HomePoliticsSIR पर संग्राम: कांग्रेस को अश्विनी वैष्णव की खुली चुनौती, EVM से...

SIR पर संग्राम: कांग्रेस को अश्विनी वैष्णव की खुली चुनौती, EVM से लेकर वोटर लिस्ट तक… आखिर विपक्ष किस बात से परेशान है?

संसद में बहस की चुनौती देकर केंद्रीय मंत्री ने कांग्रेस को घेरा, अटल-आडवाणी के दौर की याद दिलाई; लेकिन SIR की आड़ में छिड़ी इस राजनीतिक लड़ाई का असली सवाल सिर्फ वोटर लिस्ट नहीं, लोकतांत्रिक भरोसे का भी है।

लोकतंत्र में चुनाव सिर्फ सरकार बनाने का रास्ता नहीं होते, बल्कि जनता के भरोसे की सबसे बड़ी परीक्षा भी होते हैं। इस परीक्षा में वोटर लिस्ट की भूमिका उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितनी मतदान केंद्र पर रखी ईवीएम की। लेकिन जब वोटर लिस्ट के पुनरीक्षण यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर राजनीतिक दल आमने-सामने आ जाएं, तो सवाल सिर्फ मतदाता सूची की शुद्धता का नहीं रह जाता, बल्कि उसके पीछे छिपी राजनीतिक मंशाओं, चुनावी गणित और संस्थागत विश्वसनीयता तक पहुंच जाता है।

इन दिनों SIR को लेकर देश की राजनीति में कुछ ऐसा ही नजारा दिखाई दे रहा है। विपक्ष इसे लोकतांत्रिक अधिकारों और मतदाताओं के नाम पर उठाए जा रहे सवालों से जोड़ रहा है, जबकि बीजेपी इसे चुनावी व्यवस्था को दुरुस्त करने की संवैधानिक प्रक्रिया बता रही है। यानी एक तरफ विपक्ष को वोटर लिस्ट में संभावित गड़बड़ियों का डर है, तो दूसरी तरफ सत्तापक्ष को विपक्ष की मंशा पर संदेह है।

इस राजनीतिक रस्साकशी में अब केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कांग्रेस के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने न सिर्फ कांग्रेस की SIR पर आपत्तियों को कठघरे में खड़ा किया, बल्कि ईवीएम को लेकर भी ऐसा सवाल उछाल दिया, जिसका जवाब देकर कांग्रेस को अपनी पुरानी राजनीतिक भूमिका की याद दिलानी पड़ सकती है। वैष्णव ने राहुल गांधी को सीधे चुनौती देते हुए कहा कि अगर कांग्रेस को बहस करनी है तो सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर आरोप लगाने के बजाय संसद में आए। सरकार बहस के लिए विशेष सत्र बुलाने को भी तैयार है।

लेकिन इस चुनौती के पीछे एक बड़ा राजनीतिक संदेश छिपा है। बीजेपी चाहती है कि SIR को लेकर चल रही बहस का केंद्र कांग्रेस के आरोपों से हटकर कांग्रेस की राजनीतिक विश्वसनीयता पर आ जाए।

संसद का दरवाजा खुला है, अब कांग्रेस मैदान में आए!

बीजेपी के ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ अभियान में अश्विनी वैष्णव ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि लोकतंत्र का मूल आधार सही मतदाता सूची है। चुनाव की पूरी व्यवस्था इसी पर टिकी होती है। यदि मतदाता सूची ही त्रुटिपूर्ण होगी तो चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

उनका तर्क है कि SIR कोई अचानक पैदा हुई व्यवस्था नहीं है, बल्कि संविधान के तहत निर्धारित प्रक्रिया है। यह प्रक्रिया आज शुरू नहीं हुई है। आजादी के बाद से अलग-अलग समय पर मतदाता सूचियों का विशेष पुनरीक्षण होता रहा है। कांग्रेस की सरकारों के दौरान भी ऐसा हुआ है। ऐसे में कांग्रेस को यह स्पष्ट करना चाहिए कि जिस प्रक्रिया को उसके शासनकाल में स्वीकार किया जाता था, आज उसी पर सवाल उठाने की वजह क्या है?

