“2022 में शुरू होनी थी परियोजना, जमीन की देरी के बाद निर्माण ने पकड़ी रफ्तार; सेतु निगम का हिस्सा पूरा होने के बावजूद रेलवे लाइन के ऊपर गर्डर और एलिवेटेड सेक्शन का काम बाकी”
पर्दाफाश न्यूज़ | दादरी, ग्रेटर नोएडा
दादरी। विकास की राजनीति में शिलान्यास की तस्वीरें जल्दी खिंच जाती हैं, उद्घाटन के मंच भी सज जाते हैं और उपलब्धियों के दावे करने में देर नहीं लगती। लेकिन जब जनता को किसी पुल से गुजरना हो, तो उसे भाषण नहीं, सड़क चाहिए। बोड़ाकी-चमरावली रेलवे ओवरब्रिज की कहानी भी इसी सवाल के इर्द-गिर्द घूम रही है—परियोजना की घोषणा और निर्माण की प्रक्रिया आगे बढ़ने के बावजूद आखिर आम लोगों को इसका पूरा लाभ कब मिलेगा?
दादरी विधानसभा क्षेत्र में बोड़ाकी-चमरावली रेलवे ओवरब्रिज लंबे समय से चर्चा में है। वर्ष 2022 में जिस परियोजना का काम शुरू होना था, वह जमीन उपलब्ध कराने में देरी के कारण आगे नहीं बढ़ सकी। वर्ष 2023 में जमीन मिलने के बाद निर्माण ने गति पकड़ी और उपलब्ध समाचार रिपोर्ट के मुताबिक, सेतु निगम ने वर्ष 2024 के अंत तक रेलवे लाइन के दोनों ओर एलिवेटेड हिस्से का निर्माण पूरा कर लिया। इसके बावजूद रेलवे लाइन के ऊपर गर्डर रखने और संबंधित शेष निर्माण कार्य का इंतजार बना हुआ है।
यानी कहानी सिर्फ एक अधूरे पुल की नहीं, बल्कि सरकारी एजेंसियों के बीच समन्वय, परियोजना की निगरानी और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही की भी है। सवाल यह नहीं कि किसने कितनी बार विकास की बात कही; सवाल यह है कि जनता को उस विकास का लाभ कब मिलेगा, जिसके लिए वह वर्षों से इंतजार कर रही है।
दस साल का कार्यकाल, लेकिन जनता का सवाल बरकरार
दादरी विधायक तेजपाल नागर के करीब दस वर्षों के राजनीतिक कार्यकाल के संदर्भ में बोड़ाकी रेलवे ओवरब्रिज का अधूरा रहना एक अहम जनहित का मुद्दा बन गया है। लंबे समय तक जनप्रतिनिधित्व का अर्थ केवल क्षेत्र में मौजूद रहना या सरकारी कार्यक्रमों में शामिल होना नहीं होता। उसका एक महत्वपूर्ण पैमाना यह भी है कि स्थानीय समस्याओं के समाधान के लिए कितनी प्रभावी पहल की गई और लंबित परियोजनाओं को पूरा कराने में क्या भूमिका निभाई गई।
विधायक के आलोचकों का आरोप है कि विकास कार्यों के उद्घाटन और उपलब्धियों का श्रेय लेने के मामले में राजनीतिक सक्रियता दिखाई देती है, लेकिन जब अलग-अलग सरकारी संस्थाओं के बीच तालमेल बैठाने और अटकी परियोजनाओं को गति दिलाने की बात आती है, तब जनता को ठोस परिणामों का इंतजार करना पड़ता है।
इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और विधायक का पक्ष सामने आना जरूरी है। लेकिन जनप्रतिनिधि से सवाल पूछना किसी राजनीतिक विरोध का पर्याय नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही का हिस्सा है।
यदि बोड़ाकी रेलवे ओवरब्रिज की जिम्मेदारी कई विभागों में बंटी हुई है, तो क्या विधायक ने सभी संबंधित एजेंसियों के साथ समन्वय बैठकें कीं? क्या उन्होंने रेलवे लाइन के ऊपर लंबित कार्य का मुद्दा उच्च अधिकारियों के सामने उठाया? क्या निर्माण पूरा करने के लिए कोई स्पष्ट समयसीमा तय कराने की पहल की गई? जनता इन सवालों के जवाब जानना चाहती है।
जमीन मिली, निर्माण हुआ; फिर काम किस मोड़ पर अटका?
