“जंतर-मंतर पर तीन महिला पत्रकारों के पुलिस अधिकारियों पर यौन उत्पीड़न के आरोपों के बीच बड़ा प्रशासनिक विवाद — क्राइम ब्रांच कर रही शिकायतों की जांच, दिल्ली सरकार ने 12 अधिकारियों से जुड़े आदेश में किया संशोधन”
नई दिल्ली।
राजधानी दिल्ली में लोकतंत्र, पुलिस व्यवस्था और पत्रकारिता की स्वतंत्रता से जुड़े सवालों के बीच एक ऐसा प्रशासनिक घटनाक्रम सामने आया है जिसने कई गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन के दौरान महिला पत्रकारों द्वारा दिल्ली पुलिस के अधिकारियों पर लगाए गए कथित यौन उत्पीड़न के आरोपों की जांच अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि आरोपों में नाम सामने आए सहायक पुलिस आयुक्त (ACP) विवेक भगत को 11 अन्य अधिकारियों के साथ अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त (Additional DCP) का वर्तमान कार्यभार सौंपने का आदेश जारी हो गया।
आदेश सामने आते ही इस पर सवाल उठने लगे। मामला और गंभीर इसलिए हुआ क्योंकि संबंधित शिकायतें पहले ही दिल्ली पुलिस की ओर से निष्पक्ष जांच के लिए क्राइम ब्रांच को भेजी जा चुकी थीं।
हालांकि, घटनाक्रम ने सोमवार देर रात नया मोड़ लिया। दिल्ली सरकार ने स्पष्ट किया कि विवेक भगत ने स्वयं अनुरोध किया है कि महिला पत्रकारों से जुड़े आरोपों की जांच पूरी होने और उसके संतोषजनक निष्कर्ष तक वे एडीसीपी का वर्तमान कार्यभार ग्रहण नहीं करेंगे। इसके बाद 5 अक्टूबर के आदेश में संशोधन करने का फैसला लिया गया और शेष 11 अधिकारियों के लिए आदेश दोबारा जारी किए जाने की बात कही गई।
यानी मामला अब केवल एक अधिकारी को अस्थायी प्रशासनिक जिम्मेदारी देने और फिर रोकने तक सीमित नहीं रह गया है। इसके केंद्र में तीन बड़े सवाल हैं—आरोपों की निष्पक्ष जांच कैसे होगी, जांच के दौरान प्रशासनिक निष्पक्षता का भरोसा कैसे कायम रहेगा और पुलिस-प्रेस संबंधों में पैदा हुए अविश्वास को कैसे दूर किया जाएगा?
जंतर-मंतर से उठे आरोपों ने बढ़ाई हलचल
3 अक्टूबर को जंतर-मंतर और नई दिल्ली इलाके में चुनाव आयोग के खिलाफ प्रदर्शन हुआ। प्रदर्शन के दौरान तीन महिला पत्रकारों ने दिल्ली पुलिस के अधिकारियों पर यौन उत्पीड़न और कथित अनुचित व्यवहार के आरोप लगाए।
दिल्ली पुलिस ने 4 अक्टूबर को कहा कि उसे तीन महिला पत्रकारों की शिकायतें मिली हैं और उन्हें निष्पक्ष जांच के लिए क्राइम ब्रांच को भेज दिया गया है। पुलिस के मुताबिक, मामले की जांच के दौरान संबंधित तथ्यों, बयानों और उपलब्ध साक्ष्यों की जांच की जाएगी।
यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आरोप और दोष सिद्धि दो अलग-अलग चीजें हैं। किसी अधिकारी के खिलाफ शिकायत दर्ज होना अपने आप में अपराध सिद्ध नहीं करता। लेकिन जब शिकायतें यौन उत्पीड़न जैसे गंभीर आरोपों से जुड़ी हों और शिकायतकर्ताओं में महिला पत्रकार शामिल हों, तब जांच की पारदर्शिता और निष्पक्षता का महत्व कई गुना बढ़ जाता है।
इसी कारण विवेक भगत को एडीसीपी का कार्यभार दिए जाने की खबर ने स्वाभाविक रूप से सवाल पैदा किए।
आरोपों के बीच आदेश से उठा सवाल—टाइमिंग क्यों बनी मुद्दा?
5 अक्टूबर को जारी प्रशासनिक आदेश में 12 DANIPS अधिकारियों को एडीसीपी के पद का वर्तमान कार्यभार सौंपे जाने की जानकारी सामने आई। इनमें ACP विवेक भगत का नाम भी शामिल था।
बाद में दिल्ली सरकार ने स्पष्टीकरण दिया कि यह प्रक्रिया अचानक शुरू नहीं हुई थी। सरकार के अनुसार, इन अधिकारियों को वर्तमान कार्यभार देने का प्रस्ताव 25 अगस्त को ही शुरू किया गया था—यानी जंतर-मंतर की 3 अक्टूबर वाली घटना और उससे जुड़े आरोपों से काफी पहले। आवश्यक अनुमोदन के बाद आदेश 5 अक्टूबर को जारी किया गया।
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि यह नियमित पदोन्नति नहीं, बल्कि Current Duty Charge यानी अस्थायी कार्यभार था। इस व्यवस्था से कोई वित्तीय लाभ नहीं मिलता और ऐसे अधिकारी नियमित रूप से नियुक्त एडीसीपी के वैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल नहीं कर सकते।
यह स्पष्टीकरण प्रशासनिक प्रक्रिया की समय-सीमा को समझने के लिहाज से महत्वपूर्ण है।
लेकिन दूसरी ओर सवाल यह भी है कि जब किसी अधिकारी के खिलाफ गंभीर शिकायतों की जांच चल रही हो, तब उसी अधिकारी को उच्च पद का वर्तमान कार्यभार दिए जाने की खबर सामने आने से पैदा होने वाले भरोसे के संकट को कैसे टाला जाए?