वैष्णव ने राहुल गांधी को चुनौती देते हुए कहा कि कांग्रेस जिस विषय पर चाहे, संसद में बहस कर सकती है। सरकार बहस से पीछे हटने वाली नहीं है। उन्होंने यहां तक कहा कि जरूरत पड़ने पर विशेष सत्र भी बुलाया जा सकता है।

उनका संदेश साफ था—आरोप लगाने हैं तो सदन में आइए, सवाल पूछने हैं तो संसदीय मंच का इस्तेमाल कीजिए और सरकार के जवाब सुनने का साहस भी दिखाइए।

हालांकि, इस चुनौती में एक राजनीतिक पेंच भी है। संसद में बहस की मांग करना और किसी प्रक्रिया पर उठे सवालों का संतोषजनक जवाब देना दो अलग-अलग बातें हैं। विपक्ष को बहस का अवसर देना लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है, लेकिन बहस का परिणाम पहले से तय मान लेना भी लोकतांत्रिक संवाद की भावना के अनुकूल नहीं कहा जा सकता।

EVM पर कांग्रेस को पुरानी फाइल दिखा गए वैष्णव!

अश्विनी वैष्णव ने SIR के साथ-साथ EVM का मुद्दा भी उठा दिया। उन्होंने कांग्रेस से सवाल किया कि जिस इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन को लेकर आज सवाल खड़े किए जा रहे हैं, उसे चुनावी व्यवस्था में लाने की शुरुआत कांग्रेस के शासनकाल में ही हुई थी। फिर आज कांग्रेस उसी व्यवस्था पर सवाल क्यों उठा रही है?

यह सवाल राजनीतिक रूप से दिलचस्प जरूर है। क्योंकि भारतीय राजनीति में EVM अब सिर्फ मतदान की मशीन नहीं रह गई है, बल्कि चुनावी हार-जीत के बाद होने वाली बहस का स्थायी हिस्सा बन चुकी है।

जब नतीजे पक्ष में आते हैं तो व्यवस्था पर भरोसा जताया जाता है और जब परिणाम उम्मीद के मुताबिक नहीं होते तो मशीन से लेकर चुनावी प्रक्रिया तक पर सवाल उठने लगते हैं। हालांकि, किसी राजनीतिक दल के आरोप को महज हार की हताशा बताकर खारिज कर देना भी उचित नहीं है। चुनावी व्यवस्था पर भरोसा बनाए रखने के लिए सवालों का जवाब पारदर्शिता और प्रमाणों के आधार पर देना जरूरी है।

वैष्णव का निशाना इसी राजनीतिक विरोधाभास पर था। वह कांग्रेस को यह याद दिलाना चाहते थे कि चुनावी तकनीक और संस्थागत व्यवस्थाओं को लेकर उसकी अपनी भी एक राजनीतिक विरासत रही है।

लेकिन यहां एक सवाल कांग्रेस से भी बनता है और बीजेपी से भी। अगर EVM पर सवाल उठाना गलत है तो उसका जवाब तथ्यों से क्यों न दिया जाए? और अगर किसी चुनावी व्यवस्था में सुधार की जरूरत है तो उसे केवल इसलिए अस्वीकार क्यों किया जाए कि उस पर सवाल विपक्ष उठा रहा है?

लोकतंत्र में सवाल पूछने का अधिकार भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना उन सवालों का जवाब देना।

अटल-आडवाणी का नाम लेकर कांग्रेस को घेरने की रणनीति

अपने संबोधन में वैष्णव ने बीजेपी के पुराने दौर का जिक्र करते हुए कहा कि पार्टी ने लगभग 50 साल विपक्ष में बिताए, लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे नेताओं ने कभी किसी संस्था पर इस तरह आरोप नहीं लगाए।

यहां वैष्णव सिर्फ दो वरिष्ठ नेताओं की राजनीतिक प्रशंसा नहीं कर रहे थे, बल्कि कांग्रेस के सामने बीजेपी के पुराने संघर्षों का उदाहरण रखकर उसे नैतिक रूप से घेरने की कोशिश कर रहे थे।

राजनीति में इतिहास का इस्तेमाल अक्सर वर्तमान की लड़ाई लड़ने के लिए किया जाता है। अटल-आडवाणी का नाम लेकर वैष्णव कांग्रेस को यह संदेश देना चाहते हैं कि विपक्ष में रहने का मतलब हर संस्थागत निर्णय को संदेह के घेरे में खड़ा करना नहीं होता।

