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नशे का कारोबार, कंपनियों का मायाजाल और परिवार के नाम पर करोड़ों की संपत्ति! NCB ने खोली काली कमाई की पूरी कुंडली

“5000 ट्रामाडोल टैबलेट से शुरू हुई जांच 20.10 करोड़ की 25 संपत्तियों तक पहुंची, सात राज्यों में फैले नेटवर्क का खुलासा; कंपनियों के बैंक खातों से घूमता रहा नशे का पैसा, अब बेनामी ठिकानों पर भी शिकंजा”

नशे का कारोबार केवल सड़कों पर पुड़िया बेचने वालों, संदिग्ध गाड़ियों में घूमने वाले तस्करों या अंधेरी गलियों में होने वाले सौदों तक सीमित नहीं है। इसका असली खेल अक्सर उन चमचमाती इमारतों, औद्योगिक प्लॉटों, आलीशान फ्लैटों और कंपनियों के दफ्तरों के पीछे छिपा होता है, जहां कागजों पर सब कुछ सामान्य दिखाई देता है। कारोबार दवा का होता है, बिल कंपनियों के नाम पर कटते हैं, बैंक खातों में करोड़ों का लेनदेन होता है और आखिर में उसी पैसे से परिवार के नाम पर संपत्तियों का साम्राज्य खड़ा कर दिया जाता है।

नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) की ताजा कार्रवाई ने नशे के इसी कथित आर्थिक साम्राज्य की परतें खोल दी हैं। एजेंसी ने नशीली दवाओं की अवैध बिक्री से अर्जित रकम से खरीदी गई 20 करोड़ 10 लाख रुपये से अधिक कीमत की 25 संपत्तियों को फ्रीज कर दिया है। यानी जिस काली कमाई को सफेद संपत्ति का रूप देने की कोशिश की गई, उस पर अब सरकारी शिकंजा कस चुका है।

यह कार्रवाई केवल कुछ मकानों, दुकानों या औद्योगिक प्लॉटों को रोकने तक सीमित नहीं है। इसके पीछे एक ऐसा कथित नेटवर्क सामने आया है, जिसमें दवाओं की सप्लाई, फर्जी कंपनियों का इस्तेमाल, बैंक खातों के जरिए पैसों का लेनदेन और परिवार के सदस्यों के नाम पर संपत्तियां खरीदने का पूरा तंत्र काम कर रहा था।

सवाल सिर्फ यह नहीं है कि नशीली दवाएं किसने बेचीं। बड़ा सवाल यह है कि इस कारोबार से निकला पैसा किन-किन रास्तों से गुजरा, किन कंपनियों के खातों में पहुंचा और आखिरकार किन लोगों के नाम पर करोड़ों की संपत्ति बनकर खड़ा हो गया?

20 करोड़ की संपत्ति पर चोट, काली कमाई का सुरक्षित ठिकाना अब मुश्किल

NCB की ओर से जारी संपत्ति फ्रीज करने के आदेश को सक्षम प्राधिकरण ने 30 अक्टूबर 2026 को NDPS एक्ट के तहत पुष्टि कर दी। इससे पहले NCB ने 2 अक्टूबर को इन संपत्तियों को फ्रीज करने का आदेश जारी किया था।

फ्रीज की गई 25 संपत्तियों का कुल मूल्य 20 करोड़ 10 लाख 51 हजार 211 रुपये बताया गया है। इनमें औद्योगिक प्लॉट, दुकानें, कमर्शियल यूनिट और रिहायशी फ्लैट शामिल हैं।

इन संपत्तियों का फैलाव मोहाली के कई प्रमुख व्यावसायिक और रिहायशी इलाकों में है। इनमें गिल्को इंडस्ट्रियल पार्क, मोहाली सिटी सेंटर-3, मोहाली सिटी सेंटर वॉक, जनता इंडस्ट्रियल एस्टेट, गैलेक्सी हाइट्स-2 और क्वीनस्टाउन जैसे स्थान शामिल हैं।