यही वह बिंदु है जहां प्रशासनिक प्रक्रिया और सार्वजनिक धारणा आमने-सामने आती दिखाई देती है।
भगत ने खुद कहा—जांच पूरी होने तक कार्यभार नहीं लेंगे
विवाद बढ़ने के बाद विवेक भगत ने स्वयं अनुरोध किया कि जब तक महिला पत्रकारों के कथित उत्पीड़न से जुड़े मामले की जांच पूरी नहीं हो जाती और उसका संतोषजनक निष्कर्ष नहीं निकलता, तब तक वे एडीसीपी का वर्तमान कार्यभार ग्रहण नहीं करेंगे।
दिल्ली सरकार ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल पर बताया कि इसी अनुरोध के मद्देनजर 5 अक्टूबर के आदेश में संशोधन किया जा रहा है।
इसका अर्थ यह है कि भगत को फिलहाल एडीसीपी का वर्तमान कार्यभार नहीं दिया जाएगा, जबकि शेष 11 अधिकारियों से संबंधित व्यवस्था को दोबारा जारी किया जाएगा।
यहां भी यह स्पष्ट करना जरूरी है कि यह कदम किसी न्यायिक या विभागीय दोषसिद्धि के बराबर नहीं है। जांच का परिणाम अभी सामने नहीं आया है।
12 अधिकारियों की सूची, विवाद के केंद्र में एक नाम
एडीसीपी का वर्तमान कार्यभार पाने वाले 12 अधिकारियों में डॉ. विकास श्योकंद, ए. वेंकटेश, गुरसेवक सिंह, रेनू लता, विदुषी कौशिक, मनु हिमांशु, सकारिया मिहिर प्रवीणभाई, गरिमा तिवारी, विवेक भगत, आशीष कुमार, मनीष लाडला और रोहित गुप्ता शामिल थे।
प्रशासन का कहना है कि यह प्रक्रिया नियमित प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा थी और इसका प्रस्ताव पहले से लंबित था। यही वजह है कि सरकार ने इसे घटनाक्रम से जोड़कर अचानक लिया गया निर्णय मानने से इनकार किया है।
लेकिन पत्रकारों और नागरिक समूहों की चिंता दूसरी है—जांच के दौरान आरोपों से जुड़े अधिकारी को उच्च जिम्मेदारी दिए जाने से निष्पक्षता को लेकर सवाल क्यों न उठें?
लोकतांत्रिक व्यवस्था में केवल निष्पक्ष जांच होना ही पर्याप्त नहीं है; जांच निष्पक्ष दिखाई भी देनी चाहिए। यही सार्वजनिक संस्थाओं की विश्वसनीयता की बुनियादी कसौटी है।
तीन महिला पत्रकारों की शिकायतें अब क्राइम ब्रांच के पास
दिल्ली पुलिस के मुताबिक, तीन महिला पत्रकारों की शिकायतों को क्राइम ब्रांच को भेजा गया है। जांच में संबंधित लोगों के बयान, उपलब्ध वीडियो या अन्य साक्ष्य और घटनाक्रम की परिस्थितियों की जांच महत्वपूर्ण होगी। रिपोर्टों के अनुसार शिकायतकर्ताओं के बयान दर्ज किए गए हैं और अन्य साक्ष्यों की भी जांच की जा रही है।
यही कारण है कि अब निगाहें जांच की दिशा पर टिकी हैं।
क्या शिकायतों पर एफआईआर दर्ज होगी?
क्या आरोपों में नामित प्रत्येक अधिकारी की भूमिका अलग-अलग तय होगी?
क्या घटनास्थल के सीसीटीवी और मोबाइल वीडियो की स्वतंत्र जांच होगी?
क्या शिकायतकर्ताओं और पुलिस अधिकारियों के बयानों का निष्पक्ष मिलान होगा?
और सबसे महत्वपूर्ण—क्या जांच का निष्कर्ष सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया जाएगा?
