“प्रधानमंत्री मोदी और उनकी दिवंगत मां से जुड़े कथित AI वीडियो की जांच ने पकड़ी रफ्तार, बिहार कांग्रेस के पदाधिकारियों को दिल्ली पुलिस का नोटिस। मोबाइल नंबर से लेकर कॉल डिटेल तक का हिसाब मांगा, 5 नवंबर को पूछताछ के लिए बुलाया। सवाल सिर्फ एक पोस्ट का नहीं, बल्कि उस डिजिटल मशीनरी का है जो पर्दे के पीछे से पार्टी की आवाज बुलंद करती है।”
पटना। राजनीति में बयान देना आसान है, लेकिन बयान की डिजिटल उम्र कभी-कभी उसके राजनीतिक असर से कहीं ज्यादा लंबी हो जाती है। सोशल मीडिया पर कुछ सेकंड में पोस्ट होने वाला एक वीडियो महीनों बाद पुलिस की फाइलों में ऐसा सवाल बनकर लौट सकता है, जिसका जवाब देने के लिए पार्टी के पदाधिकारियों को थाने-कचहरी और जांच एजेंसियों के चक्कर लगाने पड़ें। बिहार कांग्रेस के साथ फिलहाल कुछ ऐसा ही होता दिखाई दे रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी दिवंगत मां से जुड़े कथित विवादित AI वीडियो का मामला अब एक बार फिर चर्चा में है। इस बार चर्चा का केंद्र कोई राजनीतिक बयान या प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं, बल्कि पटना के सदाकत आश्रम की दीवार पर चस्पा दिल्ली पुलिस का नोटिस है।
दिल्ली पुलिस के विशेष प्रकोष्ठ ने पिछले साल दर्ज प्राथमिकी की जांच को आगे बढ़ाते हुए बिहार कांग्रेस के पदाधिकारियों को पूछताछ के लिए तलब किया है। नोटिस रविवार को पटना स्थित बिहार प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय सदाकत आश्रम में चस्पा किया गया। यानी जिस मुख्यालय से कभी राजनीतिक संदेश, संगठनात्मक रणनीति और चुनावी नारों की गूंज सुनाई देती है, वहां इस बार दिल्ली पुलिस की जांच का संदेश पहुंचा है।
मामले की पुष्टि कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता असित नाथ तिवारी ने की है। उनके मुताबिक, पार्टी के आईटी सेल से जुड़े एक पदाधिकारी को नोटिस जारी किया गया है। उन्हें 5 नवंबर को सुबह 11 बजे दिल्ली पुलिस के विशेष प्रकोष्ठ की काउंटर इंटेलिजेंस यूनिट के सामने पेश होने का निर्देश दिया गया है। कांग्रेस का कहना है कि पार्टी इस मामले पर विचार-विमर्श कर रही है।
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में दिलचस्प बात यह है कि पुलिस की दिलचस्पी केवल उस वीडियो तक सीमित नहीं दिख रही, जिसे लेकर विवाद खड़ा हुआ था। जांच की दिशा अब उस डिजिटल व्यवस्था तक पहुंचती नजर आ रही है, जिसके जरिए पार्टी का आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट संचालित होता है। सवाल यह है कि पोस्ट किसने किया, अकाउंट किसके नियंत्रण में था, संबंधित मोबाइल नंबर किसके पास था और उस दौरान डिजिटल गतिविधियों की जिम्मेदारी किन लोगों के हाथ में थी?
