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नोएडा प्राधिकरण का अजब इंतजाम! चार काउंटर, फिर भी बुजुर्गों की लंबी कतारें… आखिर जनता को किस बात की सजा?

विशेष रिपोर्ट | पर्दे के पीछे की कहानी

नोएडा। सरकारी दफ्तरों में आम जनता की सहूलियत के लिए व्यवस्थाएं बनाई जाती हैं, ताकि लोगों को अपना काम कराने में कम से कम परेशानी हो। लेकिन जब व्यवस्था ही परेशानी की वजह बन जाए, तो सवाल उठना लाजिमी है। नोएडा प्राधिकरण के सेक्टर-96 स्थित मुख्य प्रशासनिक भवन के स्वागत कक्ष में प्रवेश पास बनवाने की व्यवस्था कुछ ऐसी ही तस्वीर पेश कर रही है। यहां चार काउंटर बनाए गए हैं, लेकिन कथित तौर पर उनमें से केवल दो काउंटरों पर ही प्रवेश पास बनाए जा रहे हैं। नतीजा यह है कि आम नागरिकों के साथ-साथ बुजुर्ग महिलाओं और पुरुषों को भी घंटों लंबी कतारों में खड़े होकर अपनी बारी का इंतजार करना पड़ रहा है।

यह केवल पास बनवाने में लगने वाले समय का मामला नहीं है, बल्कि सरकारी व्यवस्था की प्राथमिकताओं और आम जनता के प्रति जिम्मेदारी का भी सवाल है। आखिर जब चार काउंटर मौजूद हैं, तो सभी काउंटरों का इस्तेमाल क्यों नहीं किया जा रहा? क्या प्राधिकरण के पास पर्याप्त स्टाफ नहीं है, क्या तकनीकी व्यवस्था दुरुस्त नहीं है या फिर अधिकारियों ने इस समस्या को गंभीरता से लेना ही छोड़ दिया है?

चार काउंटर की व्यवस्था, लेकिन जनता के हिस्से में सिर्फ इंतजार!

ग्राम विकास संगठन, नोएडा के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी अशोक चौहान जब नोएडा प्राधिकरण के मुख्य प्रशासनिक भवन, सेक्टर-96 पहुंचे, तो स्वागत कक्ष में उन्हें एक ऐसी स्थिति देखने को मिली, जिसने सरकारी व्यवस्थाओं पर सवाल खड़े कर दिए।

प्रवेश पास बनवाने के लिए स्वागत कक्ष में दो लंबी कतारें लगी हुई थीं। इन कतारों में सैकड़ों की संख्या में महिला और पुरुष अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। इनमें बड़ी संख्या में बुजुर्ग महिला और पुरुष भी शामिल थे। कोई अपनी शिकायत लेकर प्राधिकरण के अधिकारियों से मिलने आया था, तो कोई अपने क्षेत्र की समस्या का समाधान कराने की उम्मीद लेकर पहुंचा था।

लेकिन अधिकारियों तक पहुंचने से पहले ही लोगों को एक दूसरी परीक्षा से गुजरना पड़ रहा था। यह परीक्षा थी प्रवेश पास बनवाने के लिए घंटों लाइन में खड़े रहने की।

सबसे हैरानी की बात यह थी कि प्रवेश पास बनाने के लिए स्वागत कक्ष में चार काउंटर बनाए गए हैं। सामान्य तौर पर चार काउंटर होने का मतलब यह होना चाहिए कि लोगों को जल्द से जल्द पास उपलब्ध कराया जाए और भीड़ को नियंत्रित रखा जाए। लेकिन मौके पर स्थिति इसके उलट दिखाई दी।

चार काउंटर होने के बावजूद केवल दो काउंटरों पर ही प्रवेश पास बनाए जा रहे थे। बाकी दो काउंटरों पर कामकाज नहीं हो रहा था। ऐसे में स्वाभाविक रूप से सवाल पैदा हुआ कि जब जनता की सुविधा के लिए चार काउंटर उपलब्ध हैं, तो उनका पूरा उपयोग क्यों नहीं किया जा रहा?