लेकिन इस तर्क का दूसरा पहलू भी है। अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के दौर की राजनीतिक परिस्थितियां आज से अलग थीं। आज चुनावी राजनीति का स्वरूप बदल चुका है। संचार माध्यमों की पहुंच, राजनीतिक प्रतिस्पर्धा, चुनावी रणनीतियां और संस्थाओं को लेकर सार्वजनिक बहस का दायरा कहीं अधिक व्यापक हो गया है।

इसलिए पुराने नेताओं के आचरण को आज के विपक्ष के लिए एकमात्र राजनीतिक कसौटी बना देना आसान तो है, लेकिन पूरी तरह पर्याप्त नहीं।

संस्थाओं की प्रतिष्ठा बनाए रखना सत्ता और विपक्ष दोनों की जिम्मेदारी है। सरकार को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि संस्थाओं की निष्पक्षता पर उठने वाले सवालों का जवाब सिर्फ राजनीतिक भाषणों से नहीं, बल्कि पारदर्शी कार्रवाई से दिया जाए।

केरल का उदाहरण और कांग्रेस पर परिवारवाद का तंज

वैष्णव ने केरलम का जिक्र करते हुए कांग्रेस की राजनीति पर भी कटाक्ष किया। उन्होंने कहा कि वहां के चुनावी परिणामों को देखना चाहिए और इसे इस बात से जोड़ा कि जब कोई अपनी पार्टी छोड़कर एक ही परिवार का आंख बंद करके अनुसरण करता है तो ऐसी स्थिति पैदा होती है।

यहां उनका हमला सीधे कांग्रेस के नेतृत्व और गांधी परिवार के राजनीतिक प्रभाव पर था।

बीजेपी लंबे समय से कांग्रेस पर परिवारवाद का आरोप लगाती रही है। राहुल गांधी के नेतृत्व को लेकर सवाल उठाना भी उसकी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा रहा है। इस बार SIR की बहस में भी वैष्णव ने उसी पुराने राजनीतिक हथियार का इस्तेमाल किया।

दरअसल, बीजेपी के लिए यह सिर्फ मतदाता सूची का विवाद नहीं है। यह कांग्रेस को नेतृत्व, संगठन और राजनीतिक जवाबदेही के मोर्चे पर घेरने का भी अवसर है।

कांग्रेस यदि SIR के विरोध में सड़कों पर उतरती है तो बीजेपी उसे संवैधानिक प्रक्रिया का विरोध करने वाली पार्टी के रूप में पेश कर सकती है। यदि कांग्रेस संसद में बहस करती है तो सरकार को अपने पक्ष में तर्क रखने और विपक्ष के आरोपों का जवाब देने का मंच मिलेगा।

इस तरह दोनों ही स्थितियों में बीजेपी ने बहस का राजनीतिक केंद्र अपने पक्ष में खींचने की कोशिश की है।

SIR की असली परीक्षा: कितने नाम जुड़े, कितने कटे और क्यों?

हालांकि, इस पूरे राजनीतिक शोर में सबसे महत्वपूर्ण सवाल कहीं पीछे छूटता दिखाई देता है। आखिर SIR से आम मतदाता को क्या फायदा होगा और उसे किस तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है?

मतदाता सूची का शुद्धिकरण निश्चित रूप से जरूरी है। मृत मतदाताओं के नाम हटाना, स्थानांतरित हो चुके मतदाताओं के रिकॉर्ड को दुरुस्त करना और पात्र नागरिकों के नाम सूची में शामिल करना चुनावी व्यवस्था की बुनियादी जरूरत है।

लेकिन इसके साथ यह सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है कि किसी वास्तविक मतदाता का नाम गलती से सूची से बाहर न हो जाए।

भारत जैसे विशाल देश में बड़ी संख्या में ऐसे नागरिक हैं जो रोजगार, शिक्षा और दूसरे कारणों से एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते रहते हैं। कई लोगों के दस्तावेजों में नाम, पता और अन्य विवरणों में अंतर भी होता है। ऐसे में पुनरीक्षण की प्रक्रिया जितनी व्यापक होगी, उतनी ही अधिक सावधानी और पारदर्शिता की जरूरत होगी।