यहां गौर करने वाली बात यह है कि कथित अवैध कारोबार से कमाई गई रकम किसी एक जगह नकदी के रूप में जमा नहीं रखी गई थी। जांच के मुताबिक, इस पैसे को कंपनियों के बैंक खातों के माध्यम से इधर-उधर किया गया और फिर संपत्तियों में निवेश किया गया। कुछ संपत्तियां आरोपियों के नाम पर थीं तो कुछ परिवार के सदस्यों के नाम पर खरीदी गई थीं।

यानी कारोबार का एक हिस्सा दवाओं के बाजार में चल रहा था और दूसरा हिस्सा संपत्ति बनाने में लगा था। अब इन संपत्तियों को संबंधित अनुमति के बिना बेचना या किसी दूसरे के नाम पर हस्तांतरित करना संभव नहीं होगा।

कागजों पर मालिकाना हक भले ही अलग-अलग नामों पर रहा हो, लेकिन जांच का केंद्र यह पता लगाना है कि इन संपत्तियों के पीछे इस्तेमाल हुआ पैसा आखिर आया कहां से।

कहानी की शुरुआत हुई थी सिर्फ 5,000 ट्रामाडोल टैबलेट से

इस पूरे नेटवर्क की कहानी 7 फरवरी 2025 को अमृतसर में पकड़ी गई 5,000 ट्रामाडोल टैबलेट से शुरू हुई थी।

पहली नजर में यह नशीली दवाओं की एक सामान्य बरामदगी लग सकती थी, लेकिन दवाओं की पैकेजिंग पर दर्ज कंपनियों के नाम ने जांच एजेंसियों के सामने कई सवाल खड़े कर दिए।

पैकेजिंग पर हरिद्वार की जेआर फार्मास्यूटिकल्स का नाम निर्माता के तौर पर दर्ज था, जबकि देहरादून की तिवारी मेडिकल एजेंसी को मार्केटर बताया गया था। जांच आगे बढ़ी तो पता चला कि दवाओं की मार्केटिंग करने वाली कंपनी का वास्तविक अस्तित्व ही नहीं था।

यहीं से मामले ने नया मोड़ लिया।

जब दवाओं के पीछे दर्ज कंपनियों की वास्तविकता संदिग्ध मिली तो NCB ने विशेष जांच टीम गठित की। इसके बाद केवल बरामद टैबलेट की पड़ताल नहीं हुई, बल्कि दवाओं की सप्लाई से जुड़े लोगों, कंपनियों, उत्पादन इकाइयों और आर्थिक लेनदेन की कड़ियां भी खंगाली जाने लगीं।

जांच में उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की कई फार्मा कंपनियों के जरिए कथित तौर पर फर्जी कंपनियों के नाम पर दवाएं भेजने और फिर उन्हें अवैध बाजार में खपाने का खुलासा हुआ।

यहां इस पूरे मामले का सबसे गंभीर पहलू सामने आता है। दवा बनाने और बेचने के लिए मौजूद वैध कारोबारी ढांचे का इस्तेमाल कथित तौर पर अवैध सप्लाई के लिए किया जा रहा था। यानी नशे का कारोबार केवल तस्करी के पारंपरिक रास्तों से नहीं, बल्कि कारोबारी कागजात और कंपनियों की आड़ में भी आगे बढ़ रहा था।

34 लाख टैबलेट, 10.57 लाख सिरप की बोतलें… बरामदगी के आंकड़े चौंकाने वाले

NCB की जांच में अब तक जो बरामदगी हुई है, वह इस नेटवर्क के कथित पैमाने को समझने के लिए काफी है।

