“सेक्टर-105 के आरडब्ल्यूए अध्यक्ष दिव्य कृष्णात्रेय ने उठाई जल संकट के स्थायी समाधान की मांग; प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से जवाबदेही तय करने की अपील, कहा—विकास का असली पैमाना नागरिकों को मिलने वाली बुनियादी सुविधाएं हैं”
नोएडा, 24 अक्टूबर 2026। नोएडा की पहचान आधुनिक इमारतों, चौड़ी सड़कों, विकसित आवासीय क्षेत्रों और तेजी से बढ़ते शहरी बुनियादी ढांचे से होती है। शहर की विकास यात्रा को उत्तर प्रदेश की आर्थिक प्रगति के प्रमुख प्रतीकों में गिना जाता है। लेकिन इस चमकदार तस्वीर के बीच एक बुनियादी सवाल अपनी पूरी गंभीरता के साथ खड़ा है—क्या आधुनिक शहर के हर नागरिक को पर्याप्त और सुरक्षित पेयजल उपलब्ध है? यदि नहीं, तो विकास की इस उपलब्धि का लाभ आखिर आम परिवार तक किस हद तक पहुंच रहा है?
सेक्टर-105 रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन (आरडब्ल्यूए) के अध्यक्ष दिव्य कृष्णात्रेय ने नोएडा में पेयजल की उपलब्धता और गुणवत्ता को लेकर प्रशासन तथा जनप्रतिनिधियों से स्थायी समाधान की मांग की है। उनका कहना है कि किसी भी शहर की वास्तविक प्रगति का मूल्यांकन केवल उसकी इमारतों, सड़कों और निवेश से नहीं किया जा सकता। विकास तभी सार्थक है, जब आम नागरिक को स्वच्छ पानी, बेहतर स्वास्थ्य और सम्मानजनक जीवन जैसी बुनियादी सुविधाएं सहजता से उपलब्ध हों।
कृष्णात्रेय की अपील केवल पानी की कमी का मुद्दा उठाने तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में शहरी विकास की प्राथमिकताओं, नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता और संबंधित संस्थाओं की जवाबदेही से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल हैं। उनका स्पष्ट संदेश है कि नोएडा को विकास के नए प्रतिमान स्थापित करने हैं, तो पेयजल जैसी बुनियादी जरूरत को किसी भी स्थिति में पीछे नहीं छोड़ा जा सकता।
विकास की ऊंचाई और बुनियादी सुविधाओं की चुनौती
नोएडा ने बीते वर्षों में शहरीकरण, आवास, वाणिज्यिक गतिविधियों और आधारभूत ढांचे के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई है। शहर की आधुनिक संरचना उसकी आर्थिक संभावनाओं और विकास की महत्वाकांक्षा को दर्शाती है। लेकिन किसी भी विकसित शहर की असली परीक्षा तब होती है, जब उसकी बुनियादी सेवाएं प्रत्येक नागरिक की जरूरतों के अनुरूप काम करती हैं।
पेयजल इसी परीक्षा का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। घर में पानी की नियमित उपलब्धता केवल सुविधा नहीं, बल्कि दैनिक जीवन की अनिवार्य आवश्यकता है। खाना बनाने, साफ-सफाई, बच्चों की देखभाल, बुजुर्गों की जरूरतों और व्यक्तिगत स्वच्छता से लेकर स्वास्थ्य की सुरक्षा तक, प्रत्येक स्तर पर पानी की भूमिका निर्णायक है।
ऐसे में जहां पेयजल की उपलब्धता प्रभावित होती है या उसकी गुणवत्ता को लेकर सवाल उठते हैं, वहां समस्या का असर सीधे परिवारों के जीवन पर पड़ता है। नागरिकों को यह भरोसा होना चाहिए कि उनके घरों तक पहुंचने वाला पानी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है और निर्धारित गुणवत्ता मानकों के अनुरूप है।
दिव्य कृष्णात्रेय ने इसी संदर्भ में सवाल उठाया है कि जिस शहर ने आधुनिकता और विकास के क्षेत्र में इतनी प्रगति की है, वहां पेयजल जैसी मूलभूत जरूरत को लेकर नागरिकों की चिंताओं का स्थायी समाधान सुनिश्चित करना सर्वोच्च प्राथमिकताओं में क्यों नहीं होना चाहिए?
