12 अक्टूबर से जारी आंदोलन अब छात्रसंघ चुनाव की बहाली तक सीमित नहीं दिखता। एक तरफ छात्र लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व और जवाबदेही की मांग पर अड़े हैं, तो दूसरी तरफ विश्वविद्यालय प्रशासन अनुशासन, शैक्षणिक व्यवस्था और परिसर की सुरक्षा का हवाला दे रहा है। सवाल यह है कि इस टकराव का समाधान बातचीत से निकलेगा या नोटिस, निलंबन और सुरक्षा बंदोबस्त के बीच छात्रों और प्रशासन के बीच की खाई और चौड़ी होगी?
नई दिल्ली। विश्वविद्यालयों में लोकतंत्र की परीक्षा अक्सर कक्षाओं में नहीं, बल्कि उन गलियारों में होती है जहां छात्रों की आवाज सत्ता के कानों तक पहुंचने की कोशिश करती है। जामिया मिलिया इस्लामिया में छात्रसंघ चुनाव बहाल करने और दूसरी मांगों को लेकर जारी आंदोलन अब इसी परीक्षा के कठिन दौर से गुजर रहा है। 12 अक्टूबर से शुरू हुआ प्रदर्शन और भूख हड़ताल थमने का नाम नहीं ले रहे। विश्वविद्यालय प्रशासन और प्रदर्शनकारी छात्रों के बीच भरोसे की दीवार लगातार ऊंची होती दिखाई दे रही है।
इस विवाद की कहानी केवल छात्रसंघ चुनाव की बहाली की मांग, कुछ नोटिसों या कैंपस में हुई कथित तोड़फोड़ तक सीमित नहीं है। इसके पीछे छात्र प्रतिनिधित्व, प्रशासनिक अधिकार, अनुशासन की परिभाषा और विश्वविद्यालय में असहमति की जगह को लेकर उठते सवाल भी हैं। जब छात्रों को लगता है कि उनकी आवाज सुनी नहीं जा रही और प्रशासन को लगता है कि उसकी व्यवस्था को चुनौती दी जा रही है, तब विवाद का केंद्र मांगों से खिसककर अधिकार और नियंत्रण की लड़ाई बन जाता है।
जामिया में फिलहाल यही होता दिखाई दे रहा है। हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम को किसी एक पक्ष की कहानी मान लेना जल्दबाजी होगी। छात्रों के आरोपों की जांच जरूरी है, तो प्रशासन की ओर से लगाए गए आरोपों की निष्पक्ष पुष्टि भी उतनी ही आवश्यक है।
हथौड़ों वाला वीडियो और आंदोलन पर उठते सवाल
विवाद ने उस समय नया मोड़ लिया, जब विश्वविद्यालय प्रशासन ने आरोप लगाया कि प्रदर्शनकारियों ने देर रात परिसर के भीतर सुरक्षा गार्ड रूम के शीशे तोड़े और गेट नंबर चार के पास दीवार तथा लोहे के दरवाजे को हथौड़े से नुकसान पहुंचाया।
इस घटना से जुड़ा एक वीडियो सामने आने की बात भी कही गई है। उसमें चेहरे पर कपड़ा बांधे कुछ लोग हथौड़ों से लोहे की ग्रिल तोड़ते दिखाई देते हैं। वीडियो के आधार पर घटना की परिस्थितियों, उसमें शामिल लोगों और उनकी पहचान के बारे में अंतिम निष्कर्ष निकालने से पहले स्वतंत्र जांच जरूरी है। केवल दृश्य सामने आने से यह अपने आप साबित नहीं हो जाता कि उसमें दिख रहे सभी लोग प्रदर्शनकारी छात्र ही हैं या घटना के पीछे क्या परिस्थितियां थीं।
फिर भी, यदि सार्वजनिक संपत्ति या विश्वविद्यालय की सुरक्षा व्यवस्था को जानबूझकर नुकसान पहुंचाया गया है, तो उसे किसी भी आंदोलन के नाम पर जायज नहीं ठहराया जा सकता। लोकतांत्रिक विरोध का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन उस अधिकार के साथ शांतिपूर्ण आचरण की जिम्मेदारी भी जुड़ी है।
यहां एक असहज सवाल भी है। क्या किसी आंदोलन में उठी एक हिंसक घटना उसकी तमाम मांगों को संदिग्ध बना देती है? और क्या किसी आंदोलन की जायज मांगें होने से उसमें हुई संभावित हिंसा को नजरअंदाज किया जा सकता है? दोनों सवालों का जवाब एक ही है—नहीं।
छात्रसंघ चुनाव की बहाली की मांग पर अलग से चर्चा होनी चाहिए और तोड़फोड़















