पश्चिम बंगाल की राजनीति की सबसे निर्णायक सुबह अब बस कुछ घंटों की दूरी पर है। दो चरणों में संपन्न हुए ऐतिहासिक विधानसभा चुनाव के बाद सोमवार सुबह 8 बजे से 293 सीटों पर मतगणना शुरू होगी और दोपहर तक तस्वीर काफी हद तक साफ हो जाएगी कि क्या ममता बनर्जी लगातार चौथी बार सत्ता पर कब्जा बनाए रखेंगी या Bharatiya Janata Party के Suvendu Adhikari पहली बार बंगाल में कमल खिलाने का इतिहास रच देंगे।
मतगणना से पहले ही इतिहास रच चुका है यह चुनाव
नतीजे आने से पहले ही बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 ने अपने नाम एक बड़ा रिकॉर्ड दर्ज कर लिया है। राज्य में 92.47 प्रतिशत से अधिक मतदान हुआ है, जो आज़ादी के बाद बंगाल का सबसे बड़ा वोटिंग प्रतिशत माना जा रहा है। 2011, 2016 और 2021 के सभी मतदान रिकॉर्ड इस बार टूट गए। पहले चरण में कई इलाकों में 93 प्रतिशत के आसपास और दूसरे चरण में 91 प्रतिशत से अधिक वोटिंग ने साफ संकेत दिया कि इस बार जनता सिर्फ औपचारिक मतदान करने नहीं निकली, बल्कि मन में कोई बड़ा फैसला लेकर बूथ तक पहुंची थी।
इतनी बड़ी वोटिंग को राजनीतिक जानकार सामान्य लोकतांत्रिक उत्साह नहीं, बल्कि सत्ता बदलने या सत्ता बचाने की जबरदस्त मनोवैज्ञानिक लड़ाई का संकेत मान रहे हैं।
294 नहीं, सिर्फ 293 सीटों पर होगी काउंटिंग
इस चुनाव में एक और बड़ा ट्विस्ट भी जुड़ गया है। सोमवार को पूरे 294 नहीं बल्कि 293 सीटों पर ही मतगणना होगी। Falta Assembly Constituency सीट पर मतदान में गड़बड़ी, बूथ हस्तक्षेप और चुनावी अनियमितताओं के आरोपों के बाद चुनाव आयोग ने वहां दोबारा मतदान का आदेश दिया है। इस सीट पर 21 मई को री-पोल होगा और 24 मई को अलग से मतगणना होगी।
यानी बंगाल का लगभग पूरा सियासी फैसला कल सामने आ जाएगा, लेकिन एक सीट पर राजनीतिक तनाव अभी जारी रहेगा।
रिकॉर्ड वोटिंग ने खड़ा किया सबसे बड़ा सवाल—लहर किसके पक्ष में?
आज बंगाल की हर राजनीतिक चौपाल पर सिर्फ एक सवाल है—इतनी भारी वोटिंग आखिर किसके पक्ष में गई?
2021 के मुकाबले इस बार दोनों चरणों में लाखों अतिरिक्त वोट पड़े हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रवासी मजदूरों का घर लौटना, गांवों में असंतोष, महिलाओं की भारी भागीदारी और युवाओं की आक्रामक मौजूदगी इस अतिरिक्त वोटिंग के पीछे सबसे बड़ा कारण है। यही नए वोटर इस चुनाव के सबसे खामोश लेकिन सबसे विस्फोटक एक्स-फैक्टर बन चुके हैं।
अगर ये वोट सत्ता विरोधी गुस्से के हैं तो बंगाल में बड़ा उलटफेर हो सकता है, लेकिन अगर इन वोटरों को तृणमूल ने बूथ स्तर पर सफलतापूर्वक साध लिया तो ममता बनर्जी पहले से ज्यादा मजबूत निकल सकती हैं।
बीजेपी क्यों मान रही है कि इस बार जनता ने चुपचाप गुस्सा जताया है
भारतीय जनता पार्टी ने इस चुनाव को पूरी तरह जनाक्रोश के चुनाव में बदलने की कोशिश की।
15 साल की एंटी इनकंबेंसी, महिला सुरक्षा पर उठे गंभीर सवाल, चर्चित दुष्कर्म मामलों की गूंज, तृणमूल पर भ्रष्टाचार के आरोप, 26 हजार नौकरियों के रद्द होने से युवाओं का गुस्सा, आलू किसानों की नाराजगी और बेरोजगारी—इन तमाम मुद्दों को भाजपा ने “परिवर्तन” के बड़े नारे से जोड़ा। भाजपा का दावा है कि इस बार जनता ने मंचों पर नहीं, सीधे ईवीएम में गुस्सा उतारा है।