जब पूछा सवाल, तो मिला सिर्फ एक जवाब—’सिस्टम नहीं है’!

अशोक चौहान ने जब नोएडा प्राधिकरण के स्टाफ से पूछा कि बाकी दो काउंटरों पर प्रवेश पास क्यों नहीं बनाए जा रहे हैं, तो उन्हें जवाब मिला कि वहां सिस्टम नहीं है।

यह जवाब अपने आप में कई सवाल खड़े करता है।

आखिर चार काउंटर बनाने का उद्देश्य क्या था? क्या बाकी दो काउंटर केवल दिखावे के लिए बनाए गए हैं? यदि उन पर कंप्यूटर या अन्य तकनीकी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं, तो अब तक उन्हें दुरुस्त क्यों नहीं किया गया? क्या प्राधिकरण के जिम्मेदार अधिकारियों को इस बात की जानकारी नहीं है कि प्रतिदिन बड़ी संख्या में लोग प्रवेश पास बनवाने के लिए पहुंचते हैं?

एक तरफ नोएडा को आधुनिक शहर के रूप में विकसित करने की बात होती है। दूसरी तरफ शहर के सबसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक भवन में प्रवेश पाने के लिए आम नागरिकों को घंटों कतार में खड़ा होना पड़ता है।

यह स्थिति किसी भी संवेदनशील प्रशासनिक व्यवस्था के लिए चिंतन का विषय होनी चाहिए।

बुजुर्गों की परेशानी कौन समझेगा?

इस पूरे मामले का सबसे संवेदनशील पहलू यह है कि लंबी कतारों में केवल युवा या स्वस्थ लोग ही नहीं, बल्कि बुजुर्ग महिला और पुरुष भी खड़े दिखाई देते हैं।

जरा कल्पना कीजिए कि 65-70 वर्ष या उससे अधिक उम्र का कोई बुजुर्ग अपनी शिकायत लेकर प्राधिकरण पहुंचता है। उसे उम्मीद होती है कि संबंधित अधिकारी उसकी समस्या सुनेंगे और कोई समाधान निकालेंगे। लेकिन अधिकारी तक पहुंचने से पहले ही उसे घंटों लाइन में खड़ा रहना पड़ता है।

किसी बुजुर्ग को घुटनों में दर्द हो सकता है, किसी को कमर की परेशानी हो सकती है, तो किसी के लिए लंबे समय तक खड़े रहना बेहद मुश्किल हो सकता है। महिलाओं और वरिष्ठ नागरिकों के लिए ऐसी स्थिति और भी असुविधाजनक हो सकती है।

सवाल यह है कि क्या प्राधिकरण के स्वागत कक्ष में वरिष्ठ नागरिकों के लिए कोई अलग व्यवस्था नहीं होनी चाहिए?

क्या ऐसा नहीं हो सकता कि बुजुर्गों, दिव्यांगजनों और जरूरतमंद महिलाओं के लिए प्राथमिकता के आधार पर पास बनाने की सुविधा उपलब्ध कराई जाए?

आखिर जनता अपनी समस्याओं को लेकर सरकारी कार्यालय पहुंचती है। ऐसे में उसे राहत देने के बजाय यदि कार्यालय की शुरुआती प्रक्रिया ही उसके लिए परेशानी बन जाए, तो प्रशासनिक संवेदनशीलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

जनसुनवाई का समय खत्म, लेकिन जनता पास की लाइन में!

