“दीपों की स्वर्णिम आभा, वैदिक मंत्रों की पवित्र गूंज और सामूहिक प्रार्थना के बीच आध्यात्मिक चेतना का जागरण • गायत्री परिवार, नौएडा के तत्वावधान में आयोजित आयोजन में सद्विचार, श्रेष्ठ संस्कार, महिला सशक्तीकरण और सामाजिक समरसता का संदेश • परम वंदनीया माताजी के जन्म शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में दिल्ली में प्रस्तावित जनशताब्दी समारोह में सहभागिता का आह्वान”
नौएडा,
शक्ति की आराधना, आत्मशुद्धि और लोकमंगल की भावना से अनुप्राणित शारदीय नवरात्रि के पावन अवसर पर सेक्टर-120 स्थित आम्रपाली जोडिएक सोसायटी में श्रद्धा, साधना और सेवा का अनुपम संगम देखने को मिला। नवरात्रि के पांचवें दिन देर शाम गायत्री परिवार, नौएडा की ओर से शांतिकुंज, हरिद्वार के मार्गदर्शन में भव्य महा दीपयज्ञ का आयोजन किया गया। असंख्य दीपों की पावन आभा, वैदिक मंत्रों के उच्चारण और सामूहिक प्रार्थना के बीच उपस्थित श्रद्धालुओं ने विश्व शांति, सामाजिक सद्भाव, नारी जागरण तथा जनकल्याण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की।
यह आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि जीवन में आध्यात्मिक मूल्यों को अपनाने, परिवारों में संस्कारों को सुदृढ़ करने और समाज के प्रति अपने दायित्वों का बोध जागृत करने का प्रेरक अवसर भी बना। दीपयज्ञ के माध्यम से यह संदेश मुखर हुआ कि सच्ची उपासना का व्यापक स्वरूप मन की पवित्रता, विचारों की श्रेष्ठता, आचरण की मर्यादा और पीड़ित मानवता के प्रति संवेदनशीलता में प्रकट होता है। जब व्यक्तिगत साधना लोकमंगल की भावना से जुड़ती है, तब धार्मिक आस्था सामाजिक उत्तरदायित्व का आधार बन सकती है।
दीपों की लौ में लोकमंगल की भावना, मंत्रों में सद्भाव का संदेश
भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में दीप प्रकाश, विवेक, आशा और अज्ञान से ज्ञान की ओर बढ़ने का प्रतीक माना जाता है। महा दीपयज्ञ के दौरान प्रज्वलित दीपों ने इसी भाव को साकार किया। प्रत्येक दीप के साथ मानो यह संकल्प अभिव्यक्त हुआ कि जीवन से निराशा, कटुता, भेदभाव और नकारात्मकता को दूर कर सद्भाव, करुणा, सहयोग तथा नैतिकता के प्रकाश को व्यापक बनाया जाए।
ब्रह्मवादिनी बहनों ने वैदिक विधि-विधान के अनुसार संगीतमय एवं भक्तिपूर्ण वातावरण में दीपयज्ञ संपन्न कराया। वैदिक मंत्रोच्चार, अनुशासित अनुष्ठान और सामूहिक प्रार्थना ने कार्यक्रम को आध्यात्मिक गरिमा प्रदान की। उपस्थित श्रद्धालुओं ने विश्व शांति, परिवारों की सुख-समृद्धि, समाज में पारस्परिक विश्वास और जनकल्याण की मंगलकामना की।
आयोजन का मूल भाव इस विचार में निहित रहा कि शांति केवल युद्ध और संघर्ष के अभाव का नाम नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर संयम, सहिष्णुता, न्यायबोध और दूसरे के दुःख को समझने की संवेदना विकसित करने की प्रक्रिया भी है। इसी प्रकार जनकल्याण केवल किसी एक आयोजन या सेवा गतिविधि से पूरा होने वाला लक्ष्य नहीं, बल्कि निरंतर सद्कर्म, सामाजिक सहभागिता और जिम्मेदार नागरिकता से आगे बढ़ने वाला सामूहिक प्रयास है।
आध्यात्मिक मूल्यों से सामाजिक परिवर्तन तक का आह्वान
कार्यक्रम में शांतिकुंज, हरिद्वार के प्रतिनिधि तथा प्रज्ञा पुराण के प्रख्यात मर्मज्ञ आदरणीय श्री श्याम बिहारी दुबे जी की विशेष उपस्थिति रही। उनके साथ शांतिकुंज जीवनदानी एवं दिल्ली-एनसीआर गायत्री चेतना केंद्र के व्यवस्थापक श्री योगेश शर्मा जी तथा शांतिकुंज जीवनदानी एवं नौएडा चेतना केंद्र में भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा के समन्वयक श्री उमाशंकर गुप्ता जी भी उपस्थित रहे।