खासकर शहरी मध्यमवर्ग, पढ़े-लिखे बेरोजगार युवा और आर्थिक संकट झेल रहे किसान वर्ग में भाजपा अपने लिए छुपे हुए समर्थन की उम्मीद देख रही है।
ध्रुवीकरण वाले इलाके BJP के लिए बना सकते हैं गेम
भाजपा सिर्फ एंटी इनकंबेंसी पर नहीं, बल्कि कई संवेदनशील इलाकों में हुए राजनीतिक ध्रुवीकरण पर भी भरोसा कर रही है।
मुर्शिदाबाद का तनाव, वक्फ से जुड़े विवाद, सीमावर्ती हिंसा, पहचान आधारित राजनीति और कानून-व्यवस्था के मुद्दों ने कई सीटों पर वोटों को तेज़ी से ध्रुवीकृत किया है। भाजपा नेताओं का मानना है कि एक बड़ा “साइलेंट एंगर वोट” बिना शोर किए बैलेट बॉक्स में बंद हो चुका है और मतगणना के दिन यही सबसे बड़ा धमाका कर सकता है।
लेकिन ममता बनर्जी को कमजोर समझना सबसे बड़ी भूल होगी
फिर भी यह चुनाव सीधी सत्ता विरोधी लहर वाला चुनाव नहीं है। All India Trinamool Congress के पास आज भी बंगाल का सबसे मजबूत बूथ-लेवल संगठन माना जाता है। गांव-गांव तक सक्रिय कार्यकर्ता, आखिरी मिनट तक वोटर को बूथ तक पहुंचाने की क्षमता और स्थानीय सामाजिक नेटवर्क तृणमूल की सबसे बड़ी ताकत हैं।
इसके साथ ही लक्ष्मी भंडार, कन्याश्री, रूपश्री जैसी योजनाओं ने महिला वोटरों के बीच ममता बनर्जी की पकड़ को बेहद मजबूत बनाए रखा है। जंगलमहल में संगठनात्मक वापसी और अल्पसंख्यक वोटों का संभावित ध्रुवीकरण भी तृणमूल को राहत दे सकता है।
यानी सत्ता विरोधी माहौल जरूर है, लेकिन उसके सामने ममता का कल्याणकारी और जमीनी किला पूरी मजबूती से खड़ा है।
अल्पसंख्यक वोट, महिला वोट और गांव की नब्ज तय करेगी सत्ता
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि अंतिम नतीजा बड़े भाषणों से नहीं, तीन शांत वोटबैंकों से निकलेगा—
अल्पसंख्यक वोट किस ओर एकजुट हुए,
कल्याणकारी योजनाओं से जुड़ी महिला वोटर कितनी मजबूती से साथ रहीं,
और ग्रामीण संगठनात्मक पकड़ किस हद तक काम आई।
अगर ये तीनों स्तंभ तृणमूल के साथ मजबूती से खड़े रहे तो ममता फिर लौटेंगी।
लेकिन इनमें से एक भी बड़ा आधार दरका तो भाजपा इतिहास रच सकती है।
मतगणना से पहले चुनाव आयोग हाई अलर्ट पर
कल के नतीजों की संवेदनशीलता को देखते हुए चुनाव आयोग ने अभूतपूर्व सुरक्षा इंतजाम किए हैं। 165 अतिरिक्त केंद्रीय पर्यवेक्षक तैनात किए गए हैं, स्ट्रॉन्गरूम की निगरानी बढ़ाई गई है और हर काउंटिंग सेंटर पर केंद्रीय व राज्य अधिकारियों की संयुक्त नजर रहेगी।
इससे साफ है कि प्रशासन को भी अंदेशा है कि नतीजों का दिन बेहद तनावपूर्ण और राजनीतिक रूप से विस्फोटक हो सकता है।
यह सिर्फ सीटों की गिनती नहीं, बंगाल के अगले दशक का फैसला है
यह अब सिर्फ चुनाव परिणाम नहीं रह गया है।
यह दो राजनीतिक मॉडलों की सीधी टक्कर है—
एक तरफ ममता बनर्जी का कल्याणकारी जमीनी नेटवर्क,
दूसरी तरफ भाजपा का बदलाव, राष्ट्रवाद और सत्ता विरोधी जनाक्रोश का अभियान।
92 प्रतिशत रिकॉर्ड वोटिंग ने एक बात तो तय कर दी है कि इस बार बंगाल की जनता सिर्फ दर्शक नहीं रही, उसने मन बनाकर वोट डाला है।
अब सिर्फ एक सवाल बाकी है—
क्या जनता ने दीदी के किले को फिर से बचाया है… या पहली बार कमल क्रांति का बटन दबा दिया है?
कल दोपहर का सबसे बड़ा फैसला
कल दोपहर तक बंगाल तय कर देगा—ममता बनर्जी फिर निर्विवाद शासक बनेंगी या भाजपा वर्षों की राजनीतिक तपस्या को ऐतिहासिक सत्ता परिवर्तन में बदल देगी।