इस व्यवस्था का एक और गंभीर पहलू समय की बर्बादी है।

लोग अपने घरों से काफी उम्मीद लेकर निकलते हैं। कोई दूरदराज के गांव से आता है, कोई सेक्टर से, तो कोई अपनी रोजमर्रा की जिम्मेदारियों को छोड़कर प्राधिकरण पहुंचता है। कई लोगों के लिए एक दिन का समय निकालना भी आसान नहीं होता।

लेकिन जब प्रवेश पास बनवाने में ही घंटों लग जाते हैं, तो लोगों का कीमती समय स्वागत कक्ष की कतारों में खर्च हो जाता है।

इससे सबसे बड़ी समस्या तब पैदा होती है, जब पास बनवाने की प्रक्रिया पूरी होते-होते संबंधित विभाग की जनसुनवाई का समय समाप्त होने लगता है या खत्म हो जाता है।

ऐसे में व्यक्ति जिस अधिकारी से मिलने और अपनी समस्या रखने आया था, उससे मुलाकात ही नहीं हो पाती। उसे निराश होकर वापस लौटना पड़ सकता है या फिर अगले दिन दोबारा आने की मजबूरी बन सकती है।

यह स्थिति आम आदमी के लिए आर्थिक और मानसिक दोनों तरह से परेशानी पैदा करती है।

आखिर किसी नागरिक की गलती क्या है? क्या उसने अपनी समस्या लेकर सरकारी कार्यालय पहुंचकर कोई गलत काम किया है? क्या उसे अपनी बात रखने के लिए भी घंटों इंतजार करना पड़ेगा?

सवाल सिर्फ दो काउंटरों का नहीं, प्रशासनिक जवाबदेही का है

नोएडा प्राधिकरण एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक संस्था है। इसके अंतर्गत शहर के विकास, नागरिक सुविधाओं, आवासीय क्षेत्रों, औद्योगिक क्षेत्रों और अन्य जनहित से जुड़े अनेक कार्य आते हैं। ऐसे में प्राधिकरण के मुख्य प्रशासनिक भवन में आने वाले नागरिकों को बेहतर सुविधाएं मिलनी चाहिए।

प्रवेश पास बनाना कोई ऐसा जटिल काम नहीं होना चाहिए, जिसके लिए आम जनता को घंटों इंतजार करना पड़े। यदि सुरक्षा कारणों से प्रत्येक व्यक्ति का विवरण दर्ज करना जरूरी है, तो इस प्रक्रिया को व्यवस्थित और तेज बनाया जा सकता है।

चार काउंटर उपलब्ध होने के बावजूद यदि केवल दो काउंटर काम कर रहे हैं, तो यह प्रबंधन की कमी की ओर संकेत करता है। हालांकि, प्राधिकरण के अधिकारियों का पक्ष और तकनीकी कारण सामने आना भी जरूरी है।

लेकिन इतना तो स्पष्ट है कि ‘सिस्टम नहीं है’ कहकर जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता। यदि सिस्टम में समस्या है, तो उसे ठीक करना संबंधित विभाग और अधिकारियों की जिम्मेदारी है।

जनता को यह जानने का अधिकार है कि सुविधा के लिए बनाए गए काउंटरों का इस्तेमाल क्यों नहीं हो रहा है और इस समस्या का समाधान कब तक किया जाएगा।

क्या हो सकता है समाधान?

नोएडा प्राधिकरण के उच्च अधिकारियों को इस मामले में तत्काल संज्ञान लेना चाहिए। कुछ सामान्य कदम उठाकर इस परेशानी को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

1. चारों काउंटर चालू किए जाएं: प्रवेश पास बनाने के लिए उपलब्ध सभी चार काउंटरों पर कंप्यूटर, इंटरनेट और आवश्यक तकनीकी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं।

2. पर्याप्त स्टाफ की तैनाती हो: सभी काउंटरों पर कर्मचारियों की नियमित ड्यूटी लगाई जाए, ताकि किसी एक काउंटर पर अनावश्यक भीड़ न हो।

3. बुजुर्गों के लिए प्राथमिकता: वरिष्ठ नागरिकों, दिव्यांगजनों और चलने-फिरने में असमर्थ लोगों के लिए अलग काउंटर या प्राथमिकता वाली व्यवस्था बनाई जाए।

4. जनसुनवाई के समय का ध्यान रखा जाए: प्रवेश पास बनाने की प्रक्रिया ऐसी हो कि लोगों को अधिकारियों तक पहुंचने से पहले ही जनसुनवाई का समय समाप्त होने की नौबत न आए।

5. ऑनलाइन पास की सुविधा पर विचार: सुरक्षा नियमों का पालन करते हुए ऑनलाइन पंजीकरण या पूर्व-पंजीकरण की सुविधा शुरू की जा सकती है, जिससे स्वागत कक्ष पर भीड़ कम हो।

6. जवाबदेही तय हो: यदि तकनीकी खराबी के कारण काउंटर बंद हैं, तो संबंधित विभाग को उनकी मरम्मत और व्यवस्था बहाल करने के लिए समयसीमा तय करनी चाहिए।

अब अधिकारियों से सीधे सवाल!