परियोजना में देरी की कहानी को समझने के लिए उसकी अलग-अलग अवस्थाओं पर नजर डालना जरूरी है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, जमीन की अनुपलब्धता ने शुरुआती काम को प्रभावित किया। वर्ष 2023 में जमीन मिलने के बाद निर्माण आगे बढ़ा और सेतु निगम ने रेलवे लाइन के दोनों ओर अपना एलिवेटेड हिस्सा तैयार किया।
लेकिन रेलवे लाइन के ऊपर गर्डर रखने और संबंधित निर्माण कार्य का चरण अब भी महत्वपूर्ण बना हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस हिस्से का काम डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड यानी डीएफसीसीआईएल से संबंधित है।
यहां सवाल को किसी एक एजेंसी पर आरोप लगाकर खत्म नहीं किया जा सकता। परियोजना का एक हिस्सा पूरा होना और पूरी परियोजना का चालू न हो पाना बताता है कि अलग-अलग निर्माण चरणों के बीच तालमेल कितना महत्वपूर्ण है। यदि एक विभाग अपना काम पूरा कर चुका है और दूसरे हिस्से पर काम बाकी है, तो आम जनता को यह जानने का अधिकार है कि देरी की वास्तविक वजह क्या है।
क्या रेलवे लाइन के ऊपर गर्डर रखने के लिए तकनीकी स्वीकृति या निर्धारित परिचालन व्यवस्था से जुड़ी प्रक्रिया लंबित है? क्या निर्माण कार्यक्रम में बदलाव हुआ है? क्या किसी अन्य प्रशासनिक या तकनीकी अड़चन ने काम रोका है? इन सवालों के जवाब संबंधित एजेंसियों के आधिकारिक बयान और परियोजना की अद्यतन स्थिति से ही स्पष्ट हो सकते हैं।
फिलहाल जनता के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि शेष काम कब शुरू होगा, कब पूरा होगा और पुल को यातायात के लिए खोलने की संभावित तारीख क्या है।
राजनीतिक पर्दे के पीछे का असली सवाल—जिम्मेदारी किसकी?
सरकारी परियोजनाओं में अक्सर जिम्मेदारियों का ऐसा बंटवारा दिखाई देता है कि काम अधूरा रहने पर हर संस्था अपने हिस्से का हिसाब बताने लगती है। कोई जमीन की देरी का हवाला देता है, कोई तकनीकी प्रक्रिया का, तो कोई दूसरे विभाग की जिम्मेदारी की ओर इशारा करता है। लेकिन सड़क पर चलने वाले नागरिक के लिए विभागों की सीमाएं नहीं, सुविधा मायने रखती है।
बोड़ाकी रेलवे ओवरब्रिज के मामले में भी जवाबदेही का यही प्रश्न महत्वपूर्ण है। यदि निर्माण के अलग-अलग हिस्से अलग-अलग एजेंसियों के जिम्मे हैं, तो क्या उनके बीच नियमित समन्वय सुनिश्चित किया गया? क्या देरी की समीक्षा हुई? क्या लंबित कार्यों के लिए जिम्मेदार अधिकारियों और समयसीमा को स्पष्ट किया गया?
और सबसे महत्वपूर्ण सवाल—स्थानीय जनप्रतिनिधि इस पूरी प्रक्रिया में किस भूमिका में रहे?
राजनीतिक पर्दे के पीछे की कहानी का पता नारों या आरोपों से नहीं, बल्कि बैठकों के रिकॉर्ड, विभागीय पत्राचार, स्वीकृत निर्माण कार्यक्रम और अधिकारियों के जवाबों से चलेगा। यदि विधायक ने परियोजना को गति दिलाने के लिए प्रभावी पहल की है, तो उसका विवरण जनता के सामने आना चाहिए। यदि समन्वय में कमी रही है, तो उसकी पहचान कर जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
विकास की राजनीति में श्रेय साझा करने की होड़ से ज्यादा जरूरी है जिम्मेदारी साझा करने की व्यवस्था। जनता को यह नहीं देखना कि किस नेता की तस्वीर किस मंच पर लगी; उसे यह देखना है कि उसका रास्ता कब खुलेगा।
बारह गांवों की उम्मीद, हजारों लोगों की सुविधा का सवाल
बोड़ाकी-चमरावली रेलवे ओवरब्रिज के तैयार होने से आसपास के करीब 12 गांवों के लोगों को आवागमन में राहत मिलने की उम्मीद है। ग्रेटर नोएडा, दादरी, गाजियाबाद और सिकंदराबाद की दिशा में आने-जाने वाले यात्रियों को भी बेहतर कनेक्टिविटी का लाभ मिल सकता है।
किसी पुल का महत्व केवल उसके निर्माण की लागत या उसकी लंबाई से तय नहीं होता। उसका वास्तविक महत्व इस बात में है कि वह लोगों के रोजमर्रा के जीवन को कितना आसान बनाता है। नौकरी पर जाने वाले कर्मचारी, कारोबार के लिए निकलने वाले व्यापारी, विद्यार्थियों और अन्य यात्रियों के लिए बेहतर संपर्क व्यवस्था समय और सुविधा दोनों के लिहाज से महत्वपूर्ण होती है।