सदाकत आश्रम में नोटिस, दिल्ली से आया डिजिटल हिसाब मांगने का फरमान
बिहार कांग्रेस मुख्यालय सदाकत आश्रम में नोटिस चस्पा होने के बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर शुरू होना स्वाभाविक है। कांग्रेस के लिए यह केवल एक कानूनी नोटिस का मामला नहीं है। पार्टी के डिजिटल प्रचार तंत्र से जुड़े एक विवाद ने अब संगठनात्मक जवाबदेही का सवाल भी खड़ा कर दिया है।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 94 के तहत जारी नोटिस में पुलिस ने संबंधित सिम कार्ड और X हैंडल के संचालन से जुड़ी जानकारियां मांगी हैं। इसके अलावा उन मोबाइल फोन का विवरण भी मांगा गया है, जिनमें संबंधित सिम कार्ड का इस्तेमाल हुआ था।
जांच एजेंसी की नजर इस बात पर है कि पार्टी के आधिकारिक X हैंडल को कौन-कौन लोग संचालित कर रहे थे। पुलिस ने बिहार कांग्रेस से 1 जुलाई से 31 दिसंबर 2025 के बीच इस हैंडल को ऑपरेट करने वाले अधिकृत व्यक्तियों की सूची और कॉल डिटेल रिकॉर्ड यानी CDR उपलब्ध कराने को कहा है।
सीधे शब्दों में कहें तो अब मामला केवल यह जानने का नहीं है कि विवादित वीडियो किस अकाउंट से पोस्ट हुआ था। जांच यह भी समझना चाहती है कि उस अकाउंट तक पहुंच किसकी थी, संचालन की जिम्मेदारी किसके पास थी और उससे जुड़े मोबाइल नंबरों का इस्तेमाल किन लोगों ने किया।
सोशल मीडिया की दुनिया में किसी राजनीतिक पार्टी का आधिकारिक हैंडल सिर्फ एक अकाउंट नहीं होता। वह पार्टी का डिजिटल चेहरा होता है। वहां से जारी हर पोस्ट पार्टी की सार्वजनिक छवि, राजनीतिक संदेश और रणनीति का हिस्सा माना जाता है। ऐसे में जब उसी हैंडल से जुड़ा कोई विवाद पुलिस जांच तक पहुंच जाए तो सवाल पोस्ट करने वाले व्यक्ति से आगे बढ़कर पूरे डिजिटल प्रबंधन पर उठने लगते हैं।
प्रधानमंत्री और उनकी दिवंगत मां से जुड़ा AI वीडियो बना विवाद की जड़
इस पूरे मामले की शुरुआत पिछले साल 13 सितंबर को दर्ज एक FIR से जुड़ी है। दिल्ली के नॉर्थ एवेन्यू पुलिस थाने में भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी। आरोप है कि बिहार कांग्रेस के आधिकारिक X हैंडल @INCBihar से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी दिवंगत मां से संबंधित एक विवादित AI वीडियो पोस्ट या साझा किया गया था।
AI तकनीक ने राजनीति के प्रचार-प्रसार का तरीका बदल दिया है। अब तस्वीरों और वीडियो के जरिए ऐसे दृश्य तैयार किए जा सकते हैं, जिन्हें देखकर वास्तविकता और कृत्रिम प्रस्तुति के बीच अंतर करना आम दर्शक के लिए आसान नहीं होता। यही वजह है कि AI से तैयार सामग्री का राजनीतिक इस्तेमाल कई बार गंभीर विवाद का कारण बन जाता है।
राजनीति में विरोध करना लोकतांत्रिक अधिकार है। सरकार की नीतियों पर सवाल उठाना, प्रधानमंत्री की आलोचना करना और राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को कठघरे में खड़ा करना विपक्ष की भूमिका का हिस्सा है। लेकिन जब किसी व्यक्ति के परिवार, निजी जीवन या संवेदनशील पारिवारिक संदर्भों को लेकर डिजिटल सामग्री सामने आती है, तो विवाद का दायरा राजनीतिक आलोचना से आगे निकल सकता है।
बिहार कांग्रेस से जुड़े इस मामले में भी विवादित वीडियो की प्रकृति और उसके प्रकाशन को लेकर सवाल उठे थे। हालांकि, आरोपों की अंतिम सच्चाई जांच और कानूनी प्रक्रिया के बाद ही सामने आएगी। फिलहाल दिल्ली पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि संबंधित सोशल मीडिया अकाउंट का संचालन किसके जिम्मे था और पोस्ट से जुड़े डिजिटल साक्ष्य किस ओर इशारा करते हैं।
कांग्रेस की डिजिटल टीम पर उठे सवाल, अब किसकी होगी जवाबदेही?