ग्राम विकास संगठन, नोएडा के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी अशोक चौहान द्वारा उठाया गया यह मुद्दा केवल एक व्यक्ति की परेशानी नहीं, बल्कि उन तमाम नागरिकों की समस्या को सामने लाता है, जो अपनी शिकायतों और समस्याओं के समाधान की उम्मीद लेकर नोएडा प्राधिकरण पहुंचते हैं।

इस मामले में नोएडा प्राधिकरण के उच्च अधिकारियों से कुछ सीधे सवाल हैं:

  • जब प्रवेश पास बनाने के लिए चार काउंटर बनाए गए हैं, तो चारों पर काम क्यों नहीं हो रहा?

  • बाकी दो काउंटरों पर सिस्टम उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी किस विभाग की है?

  • क्या अधिकारियों को स्वागत कक्ष में लगने वाली लंबी कतारों की जानकारी है?

  • बुजुर्ग महिलाओं और पुरुषों के लिए प्राथमिकता की व्यवस्था क्यों नहीं है?

  • क्या आम जनता के कीमती समय की कोई प्रशासनिक अहमियत नहीं है?

  • क्या प्राधिकरण यह सुनिश्चित करेगा कि लोगों को जनसुनवाई में शामिल होने के लिए समय पर प्रवेश मिल सके?

पर्दे के पीछे की कहानी: शहर स्मार्ट, लेकिन नागरिकों का इंतजार कब खत्म होगा?

नोएडा को आधुनिक सुविधाओं वाला शहर बनाने के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं। सड़कों, भवनों, पार्कों और अन्य बुनियादी सुविधाओं के विकास की योजनाएं बनाई जाती हैं। लेकिन किसी भी शहर की असली पहचान केवल उसकी ऊंची इमारतों और चौड़ी सड़कों से नहीं होती, बल्कि इस बात से होती है कि वहां आम नागरिक के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है।

प्रशासन की असली परीक्षा तब होती है, जब कोई बुजुर्ग अपनी शिकायत लेकर कार्यालय पहुंचता है, जब कोई महिला अपनी समस्या बताने के लिए घंटों इंतजार करती है और जब कोई आम नागरिक अपना कीमती समय निकालकर अधिकारियों तक पहुंचने की कोशिश करता है।

यदि उसे प्रवेश पास के लिए ही घंटों लाइन में खड़ा रहना पड़े, तो विकास और जनसुविधाओं के दावों पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

नोएडा प्राधिकरण के अधिकारियों को यह समझना होगा कि स्वागत कक्ष किसी भी सरकारी कार्यालय का पहला चेहरा होता है। यहां आने वाले नागरिक को सबसे पहले सुविधा, सहयोग और सम्मान मिलना चाहिए, न कि लंबी कतारों और तकनीकी अव्यवस्था का सामना करना पड़े।

अब देखना यह है कि प्राधिकरण के उच्च अधिकारी इस समस्या को गंभीरता से लेते हैं या फिर बुजुर्गों और आम जनता को इसी तरह घंटों कतारों में खड़े होकर अपनी बारी का इंतजार करना पड़ेगा।

क्योंकि जनता अधिकारियों के दरवाजे तक अपनी समस्या लेकर पहुंचती है, न कि अपना कीमती दिन प्रवेश पास बनवाने में गंवाने के लिए!

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VIKAS TRIPATHI
VIKAS TRIPATHIhttp://www.pardaphaas.com
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