जब ऐसी परियोजना अधूरी रहती है, तो उसका असर सिर्फ सरकारी फाइल में दर्ज प्रगति पर नहीं पड़ता। प्रभावित लोगों को अपनी यात्रा की योजना उसी अधूरी व्यवस्था के हिसाब से बनानी पड़ती है। हालांकि, इस परियोजना के कारण लोगों को होने वाली वास्तविक देरी, अतिरिक्त दूरी या आर्थिक नुकसान का आकलन करने के लिए अलग से प्रमाणित आंकड़ों की आवश्यकता होगी।
इसके बावजूद यह स्पष्ट है कि जिस सुविधा का उद्देश्य कनेक्टिविटी बेहतर बनाना है, उसका पूरा लाभ तभी मिलेगा जब सभी जरूरी निर्माण कार्य पूरे हों और पुल को आवश्यक प्रक्रियाओं के बाद यातायात के लिए खोला जाए।
चार साल का इंतजार, अब तारीख बताइए
परियोजना के शुरुआती चरण में जमीन मिलने की देरी एक महत्वपूर्ण कारण रही। लेकिन जमीन उपलब्ध होने के बाद हुए निर्माण और अब तक लंबित हिस्से की स्थिति की अलग-अलग समीक्षा भी जरूरी है। शुरुआती बाधा का उल्लेख कर देने भर से आगे की पूरी देरी का जवाब नहीं मिल जाता।
डीएफसीसीआईएल को रेलवे लाइन के ऊपर गर्डर रखने और अपने जिम्मे के शेष कार्यों की मौजूदा स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। सेतु निगम को अपने हिस्से के निर्माण की स्थिति और पूर्णता से संबंधित विवरण सामने रखना चाहिए। ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण तथा अन्य संबंधित विभागों को भी यह बताना चाहिए कि परियोजना के समन्वय और निगरानी में उनकी क्या भूमिका रही है।
दादरी विधायक तेजपाल नागर से भी अपेक्षा है कि वे जनता को परियोजना की वास्तविक स्थिति से अवगत कराएं। केवल यह कहना पर्याप्त नहीं होगा कि काम संबंधित विभाग के अधिकार क्षेत्र में आता है। जनप्रतिनिधि की भूमिका विभागीय जिम्मेदारियों को बदलना नहीं, बल्कि उनके बीच तालमेल बढ़ाने, बाधाओं को सामने लाने और जनता को जवाब दिलाने में भी होती है।
हालांकि, किसी भी समयसीमा की घोषणा संबंधित एजेंसियों के सत्यापित निर्माण कार्यक्रम के आधार पर ही होनी चाहिए। बिना आधिकारिक पुष्टि के कोई तारीख बताना जनता की अपेक्षाओं को फिर अनिश्चितता में डाल सकता है।
पर्दाफाश न्यूज़ का सवाल: पुल अधूरा तो जवाबदेही पूरी कैसे?
बोड़ाकी-चमरावली रेलवे ओवरब्रिज पर उठते सवालों का समाधान राजनीतिक बयानबाजी से नहीं, स्पष्ट तथ्यों और समयबद्ध कार्रवाई से निकलेगा। परियोजना की शुरुआत में हुई देरी, सेतु निगम के पूरे किए गए हिस्से और रेलवे लाइन के ऊपर लंबित कार्य—इन सभी की स्थिति सार्वजनिक होनी चाहिए।
दादरी की जनता यह जानना चाहती है कि शेष निर्माण कब पूरा होगा, जिम्मेदार एजेंसियों ने अब तक क्या कदम उठाए हैं और जनप्रतिनिधियों ने परियोजना की निगरानी के लिए क्या पहल की है। इन सवालों का जवाब किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष में फैसला सुनाने के लिए नहीं, बल्कि सार्वजनिक धन से बनने वाली सुविधा की जवाबदेही तय करने के लिए जरूरी है।
विकास का असली प्रमाण भाषण नहीं, समय पर पूरा हुआ काम है। शिलान्यास से उम्मीद पैदा होती है, निर्माण से भरोसा बनता है और परियोजना पूरी होने पर ही जनता को उसका वास्तविक लाभ मिलता है।
बोड़ाकी रेलवे ओवरब्रिज के मामले में अब जनता को सामान्य आश्वासनों से आगे बढ़कर स्पष्ट स्थिति, जिम्मेदार एजेंसियों का जवाब और व्यावहारिक समयसीमा चाहिए। दस साल के राजनीतिक कार्यकाल और वर्षों से जारी परियोजना के बीच खड़ा यह सवाल आखिरकार उसी कसौटी पर लौटता है—लोगों को राहत कब मिलेगी?
पर्दाफाश न्यूज़ की पड़ताल का केंद्रीय सवाल यही है: जब परियोजना का एक हिस्सा पूरा हो चुका है, तो बाकी काम को पूरा कराने की समयबद्ध योजना कहां है? संबंधित एजेंसियों और जनप्रतिनिधियों को इस सवाल का जवाब तथ्यों के साथ देना चाहिए, क्योंकि जनता को विकास के दावों की गिनती नहीं, अपने रास्ते पर तैयार पुल चाहिए।