किसी भी राजनीतिक दल की आईटी सेल आज चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा बन चुकी है। पहले राजनीतिक संदेश पोस्टर, पर्चे, सभाओं और प्रेस विज्ञप्तियों के जरिए जनता तक पहुंचते थे। अब एक ट्वीट, एक रील और कुछ सेकंड का वीडियो भी राजनीतिक विमर्श की दिशा बदलने की ताकत रखता है।
इसी डिजिटल ताकत के कारण राजनीतिक दलों ने सोशल मीडिया प्रबंधन के लिए अलग-अलग टीमें बना रखी हैं। इन टीमों में कंटेंट तैयार करने वाले, ग्राफिक्स बनाने वाले, वीडियो एडिट करने वाले और आधिकारिक अकाउंट संचालित करने वाले लोग शामिल होते हैं। कई बार किसी एक पोस्ट के पीछे पूरी टीम काम करती है, लेकिन सार्वजनिक रूप से उसकी जिम्मेदारी पार्टी के आधिकारिक हैंडल पर ही दिखाई देती है।
अब दिल्ली पुलिस ने जिस तरह सिम कार्ड, मोबाइल फोन, अधिकृत संचालकों की सूची और CDR का ब्योरा मांगा है, उससे साफ है कि जांच केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं है। डिजिटल संचालन की कड़ियों को जोड़ने की कोशिश की जा रही है।
यहां कांग्रेस के सामने भी संगठनात्मक सवाल है। पार्टी को यह स्पष्ट करना पड़ सकता है कि उसके आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट का संचालन किस व्यवस्था के तहत होता है। क्या एक ही व्यक्ति को इसकी जिम्मेदारी दी गई थी या कई पदाधिकारी अलग-अलग समय पर इसे संचालित करते थे? क्या पोस्ट प्रकाशित करने से पहले कोई स्वीकृति प्रक्रिया होती है? और क्या पार्टी के पास डिजिटल गतिविधियों का ऐसा रिकॉर्ड मौजूद है, जिससे जांच एजेंसी को मांगी गई जानकारी उपलब्ध कराई जा सके?
इन सवालों के जवाब जांच के दौरान ही स्पष्ट होंगे। लेकिन इतना तय है कि सोशल मीडिया पर राजनीतिक सक्रियता दिखाने वाली टीमों के लिए अब केवल पोस्ट की पहुंच और लाइक-शेयर का हिसाब रखना पर्याप्त नहीं रह गया है। डिजिटल जवाबदेही भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो गई है।
राजनीतिक विरोध की सीमा और AI की जिम्मेदारी
इस घटनाक्रम ने एक बड़ा सवाल भी खड़ा किया है कि क्या राजनीतिक दल AI तकनीक के इस्तेमाल को लेकर पर्याप्त सतर्क हैं? डिजिटल प्रचार की होड़ में राजनीतिक दल अक्सर एक-दूसरे से आगे निकलने की कोशिश करते हैं। कभी तीखे कार्टून, कभी व्यंग्यात्मक वीडियो और कभी वायरल मीम के जरिए विरोधियों पर निशाना साधा जाता है।
लेकिन AI से तैयार वीडियो की दुनिया में एक नई चुनौती सामने आई है। किसी व्यक्ति की छवि, आवाज और हावभाव का इस्तेमाल करके ऐसी सामग्री बनाई जा सकती है, जो देखने में वास्तविक लगे। यदि इस तकनीक का इस्तेमाल बिना पर्याप्त सावधानी के किया जाए तो राजनीतिक संदेश विवाद, कानूनी कार्रवाई और सार्वजनिक अविश्वास का कारण बन सकता है।
राजनीतिक दलों के लिए यह समझना जरूरी है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर प्रकाशित सामग्री की जिम्मेदारी केवल उस व्यक्ति की नहीं हो सकती, जिसने अंतिम बटन दबाकर पोस्ट किया। अकाउंट का नियंत्रण, कंटेंट की स्वीकृति, तकनीकी व्यवस्था और संगठनात्मक निगरानी भी जवाबदेही के दायरे में आ सकते हैं। हालांकि, किसी व्यक्ति की वास्तविक कानूनी जिम्मेदारी का निर्धारण उपलब्ध साक्ष्यों और कानून के आधार पर ही होगा।
5 नवंबर पर टिकी नजरें, कांग्रेस क्या रखेगी अपना पक्ष?