अपने विचारों के माध्यम से श्री श्याम बिहारी दुबे जी ने आध्यात्मिक मूल्यों, सद्भावना और समाज कल्याण के महत्व पर प्रकाश डालते हुए जीवन में सद्विचार, श्रेष्ठ संस्कार और सेवा की भावना को स्थान देने का आह्वान किया। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि समाज में सकारात्मक परिवर्तन की शुरुआत व्यक्ति के अपने विचारों और आचरण से होती है। परिवार में संस्कार, व्यवहार में शालीनता, संबंधों में संवेदनशीलता और सार्वजनिक जीवन में नैतिकता ऐसे आधार हैं, जिनसे सामाजिक वातावरण अधिक सौहार्दपूर्ण बन सकता है।
आध्यात्मिक चेतना का वास्तविक उद्देश्य केवल धार्मिक गतिविधियों में सहभागिता करना नहीं, बल्कि दैनिक जीवन में सत्यनिष्ठा, आत्मसंयम, कर्तव्यपरायणता और परोपकार जैसे मूल्यों को व्यवहार में उतारना भी है। जब व्यक्ति अपने अधिकारों के साथ कर्तव्यों को समझता है और निजी हितों के साथ व्यापक सामाजिक हित का भी ध्यान रखता है, तभी समाज में स्थायी सकारात्मक परिवर्तन की संभावनाएं मजबूत होती हैं।
नारी जागरण: शक्ति की उपासना से सम्मान और समान अवसरों तक
शारदीय नवरात्रि मां दुर्गा के विविध स्वरूपों की आराधना का पर्व है। भारतीय सांस्कृतिक चेतना में नारी शक्ति, सृजन, करुणा, साहस और संरक्षण की प्रेरणा का महत्वपूर्ण प्रतीक रही है। इसी पृष्ठभूमि में कार्यक्रम के दौरान नारी जागरण और महिला सशक्तीकरण की आवश्यकता पर विशेष बल दिया गया।
श्री दुबे ने समाज में सकारात्मक बदलाव के लिए महिलाओं की जागरूकता, गरिमा और सशक्त सहभागिता को आवश्यक बताया। इस संदर्भ में नवरात्रि की आराधना का संदेश जीवन के व्यवहार में भी प्रतिबिंबित होना चाहिए। नारी शक्ति के प्रति श्रद्धा तभी सार्थक रूप ग्रहण करती है, जब महिलाओं को परिवार, शिक्षा, सामाजिक जीवन और निर्णय-प्रक्रिया में सम्मानजनक स्थान मिले तथा उनकी प्रतिभा, स्वावलंबन और नेतृत्व क्षमता को प्रोत्साहन दिया जाए।
नारी जागरण का आशय केवल किसी एक वर्ग या समूह को जागरूक करना नहीं, बल्कि पूरे समाज की सोच को अधिक संवेदनशील और न्यायपूर्ण बनाना है। बेटियों की शिक्षा, महिलाओं की सुरक्षा, समान अवसर, आत्मनिर्भरता और गरिमापूर्ण व्यवहार ऐसे विषय हैं, जिन पर परिवारों और समाज को निरंतर सजग रहने की आवश्यकता है। इस दृष्टि से धार्मिक आयोजनों में नारी सम्मान का संदेश सामाजिक चेतना को सकारात्मक दिशा देने का माध्यम बन सकता है।
माताजी के जन्म शताब्दी वर्ष में जनसहभागिता का निमंत्रण
कार्यक्रम के दौरान शांतिकुंज प्रतिनिधि ने परम वंदनीया माताजी के जन्म शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में 31 अक्टूबर, 1 एवं 2 नवंबर 2026 को दिल्ली के इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम में आयोजित होने वाले जनशताब्दी समारोह में सहभागिता के लिए नौएडा वासियों को आमंत्रित किया।
इस आमंत्रण के माध्यम से श्रद्धालुओं और गायत्री परिवार के परिजनों को आध्यात्मिक विचारों, सांस्कृतिक मूल्यों और लोकमंगल की भावना से जुड़े इस आयोजन में सहभागी बनने का संदेश दिया गया। जन्म शताब्दी जैसे अवसर किसी महान व्यक्तित्व के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के साथ-साथ उनके प्रेरक विचारों को जीवन में आत्मसात करने और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का पुनः स्मरण करने का अवसर भी प्रदान करते हैं।
जनसहभागिता की भावना तभी व्यापक अर्थ ग्रहण करती है, जब आयोजन से प्राप्त प्रेरणा व्यक्ति के व्यवहार, परिवार के वातावरण और सामाजिक सहभागिता में दिखाई दे। इस दृष्टि से ऐसे समारोह आध्यात्मिक संवाद, सांस्कृतिक जागरूकता और रचनात्मक सामाजिक प्रयासों को प्रोत्साहित करने का माध्यम बन सकते हैं।