इन सवालों का जवाब जांच पूरी होने के बाद ही मिल सकेगा।
आरोपों के बाद पत्रकारों का विरोध, संसद मार्ग थाने के बाहर भी प्रदर्शन
महिला पत्रकारों के आरोप सामने आने के बाद स्वतंत्र पत्रकारों और अन्य लोगों ने संसद मार्ग थाने के बाहर प्रदर्शन कर कथित तौर पर एफआईआर दर्ज करने और कार्रवाई की मांग की।
5 अक्टूबर को भी इस मुद्दे को लेकर विरोध प्रदर्शन हुआ। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, करीब 17 लोगों को हिरासत में लिया गया, जिनमें पत्रकार और कथित पीड़ितों में से एक भी शामिल था। पुलिस ने नई दिल्ली इलाके में लागू प्रतिबंधात्मक प्रावधानों का हवाला दिया।
इस पूरे घटनाक्रम ने पुलिस और पत्रकारों के बीच पहले से संवेदनशील संबंधों को और अधिक चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
पुलिस का पक्ष भी जांच का हिस्सा
इस मामले में केवल शिकायतकर्ताओं का पक्ष ही नहीं, बल्कि पुलिस का पक्ष भी जांच का अहम हिस्सा है।
दिल्ली पुलिस का कहना है कि प्रदर्शन के दौरान कानून-व्यवस्था की स्थिति बनी थी और ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों के काम में बाधा डालने से जुड़े आरोप भी सामने आए। पुलिस ने पत्रकारों के प्रदर्शन कवर करने को लेकर दिशानिर्देश भी जारी किए हैं।
यानी जांच को एकतरफा निष्कर्ष की बजाय सभी उपलब्ध तथ्यों के आधार पर आगे बढ़ाना होगा।
अगर आरोप सही पाए जाते हैं तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। अगर आरोपों में लगाए गए तथ्य प्रमाणित नहीं होते, तो उस स्थिति को भी स्पष्ट रूप से सामने रखा जाना चाहिए।
न्याय का मूल सिद्धांत यही है—न आरोप को पहले से दोष सिद्ध माना जाए और न शिकायत को नजरअंदाज किया जाए।
अब असली परीक्षा जांच की है
जंतर-मंतर की घटना ने केवल एक पुलिस अधिकारी की प्रशासनिक जिम्मेदारी का सवाल नहीं उठाया है। इसने यह बड़ा प्रश्न सामने रखा है कि विरोध प्रदर्शन कवर करने वाले पत्रकारों की सुरक्षा और पुलिस की जवाबदेही के बीच संतुलन कैसे बनाया जाएगा।
लोकतंत्र में पुलिस की भूमिका कानून-व्यवस्था बनाए रखना है, जबकि पत्रकारों की भूमिका घटनाओं को जनता के सामने रखना है। दोनों के बीच टकराव की स्थिति में कानून सर्वोपरि है—लेकिन कानून के पालन के नाम पर पत्रकारों के साथ कथित दुर्व्यवहार के आरोप भी नजरअंदाज नहीं किए जा सकते।
इसी तरह पत्रकार होने के आधार पर किसी व्यक्ति को कानून से ऊपर नहीं माना जा सकता। इसलिए इस पूरे मामले में व्यक्ति नहीं, प्रक्रिया महत्वपूर्ण है; आरोप नहीं, प्रमाण निर्णायक होंगे।
‘पर्दाफाश’ के सवाल: जवाब अब जांच से चाहिए
इस प्रकरण में दिल्ली सरकार ने प्रशासनिक आदेश संशोधित कर फिलहाल एक सवाल का जवाब दे दिया है—विवेक भगत जांच पूरी होने तक एडीसीपी का वर्तमान कार्यभार नहीं लेंगे।
लेकिन बड़े सवाल अभी बाकी हैं।
महिला पत्रकारों की शिकायतों पर जांच कितनी तेजी से होगी?
क्या जांच की निगरानी पर्याप्त स्वतंत्र और पारदर्शी होगी?
क्या शिकायतकर्ताओं को बिना दबाव अपना पक्ष रखने का अवसर मिलेगा?
क्या पुलिसकर्मियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों की पुष्टि या खंडन ठोस साक्ष्यों के आधार पर होगा?
और अंततः—
क्या जांच का परिणाम जनता और पत्रकार समुदाय के सामने स्पष्ट तरीके से रखा जाएगा?
दिल्ली जैसे देश की राजधानी में किसी महिला पत्रकार द्वारा पुलिस अधिकारी पर यौन उत्पीड़न का आरोप महज एक व्यक्तिगत विवाद नहीं माना जा सकता। यह मामला पुलिस की जवाबदेही, महिला सुरक्षा, प्रेस की स्वतंत्रता और सार्वजनिक संस्थाओं पर भरोसे से जुड़ा है।
इसलिए जरूरत न तो जल्दबाजी में किसी अधिकारी को दोषी ठहराने की है और न ही गंभीर आरोपों को महज प्रशासनिक प्रक्रिया बताकर किनारे करने की।
जरूरत है निष्पक्ष, पारदर्शी और तथ्य आधारित जांच की।
क्योंकि इस मामले में असली सवाल यह नहीं है कि किसे पद मिला और किससे वापस लिया गया।
असली सवाल यह है कि जांच पूरी होने के बाद सच क्या सामने आता है—और क्या उस सच पर कानून बिना किसी दबाव के कार्रवाई कर पाता है?
यही इस पूरे विवाद की सबसे बड़ी परीक्षा होगी।