पानी केवल सुविधा नहीं, नागरिकों के स्वास्थ्य और सम्मान का सवाल
जल संकट का सबसे गंभीर पहलू यह है कि इसका प्रभाव किसी एक आयु वर्ग या परिवार तक सीमित नहीं रहता। पानी की अनियमित उपलब्धता से घरेलू दिनचर्या प्रभावित होती है, जबकि उसकी गुणवत्ता को लेकर अनिश्चितता नागरिकों की चिंता बढ़ा सकती है। बच्चों और बुजुर्गों सहित उन लोगों के लिए सुरक्षित पेयजल विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जिन्हें स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों से बचाने के लिए अतिरिक्त सावधानी की आवश्यकता होती है।
कृष्णात्रेय का कहना है कि पानी को केवल एक प्रशासनिक सेवा या तकनीकी व्यवस्था के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह नागरिकों के स्वास्थ्य, गरिमा और जीवन की बुनियादी जरूरतों से जुड़ा विषय है। इसलिए इसकी उपलब्धता और गुणवत्ता सुनिश्चित करना किसी अतिरिक्त सुविधा की मांग नहीं, बल्कि शहरी प्रशासन की मूल जिम्मेदारियों में शामिल होना चाहिए।
यदि किसी क्षेत्र में जलापूर्ति अनियमित है, पर्याप्त नहीं है या पानी की गुणवत्ता पर संदेह व्यक्त किया जा रहा है, तो उसका समाधान केवल आश्वासन देने से नहीं होगा। ऐसी परिस्थितियों में संबंधित विभागों को वास्तविक स्थिति का आकलन करना, आवश्यक जांच कराना, समस्याग्रस्त स्थानों की पहचान करना और सुधार के लिए समयबद्ध कार्रवाई करना जरूरी है।
यह भी आवश्यक है कि नागरिकों को जलापूर्ति से संबंधित शिकायतों के निस्तारण की स्पष्ट प्रक्रिया मिले। शिकायत दर्ज होने के बाद उसकी स्थिति क्या है, जांच कब होगी और समस्या के समाधान के लिए क्या कदम उठाए गए हैं—इन सवालों का जवाब पारदर्शी व्यवस्था के माध्यम से उपलब्ध होना चाहिए।
प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के सामने जवाबदेही की कसौटी
दिव्य कृष्णात्रेय ने अपनी अपील में प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के प्रति विश्वास जताते हुए उनसे इस मुद्दे को गंभीरता से लेने का आग्रह किया है। उनका मानना है कि जिस प्रशासनिक क्षमता और संस्थागत प्रयासों से नोएडा ने विकास के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई है, उसी क्षमता का उपयोग पेयजल संबंधी समस्याओं के स्थायी समाधान के लिए भी किया जाना चाहिए।
हालांकि, जनविश्वास केवल विकास की उपलब्धियों से कायम नहीं रहता। वह तब मजबूत होता है, जब नागरिकों की रोजमर्रा की समस्याओं पर समय रहते ध्यान दिया जाए और उनके समाधान के ठोस परिणाम दिखाई दें।
पेयजल के मामले में प्रशासनिक जवाबदेही का अर्थ है कि संबंधित अधिकारी उपलब्ध संसाधनों, आपूर्ति व्यवस्था, वितरण नेटवर्क और गुणवत्ता संबंधी चुनौतियों का वास्तविक आकलन करें। जिन क्षेत्रों में समस्या की पुष्टि हो, वहां प्राथमिकता के आधार पर कार्रवाई की जाए। साथ ही, नागरिकों को यह जानकारी भी मिले कि समस्या की प्रकृति क्या है और उसे दूर करने के लिए कौन-से कदम उठाए जा रहे हैं।
यह मांग किसी व्यक्ति या संस्था पर बिना प्रमाण आरोप लगाने की नहीं, बल्कि व्यवस्था को अधिक प्रभावी और उत्तरदायी बनाने की है। नागरिकों का सवाल सीधा है—यदि किसी इलाके में पानी की उपलब्धता या गुणवत्ता से संबंधित समस्या सामने आती है, तो उसके समाधान की जिम्मेदारी किस विभाग की होगी, कार्रवाई की समयसीमा क्या होगी और उसकी निगरानी कैसे की जाएगी?