किसी गरीब, बुजुर्ग, प्रवासी मजदूर या दस्तावेजी परेशानियों से जूझ रहे नागरिक के लिए मतदाता सूची में नाम न होना केवल एक प्रशासनिक गलती नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकार से वंचित होने जैसी स्थिति पैदा कर सकता है।

इसलिए SIR की सफलता का पैमाना यह नहीं होना चाहिए कि कितने नाम काटे गए या कितने नए नाम जोड़े गए। असली पैमाना यह होना चाहिए कि कितने पात्र मतदाताओं के अधिकार सुरक्षित रहे और कितनी निष्पक्षता से पूरी प्रक्रिया पूरी हुई।

यही वह बिंदु है जहां सरकार को विपक्ष के सवालों का जवाब देना होगा और विपक्ष को भी अपने आरोपों के समर्थन में ठोस तथ्य रखने होंगे।

बीजेपी की चुनौती और कांग्रेस की अगली चाल

अश्विनी वैष्णव के बयान को केवल कांग्रेस पर किया गया एक और राजनीतिक हमला मानना शायद इस पूरे घटनाक्रम को अधूरा समझना होगा। इसमें बीजेपी की एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति दिखाई देती है।

सरकार चाहती है कि SIR पर होने वाली बहस का आधार संवैधानिक प्रक्रिया और चुनावी सुधार हो। वहीं कांग्रेस इस मुद्दे को लोकतांत्रिक अधिकारों, मतदाता सूची की पारदर्शिता और चुनावी निष्पक्षता के सवाल से जोड़ना चाहती है।

दोनों पक्षों की अपनी राजनीतिक जरूरतें हैं। बीजेपी को यह दिखाना है कि वह चुनावी व्यवस्था को मजबूत कर रही है, जबकि कांग्रेस को यह साबित करना है कि वह लोकतांत्रिक संस्थाओं की जवाबदेही के लिए आवाज उठा रही है।

लेकिन इस राजनीतिक मुकाबले में जनता को सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप नहीं चाहिए। उसे यह भरोसा चाहिए कि उसका नाम मतदाता सूची में सुरक्षित रहेगा, उसका वोट किसी गलती या प्रशासनिक लापरवाही की भेंट नहीं चढ़ेगा और चुनावी प्रक्रिया पर किसी भी तरह का संदेह पैदा होने पर उसकी निष्पक्ष जांच होगी।

वैष्णव ने राहुल गांधी को संसद में बहस की चुनौती दे दी है। अब देखना यह है कि कांग्रेस इस चुनौती को किस तरह लेती है। क्या वह सदन में बहस के लिए तैयार होती है या SIR के खिलाफ अपना राजनीतिक अभियान जारी रखती है?

और उससे भी बड़ा सवाल यह है कि अगर संसद में बहस होती है तो क्या उसमें सिर्फ राजनीतिक भाषण होंगे या मतदाता सूची की शुद्धता, नाम हटाने की प्रक्रिया, आपत्तियों के निस्तारण और आम नागरिकों के अधिकारों पर ठोस जवाब भी सामने आएंगे?

क्योंकि लोकतंत्र में असली जीत न बीजेपी की होती है, न कांग्रेस की। असली जीत उस मतदाता की होती है, जिसका नाम सूची में हो, जिसकी आवाज सुनी जाए और जिसका वोट पूरी विश्वसनीयता के साथ दर्ज हो।

फिलहाल SIR की लड़ाई में बीजेपी ने कांग्रेस के सामने संसद का मैदान खोलने की चुनौती रख दी है। अब गेंद राहुल गांधी के पाले में है। लेकिन इस पूरे राजनीतिक मैच में जनता की नजर स्कोरबोर्ड पर नहीं, अपने वोट के अधिकार पर टिकी है।

- Advertisement -
Your Dream Technologies
VIKAS TRIPATHI
VIKAS TRIPATHIhttp://www.pardaphaas.com
VIKAS TRIPATHI भारत देश की सभी छोटी और बड़ी खबरों को सामने दिखाने के लिए "पर्दाफास न्यूज" चैनल को लेके आए हैं। जिसके लोगो के बीच में करप्शन को कम कर सके। हम देश में समान व्यवहार के साथ काम करेंगे। देश की प्रगति को बढ़ाएंगे।
RELATED ARTICLES
- Advertisment -

Most Popular

Recent Comments