व्यक्ति निर्माण, परिवार निर्माण और समाज निर्माण की दिशा में प्रयास
गायत्री परिवार की विचारधारा में व्यक्ति निर्माण, परिवार निर्माण और समाज निर्माण को परस्पर जुड़े हुए आयामों के रूप में देखा जाता है। महा दीपयज्ञ के माध्यम से भी इसी व्यापक दृष्टिकोण को रेखांकित किया गया। सद्विचारों से व्यक्तित्व का परिष्कार, श्रेष्ठ संस्कारों से परिवार का सुदृढ़ीकरण और सेवा-सहयोग से समाज का संवर्धन—ये ऐसे सूत्र हैं, जो धार्मिक चेतना को दैनिक जीवन की जिम्मेदारियों से जोड़ते हैं।
कार्यक्रम के समन्वयक श्री सुमित गुप्ता ने बताया कि गायत्री परिवार, नौएडा/एनसीआर, शांतिकुंज, हरिद्वार के मार्गदर्शन में आध्यात्मिक जागरण, सामाजिक समरसता, नारी जागरण और विश्व शांति के संदेश को जन-जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से दीपयज्ञों एवं विचार गोष्ठियों की श्रृंखला आयोजित कर रहा है।
उन्होंने बताया कि इन आयोजनों का उद्देश्य व्यक्ति, परिवार और समाज के स्तर पर सकारात्मक मूल्यों को प्रोत्साहित करना तथा लोगों को रचनात्मक सामाजिक सहभागिता के लिए प्रेरित करना है। इस प्रयास में धार्मिक आस्था के साथ नैतिक जिम्मेदारी, परस्पर सहयोग और मानवीय संवेदना को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता है।
सामूहिक सहयोग से सफल हुआ आयोजन
आयोजन को सफल बनाने में गायत्री परिवार के स्वयंसेवकों और स्थानीय सहयोगियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा। इस अवसर पर आम्रपाली जोडिएक के अध्यक्ष श्री के.के. मिश्रा सहित श्री पी.एम. तिवारी, श्री आनंद रौतेला, श्री जोगिंदर सिंह, श्री राजेश सिंह, श्री दीपक त्यागी, श्री उमेश चौहान, श्री रोहित गुप्ता, श्री एस.डी. शर्मा, श्रीमती मालती, श्रीमती टीना, श्रीमती गुंजन, श्रीमती रत्ना गुप्ता, श्रीमती रूपम वर्मा, श्री राम बाबू, श्री हरवीर सिंह, श्री अंकुर ऐरन एवं श्रीमती गरिमा त्रिपाठी सहित अनेक गायत्री परिजन, श्रद्धालु और सहयोगी उपस्थित रहे।
सभी की सहभागिता ने यह रेखांकित किया कि किसी भी सामुदायिक आयोजन की सफलता केवल उसकी धार्मिक भव्यता से नहीं, बल्कि उसमें निहित सहभागिता, अनुशासन, सहयोग और सकारात्मक उद्देश्य से भी आंकी जाती है। सामूहिक प्रयासों के माध्यम से ही ऐसे अवसर सामाजिक जुड़ाव और पारस्परिक सद्भाव को प्रोत्साहित कर सकते हैं।
दीपयज्ञ का संदेश: अंतर्मन में प्रकाश, आचरण में करुणा
शारदीय नवरात्रि के पावन वातावरण में संपन्न महा दीपयज्ञ ने श्रद्धालुओं को आत्मचिंतन और लोकमंगल की भावना से जुड़ने की प्रेरणा दी। दीप की छोटी-सी लौ यह स्मरण कराती है कि अंधकार कितना भी गहरा क्यों न हो, प्रकाश की संभावना बनी रहती है। इसी प्रकार जीवन की चुनौतियों के बीच सद्विचार, धैर्य, करुणा और सेवा के छोटे-छोटे प्रयास भी सकारात्मक परिवर्तन की राह प्रशस्त कर सकते हैं।
विश्व शांति का संकल्प तभी सार्थक दिशा में आगे बढ़ सकता है, जब उसका आरंभ व्यक्ति के अपने व्यवहार से हो; नारी सम्मान का आदर्श तभी मजबूत होगा, जब वह सामाजिक आचरण में दिखाई दे; और जनकल्याण की भावना तभी व्यापक होगी, जब वह सेवा, सहयोग तथा संवेदनशीलता के रूप में जीवन का हिस्सा बने।
आम्रपाली जोडिएक में आयोजित यह महा दीपयज्ञ इसी व्यापक संदेश के साथ संपन्न हुआ कि दीप केवल वेदी पर ही नहीं, अंतर्मन में भी प्रज्वलित होना चाहिए। श्रद्धा जब सदाचार से जुड़ती है, साधना जब सेवा का रूप लेती है और आध्यात्मिक चेतना जब मानवता के कल्याण के लिए प्रेरित करती है, तभी किसी धार्मिक आयोजन का संदेश जीवन और समाज में सार्थक अभिव्यक्ति पाता है।