इन सवालों पर स्पष्टता प्रशासन और जनता के बीच विश्वास को मजबूत कर सकती है।
तात्कालिक राहत के साथ दीर्घकालिक योजना भी जरूरी
जल संकट का स्थायी समाधान केवल आपातकालीन उपायों से संभव नहीं है। इसके लिए ऐसी योजना आवश्यक है, जो वर्तमान जरूरतों को पूरा करने के साथ भविष्य में बढ़ती आबादी और शहरी विस्तार के दबाव का भी सामना कर सके।
आरडब्ल्यूए अध्यक्ष की मांग के अनुरूप प्रशासन को प्रभावित क्षेत्रों की पहचान कर पेयजल आपूर्ति की स्थिति की समीक्षा करनी चाहिए। जहां आवश्यक हो, वहां आपूर्ति व्यवस्था में सुधार, वितरण नेटवर्क की तकनीकी जांच और पानी की गुणवत्ता का परीक्षण कराया जाना चाहिए। गुणवत्ता संबंधी किसी समस्या की पुष्टि होने पर उसके कारणों का पता लगाकर सुधारात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए।
इसके साथ ही, नागरिकों की शिकायतों के निस्तारण के लिए प्रभावी तंत्र विकसित करना जरूरी है। शिकायत दर्ज कराने का सरल माध्यम, जिम्मेदार विभाग की स्पष्ट जानकारी, कार्रवाई की समयसीमा और निस्तारण की स्थिति से संबंधित सूचना इस व्यवस्था को अधिक भरोसेमंद बना सकती है।
दीर्घकालिक स्तर पर जलापूर्ति के बुनियादी ढांचे की क्षमता, वितरण में संभावित असमानताओं, रखरखाव की जरूरतों और भविष्य की मांग का आकलन किया जाना चाहिए। संबंधित तकनीकी एवं प्रशासनिक विशेषज्ञों की सहायता से ऐसी कार्ययोजना तैयार की जा सकती है, जिसमें जिम्मेदारियां, प्राथमिकताएं और प्रगति की समीक्षा की प्रक्रिया स्पष्ट हो।
इस दिशा में पारदर्शिता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। नागरिकों को केवल योजनाओं की घोषणा नहीं, बल्कि उनके क्रियान्वयन और परिणामों की जानकारी भी मिलनी चाहिए। इससे समस्याओं की पहचान समय पर होगी और प्रशासनिक प्रयासों की प्रभावशीलता का आकलन करना आसान होगा।
यह विरोध नहीं, व्यवस्था को बेहतर बनाने की अपील है
दिव्य कृष्णात्रेय ने स्पष्ट किया है कि उनकी अपील को केवल शिकायत या विरोध के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह शहर की व्यवस्था पर विश्वास जताते हुए उसे और बेहतर बनाने का आग्रह है।
उनका दृष्टिकोण है कि प्रशासनिक अधिकारी और जनप्रतिनिधि केवल सरकारी व्यवस्था के प्रतिनिधि नहीं, बल्कि नागरिकों की समस्याओं के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले उत्तरदायी पक्ष हैं। जब किसी क्षेत्र के निवासी पेयजल जैसी आवश्यक सुविधा को लेकर चिंता व्यक्त करते हैं, तो उस चिंता को प्राथमिकता से सुनना और तथ्यों के आधार पर कार्रवाई करना आवश्यक है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों द्वारा बुनियादी सुविधाओं पर सवाल उठाना स्वाभाविक और जरूरी है। ऐसे सवालों का उद्देश्य किसी संस्था की छवि को नुकसान पहुंचाना नहीं, बल्कि सार्वजनिक सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार सुनिश्चित करना होना चाहिए।
इसी भावना के साथ सेक्टर-105 आरडब्ल्यूए ने प्रशासन से आग्रह किया है कि पेयजल की उपलब्धता और गुणवत्ता को सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल किया जाए। प्रभावित क्षेत्रों को तत्काल राहत देने के साथ ऐसी दीर्घकालिक व्यवस्था विकसित की जाए, जिससे भविष्य में नागरिकों को इसी प्रकार की समस्याओं का सामना न करना पड़े।
अब जरूरत ठोस कदमों और समयबद्ध कार्रवाई की
नोएडा के विकास की चर्चा तब और सार्थक होगी, जब आधुनिक बुनियादी ढांचे के साथ नागरिकों की रोजमर्रा की आवश्यकताओं को भी समान महत्व मिले। शहर की प्रगति का लाभ प्रत्येक परिवार तक पहुंचना चाहिए और किसी भी बुनियादी सेवा की समस्या को केवल स्थानीय असुविधा मानकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
दिव्य कृष्णात्रेय की अपील प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के सामने इसी प्राथमिकता को रेखांकित करती है। अब महत्वपूर्ण यह होगा कि संबंधित विभाग इस मांग पर तथ्यों के आधार पर समीक्षा करें, प्रभावित क्षेत्रों की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करें और आवश्यक सुधार के लिए ठोस कदम उठाएं।
पेयजल के मुद्दे पर सफलता का पैमाना घोषणाओं या आश्वासनों की संख्या नहीं, बल्कि नागरिकों के अनुभव में आने वाला वास्तविक सुधार होना चाहिए। नियमित आपूर्ति, निर्धारित मानकों के अनुरूप गुणवत्ता, शिकायतों का समयबद्ध निस्तारण और भविष्य की जरूरतों के अनुरूप मजबूत व्यवस्था—ये वे परिणाम हैं, जिनसे किसी भी योजना की सफलता तय होगी।
नोएडा के सामने चुनौती केवल एक विकसित शहर बने रहने की नहीं, बल्कि ऐसा शहर बनने की है जहां विकास की चमक हर घर की बुनियादी जरूरतों तक पहुंचे। यदि आधुनिक सड़कों और ऊंची इमारतों के साथ सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता भी सुनिश्चित होती है, तभी शहरी विकास का लाभ अधिक व्यापक और सार्थक होगा।
संदेश स्पष्ट है—विकास का गौरव तभी संपूर्ण है, जब हर घर तक पर्याप्त और शुद्ध पेयजल पहुंचे। अब अपेक्षा है कि प्रशासन और जनप्रतिनिधि इस जनहित के मुद्दे को प्राथमिकता देते हुए तात्कालिक राहत, पारदर्शी निगरानी और स्थायी समाधान की दिशा में प्रभावी कदम उठाएं।