अब सबकी निगाहें 5 नवंबर पर टिकी हैं। नोटिस के मुताबिक, संबंधित पदाधिकारी को सुबह 11 बजे दिल्ली पुलिस के विशेष प्रकोष्ठ की काउंटर इंटेलिजेंस यूनिट के सामने पेश होना है। कांग्रेस प्रवक्ता असित नाथ तिवारी ने कहा है कि पार्टी इस मामले पर विचार-विमर्श कर रही है।
आगे पार्टी क्या रुख अपनाती है, यह देखना महत्वपूर्ण होगा। क्या संबंधित पदाधिकारी खुद पेश होकर पुलिस के सवालों का जवाब देंगे? क्या पार्टी की ओर से मांगे गए दस्तावेज और डिजिटल रिकॉर्ड उपलब्ध कराए जाएंगे? क्या कांग्रेस इस कार्रवाई को सामान्य कानूनी प्रक्रिया मानकर सहयोग करेगी या इसे राजनीतिक दबाव के नजरिये से देखेगी? फिलहाल इन सवालों के जवाब सामने नहीं आए हैं।
यह भी ध्यान रखना होगा कि किसी व्यक्ति को पूछताछ के लिए बुलाया जाना अपने आप में उसके दोषी होने का प्रमाण नहीं है। पुलिस जांच का उद्देश्य तथ्यों और साक्ष्यों को जुटाना है। इस मामले में भी अंतिम निष्कर्ष जांच पूरी होने और कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ने के बाद ही निकाला जा सकेगा।
एक पोस्ट, कई सवाल और डिजिटल राजनीति का इम्तिहान
बिहार कांग्रेस के लिए यह मामला ऐसे समय सामने आया है, जब राजनीति में सोशल मीडिया की भूमिका पहले से कहीं ज्यादा बढ़ चुकी है। पार्टी का आधिकारिक हैंडल उसकी राजनीतिक आवाज है, लेकिन उसी आवाज से जुड़ा कोई विवाद जब पुलिस की जांच का हिस्सा बन जाए तो संगठन के लिए असहज स्थिति पैदा होना स्वाभाविक है।
सदाकत आश्रम में चस्पा हुआ नोटिस फिलहाल कागज का एक टुकड़ा भर नहीं है। यह राजनीतिक दलों को डिजिटल अनुशासन और जवाबदेही की याद दिलाने वाला घटनाक्रम भी है। अब जांच यह पता लगाने की कोशिश करेगी कि विवादित AI वीडियो के प्रकाशन के पीछे कौन-सी डिजिटल कड़ियां थीं और संबंधित अकाउंट को किसने संचालित किया था।
राजनीति में विरोध की धार जितनी तेज हो, जिम्मेदारी की समझ भी उतनी ही मजबूत होनी चाहिए। क्योंकि सोशल मीडिया पर पोस्ट करने में कुछ सेकंड लगते हैं, लेकिन उसके बाद उठने वाले सवालों का जवाब देने में महीनों लग सकते हैं।
फिलहाल कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि उसके डिजिटल दरबार में पोस्ट करने का अधिकार किसके पास था और उसकी जवाबदेही किसकी है? दिल्ली पुलिस ने मोबाइल नंबर से लेकर कॉल डिटेल तक का हिसाब मांगा है। अब देखना यह है कि सदाकत आश्रम इस डिजिटल पहेली के कौन-कौन से पन्ने खोलता है।
कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। एक विवादित AI वीडियो से शुरू हुई जांच अब पार्टी के डिजिटल नेटवर्क तक पहुंच चुकी है। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि इस मामले में सिर्फ एक सोशल मीडिया पोस्ट की पड़ताल हो रही है या बिहार कांग्रेस की डिजिटल कार्यप्रणाली के कई अनछुए पहलू भी सामने आने वाले हैं।