एजेंसी के मुताबिक, अब तक करीब 34 लाख साइकोट्रोपिक टैबलेट बरामद की जा चुकी हैं। इसके अलावा कोडीन वाली कफ सिरप की 10.57 लाख बोतलें, 50 हजार ट्रामाडोल इंजेक्शन, मिडाजोलम की 5 हजार शीशियां और लगभग 2,200 किलोग्राम साइकोट्रोपिक पाउडर भी जब्त किया गया है।

इन आंकड़ों को केवल जब्ती का सरकारी रिकॉर्ड समझकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इनके पीछे सप्लाई चेन, उत्पादन, परिवहन, वितरण और पैसों के लेनदेन का एक बड़ा तंत्र होने की आशंका है, जिसकी जांच की जा रही है।

अब तक इस मामले में 17 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। जांच के तार पंजाब, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड, हरियाणा, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश तक जुड़े मिले हैं।

सात राज्यों तक फैले इस नेटवर्क की पड़ताल बताती है कि नशीली दवाओं का कारोबार किसी एक शहर या जिले की समस्या बनकर नहीं रह गया है। इसके तार अलग-अलग राज्यों में मौजूद कंपनियों, सप्लाई के ठिकानों और कारोबारी गतिविधियों तक पहुंच सकते हैं।

परिवार के नाम पर संपत्ति, लेकिन पैसा किसका था?

इस मामले का सबसे दिलचस्प और जांच के लिहाज से महत्वपूर्ण पहलू संपत्तियों का मालिकाना हक है।

NCB की जांच के अनुसार, नशीली दवाओं की बिक्री से प्राप्त रकम को कई कंपनियों के बैंक खातों के माध्यम से स्थानांतरित किया गया। इसके बाद उसी पैसे से आरोपियों ने अपने और परिवार के सदस्यों के नाम पर संपत्तियां खरीदीं।

यही वह तरीका है, जिसमें अवैध कारोबार से कमाई गई रकम को सामान्य निवेश और संपत्ति खरीदने की गतिविधि के भीतर छिपाने की कोशिश की जाती है।

कागजों में संपत्ति किसी रिश्तेदार के नाम पर हो सकती है, भुगतान किसी कंपनी के खाते से हुआ हो सकता है और वास्तविक कारोबारी लाभ किसी दूसरे व्यक्ति को मिला हो सकता है। ऐसे मामलों में जांच एजेंसियों के लिए केवल रजिस्ट्री देखना पर्याप्त नहीं होता। उन्हें यह भी पता लगाना पड़ता है कि खरीद के लिए पैसा किसने दिया, उसका स्रोत क्या था और संबंधित लोगों के बीच आर्थिक संबंध कैसे जुड़े हुए थे।

NCB की कार्रवाई इसी आर्थिक कड़ी पर चोट करने की कोशिश है।

हालांकि, संपत्ति फ्रीज होने का अर्थ यह नहीं है कि संपत्ति का अंतिम मालिकाना हक न्यायिक रूप से तय हो चुका है। यह कानूनी प्रक्रिया के तहत की गई कार्रवाई है और संबंधित पक्षों के अधिकार तथा आगे की कानूनी कार्यवाही अपनी जगह मौजूद हैं।

डिजिटल विजन और वेलिंटन हेल्थकेयर भी जांच के घेरे में

जांच की एक महत्वपूर्ण कड़ी हिमाचल प्रदेश के काला अंब स्थित डिजिटल विजन और वेलिंटन हेल्थकेयर से भी जुड़ी है।

इन इकाइयों से बड़ी मात्रा में नशीली दवाएं और उन्हें तैयार करने में इस्तेमाल होने वाला कच्चा माल बरामद किया गया था। इससे जांच का दायरा और व्यापक हुआ।

इस मामले में अंबाला कैंट के रहने वाले कोनिक गोयल, मैनिक गोयल और उनके पिता परशोत्तम लाल गोयल अभी फरार बताए गए हैं।

NCB के मुताबिक, बार-बार समन जारी किए जाने और गैर-जमानती वारंट की कार्रवाई के बावजूद वे जांच में शामिल नहीं हुए। उनकी अग्रिम जमानत याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट से भी खारिज हो चुकी हैं।

