की जवाबदेही प्राधिकरण के सक्षम अधिकारियों की होती है। यदि कहीं हितों के टकराव की आशंका है, तो उसका समाधान स्पष्ट नियमों, रिकॉर्ड और निष्पक्ष समीक्षा से ही निकल सकता है।
बात सीधी है—यदि व्यवस्था सही है, तो उसे सवालों से डरने की जरूरत नहीं। और यदि उसमें खामियां हैं, तो उन्हें छिपाने के बजाय सुधारना चाहिए।
नई इमारत में पुरानी अव्यवस्था का सामान भी पहुंच गया?
किसी सरकारी भवन की सफलता का आकलन केवल उसके उद्घाटन के दिन नहीं किया जा सकता। असली परीक्षा उसके रोजमर्रा के संचालन में होती है। इसी कसौटी पर कार्यालय की तैयारियों को लेकर उठ रही शिकायतें भी महत्वपूर्ण हैं।
दावे किए जा रहे हैं कि कार्यालय बदलने के बाद पुराने कार्यालय से कुछ फाइलों के स्थानांतरण में देरी हुई। बेसमेंट पार्किंग में वाहनों की मार्किंग, फर्श और सफाई व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठे हैं। इन शिकायतों की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने की जिम्मेदारी प्राधिकरण की है।
यदि फाइलें समय पर स्थानांतरित नहीं हुईं, तो इसका असर केवल कागजों पर नहीं पड़ता। किसी आवंटी का काम रुक सकता है, किसी शिकायत का निस्तारण टल सकता है और किसी नागरिक को बार-बार कार्यालय के चक्कर लगाने पड़ सकते हैं।
इसी तरह पार्किंग की अव्यवस्था या रखरखाव में कमी मामूली बात लग सकती है, लेकिन प्रतिदिन कार्यालय आने वाले लोगों के लिए यही छोटी कमियां बड़ी परेशानी बनती हैं।
यानी इमारत का उद्घाटन एक दिन में हो सकता है, लेकिन सुचारु व्यवस्था प्रतिदिन चलानी पड़ती है।
यदि नई इमारत में भी पुरानी अव्यवस्था ने अपना ठिकाना बना लिया है, तो फिर आधुनिकीकरण का लाभ आखिर किसे मिला?
प्राधिकरण को स्पष्ट करना चाहिए कि फाइलों के स्थानांतरण की स्थिति क्या है, पार्किंग और सफाई की जिम्मेदारी किस विभाग या एजेंसी के पास है और शिकायतों के समाधान के लिए क्या कदम उठाए गए हैं।
मुख्यमंत्री की मंशा और जमीन की हकीकत के बीच कौन खड़ा है?
सरकारें आधुनिक प्रशासन, पारदर्शिता और नागरिक सुविधाओं की बात करती हैं। बड़ी योजनाएं बनती हैं, नई इमारतें तैयार होती हैं और व्यवस्थाओं को बेहतर बनाने के दावे किए जाते हैं। लेकिन किसी भी सरकार की असली सफलता इस बात से तय होती है कि इन प्रयासों का लाभ आम नागरिक तक कितना पहुंचता है।
यहीं प्रशासनिक तंत्र की असली परीक्षा होती है।
ऊपर से तय की गई अच्छी योजना यदि नीचे पहुंचकर प्रक्रियाओं के बोझ तले दब जाए, तो उसका उद्देश्य अधूरा रह जाता है। इसके लिए जरूरी नहीं कि कोई बड़ा राजनीतिक विवाद हो या कोई नीतिगत घोषणा वापस ले ली जाए। कई बार छोटी-छोटी प्रशासनिक व्याख्याएं ही नागरिक की सुविधा और परेशानी के बीच अंतर पैदा कर देती हैं।
इसलिए नोएडा प्राधिकरण के मामले में भी सवाल केवल यह नहीं है कि किस अधिकारी ने कौन-सा निर्णय लिया। सवाल यह है कि उस निर्णय से जनता को क्या मिला?
यदि पास व्यवस्था सुरक्षा के लिए आवश्यक है, तो उसका पारदर्शी और सरल स्वरूप बनाया जा सकता है। यदि किसी अधिकारी से मिलना जरूरी है, तो समय निर्धारित किया जा सकता है। यदि शिकायत रिसेप्शन पर दर्ज हो सकती है, तो उसकी संख्या और निस्तारण की स्थिति नागरिक को उपलब्ध कराई जा सकती है।
तकनीक का इस्तेमाल केवल आधुनिक दिखने के लिए नहीं, बल्कि नागरिकों की परेशानी कम करने के लिए होना चाहिए।
यही वह बिंदु है, जहां सुशासन का दावा जमीन पर उतरता है।
विकास की चमक में जनता की परेशानी क्यों छिपे?
नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना प्राधिकरण जैसे संस्थानों के सामने शहरी विकास के साथ-साथ नागरिक सुविधाओं को बेहतर बनाने की चुनौती है। आधुनिक कार्यालयों का निर्माण तभी सार्थक होगा, जब उनके भीतर कामकाज भी अधिक सरल, पारदर्शी और जवाबदेह बने।
इसके लिए किसी बड़े चमत्कार की जरूरत नहीं है। नागरिक सहायता केंद्र पर शिकायत दर्ज हो, हर शिकायत को एक विशिष्ट संख्या मिले, संबंधित विभाग तक उसे समय पर भेजा जाए और निस्तारण की समयसीमा स्पष्ट हो। जिन मामलों में अधिकारी से मुलाकात जरूरी हो, उनके लिए निर्धारित प्रक्रिया उपलब्ध हो।
इससे सुरक्षा भी बनी रहेगी, कार्यालय का अनुशासन भी और जनता की पहुंच भी बाधित नहीं होगी।
लेकिन यदि किसी नागरिक को केवल यह जानने के लिए कई स्तरों पर पूछताछ करनी पड़े कि उसकी समस्या किसके पास है, तो आधुनिक कार्यालय भी पुराने सरकारी ढर्रे का नया संस्करण ही साबित होगा।
याद रखना चाहिए कि जनता सरकारी भवन देखने नहीं, अपना काम कराने आती है। उसे दीवारों की चमक से अधिक अपनी फाइल की गति से मतलब है। उसे अंतरराष्ट्रीय शैली के डिजाइन से अधिक अपने समय की कीमत चाहिए।
अब जवाबदेही की बारी प्राधिकरण की है!
नोएडा प्राधिकरण को अब इन सवालों पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
क्या नए कार्यालय में नागरिकों की शिकायत दर्ज कराने की प्रक्रिया वास्तव में सरल है? क्या प्रवेश के नियम सभी के लिए समान रूप से लागू होते हैं? क्या रिसेप्शन नागरिक को संबंधित विभाग तक पहुंचाने में प्रभावी भूमिका निभा रहा है? क्या फाइलों के स्थानांतरण और पार्किंग जैसी व्यवस्थाओं से जुड़ी शिकायतों का समाधान हुआ है? और यदि कोई नागरिक अपनी समस्या लेकर आता है, तो उसे सुनवाई के लिए कितनी औपचारिकताओं से गुजरना पड़ता है?
इन सवालों का जवाब किसी प्रेस नोट की चमक से नहीं, बल्कि जमीन पर दिखाई देने वाली व्यवस्था से मिलना चाहिए।
यदि प्राधिकरण इन कमियों को दूर करता है, नियम स्पष्ट करता है और शिकायतों के निस्तारण की जवाबदेही तय करता है, तो यही नया कार्यालय नागरिक-केंद्रित प्रशासन का उदाहरण बन सकता है।
लेकिन यदि जनता की पहुंच को लेकर उठते सवाल अनसुने रह जाते हैं, तो इमारत की चमक के साथ-साथ व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठते रहेंगे।
आखिर आधुनिक प्रशासन का मतलब यह नहीं कि पुरानी लालफीताशाही को नई इमारत में शिफ्ट कर दिया जाए। आधुनिकता का अर्थ है—कम चक्कर, कम इंतजार, स्पष्ट नियम और समय पर समाधान।
नोएडा प्राधिकरण के सामने विकल्प साफ है। वह अपनी नई इमारत को जनता की सुविधा का केंद्र बनाए या उसे ऐसी व्यवस्था का प्रतीक बनने दे, जहां नागरिक दरवाजे पर खड़ा होकर अनुमति तलाशता रहे।
क्योंकि जनता को सरकारी दफ्तर की भव्यता नहीं, अपने काम की सुनवाई चाहिए। उसे अधिकारियों की कुर्सियों तक पहुंचने के लिए रसूख नहीं, स्पष्ट प्रक्रिया चाहिए। और उसे ऐसी व्यवस्था चाहिए, जहां उसकी पहचान नहीं, उसकी समस्या प्राथमिकता बने।
आखिरकार, इमारत चाहे अंतरराष्ट्रीय शैली में बन जाए, लेकिन अगर उसके भीतर फैसले लेने की सोच पुरानी ही रहे, तो यह आधुनिकीकरण नहीं—लालफीताशाही की नई पैकेजिंग है।
अब देखना यह है कि नोएडा प्राधिकरण शीशे की दीवारों के पार जनता की आवाज सुनता है या फिर आधुनिकता के इस चमकदार मंच पर पुरानी अफसरशाही का नाटक ही जारी रहता है।
फैसला इमारत की खूबसूरती नहीं करेगी। फैसला वहां बैठी व्यवस्था करेगी—और उसका मूल्यांकन जनता करेगी।