फ्रीज की गई संपत्तियों में इनके और इनके परिवार के सदस्यों के नाम पर मौजूद संपत्तियां भी शामिल बताई गई हैं।

यहां जांच का एक अहम सवाल फिर सामने आता है कि यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ नशीली दवाओं के अवैध कारोबार से जुड़े गंभीर आरोप हैं, तो उसके और उसके परिवार के नाम पर मौजूद संपत्तियों में निवेश किए गए धन का वास्तविक स्रोत क्या था?

इसका जवाब जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया से ही सामने आएगा।

असली लड़ाई तस्करों से ज्यादा उनके पैसों के साम्राज्य के खिलाफ

नशे के कारोबार के खिलाफ कार्रवाई में अक्सर गिरफ्तारी और बरामदगी सुर्खियां बनती हैं। कितने आरोपी पकड़े गए, कितनी गोलियां मिलीं, कितनी सिरप की बोतलें जब्त हुईं—इन आंकड़ों पर चर्चा होती है। लेकिन किसी भी बड़े अवैध कारोबार की ताकत केवल उसके लोगों में नहीं, बल्कि उसके पैसों में छिपी होती है।

जब तक अवैध कमाई को सुरक्षित रखने, निवेश करने और दोबारा कारोबार में लगाने के रास्ते खुले रहते हैं, तब तक ऐसे नेटवर्क के दोबारा खड़े होने की आशंका बनी रहती है।

NCB की मौजूदा कार्रवाई इसी आर्थिक ढांचे को निशाना बनाने का प्रयास है। एजेंसी का जोर केवल नशीली दवाओं की सप्लाई करने वालों को पकड़ने पर नहीं, बल्कि उस वित्तीय नेटवर्क को तोड़ने पर भी है जिसके जरिए अवैध कमाई को संपत्तियों में बदला जाता है।

20 करोड़ 10 लाख रुपये से अधिक की 25 संपत्तियों को फ्रीज करना इसी दिशा में बड़ा कदम है।

इस पूरे मामले से एक बात साफ होती है कि नशे का कारोबार केवल नशे की खेप पकड़ लेने से खत्म नहीं होगा। इसके पीछे मौजूद कंपनियों, बैंक खातों, संपत्ति निवेश और आर्थिक लेनदेन की कड़ियों तक पहुंचना भी जरूरी है।

क्योंकि नशे की एक गोली बाजार में पहुंचने से पहले कई हाथों से गुजरती है, लेकिन उससे कमाया गया पैसा जब किसी आलीशान फ्लैट, कमर्शियल यूनिट या औद्योगिक प्लॉट में बदल जाता है, तब उसका असली खेल और भी पेचीदा हो जाता है।

अब सवाल यह है कि 25 संपत्तियों पर कार्रवाई के बाद इस नेटवर्क की आर्थिक जांच कहां तक पहुंचेगी? क्या इन संपत्तियों के पीछे छिपे धन के दूसरे स्रोत भी सामने आएंगे? और क्या सात राज्यों में फैले इस कथित नेटवर्क की बाकी आर्थिक कड़ियों तक भी जांच एजेंसियां पहुंच पाएंगी?

फिलहाल 5,000 ट्रामाडोल टैबलेट से शुरू हुई जांच 20 करोड़ की संपत्तियों तक पहुंच चुकी है। यह कार्रवाई उन लोगों के लिए एक स्पष्ट संदेश है जो नशीली दवाओं से कमाए गए पैसे को कंपनियों, रिश्तेदारों और संपत्तियों के पीछे छिपाकर सुरक्षित समझते हैं।

नशे की कमाई से खड़ी की गई इमारतें बाहर से कितनी भी चमकदार क्यों न दिखें, उनके पीछे छिपे पैसों का हिसाब आखिरकार देना ही पड़ सकता है।

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