बर्लिन ग्लोबल डायलॉग 2026 में विकसित देशों की जलवायु संबंधी जिम्मेदारियों का मुद्दा उठाया, CBAM और वन कटाई से जुड़े नियमों पर जताई आपत्ति
नई दिल्ली/बर्लिन: केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने बर्लिन ग्लोबल डायलॉग 2026 के दौरान जलवायु परिवर्तन, वित्तीय सहायता और अंतरराष्ट्रीय व्यापार नीतियों को लेकर यूरोपीय संघ (EU) के रुख पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए विकसित देशों को विकासशील देशों से किए गए वित्तीय सहायता के वादों को पूरा करना चाहिए।
गोयल ने विशेष रूप से सालाना 100 अरब डॉलर की जलवायु वित्त सहायता की प्रतिबद्धता का उल्लेख करते हुए कहा कि विकासशील देशों को अपने उत्सर्जन में कटौती करने और स्वच्छ तकनीकों को अपनाने के लिए पर्याप्त सहयोग मिलना जरूरी है। उनके अनुसार, जलवायु परिवर्तन से निपटने की जिम्मेदारी साझा है, लेकिन सभी देशों की ऐतिहासिक जिम्मेदारियां और आर्थिक क्षमताएं समान नहीं हैं।
100 अरब डॉलर की प्रतिबद्धता पर उठाए सवाल
पीयूष गोयल ने 2015 के पेरिस जलवायु समझौते का संदर्भ देते हुए विकसित देशों की भूमिका पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए विकासशील देशों को वित्तीय और तकनीकी सहायता देने की प्रतिबद्धताएं की गई थीं, लेकिन इन देशों की जरूरतों को पूरा करने के लिए और प्रभावी प्रयास किए जाने चाहिए।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि जलवायु लक्ष्यों को हासिल करने के लिए केवल प्रतिबद्धताएं पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि उनके अनुरूप वित्तीय संसाधन और व्यावहारिक सहयोग भी जरूरी है।
CBAM को लेकर भारत की चिंता
गोयल ने यूरोपीय संघ के कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) पर भी आपत्ति जताई। इस व्यवस्था का उद्देश्य कुछ आयातित वस्तुओं के उत्पादन से जुड़े कार्बन उत्सर्जन की लागत को यूरोपीय उत्पादों पर लागू जलवायु संबंधी लागतों के अनुरूप लाना है।
भारत की चिंता है कि ऐसी व्यवस्था से भारतीय इस्पात, एल्युमीनियम और अन्य प्रभावित उद्योगों की लागत बढ़ सकती है। इससे निर्यात प्रतिस्पर्धा और विकासशील देशों के औद्योगिक विकास पर असर पड़ने की आशंका है।
गोयल ने यूरोपीय संघ के वनों की कटाई से जुड़े नियमों (EUDR) को लेकर भी सवाल उठाए। भारत का तर्क है कि पर्यावरण संरक्षण के उपाय इस तरह लागू होने चाहिए कि विकासशील देशों के उत्पादकों और निर्यातकों पर असमान बोझ न पड़े।
भारत के उत्सर्जन और ऐतिहासिक जिम्मेदारी का मुद्दा
गोयल ने भारत की बड़ी आबादी और वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में उसके हिस्से का उल्लेख करते हुए विकसित देशों की ऐतिहासिक भूमिका पर ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि जलवायु नीतियां बनाते समय देशों की आबादी, विकास की जरूरतों और उत्सर्जन के ऐतिहासिक योगदान को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
भारत लगातार यह पक्ष रखता आया है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के प्रयासों में समानता और साझा, लेकिन अलग-अलग जिम्मेदारियों के सिद्धांत का सम्मान होना चाहिए।
जलवायु संरक्षण और व्यापार के बीच संतुलन जरूरी
यूरोपीय संघ का कहना है कि CBAM जैसी नीतियां कार्बन उत्सर्जन को कम करने और कार्बन-गहन उत्पादन को हतोत्साहित करने के उद्देश्य से बनाई गई हैं। वहीं, भारत सहित कई विकासशील देशों को चिंता है कि इन उपायों से व्यापार पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
इस मुद्दे पर भारत और यूरोपीय संघ के बीच संवाद महत्वपूर्ण है, क्योंकि दोनों पक्ष जलवायु परिवर्तन से निपटने के साथ-साथ आर्थिक विकास और अंतरराष्ट्रीय व्यापार को भी आगे बढ़ाना चाहते हैं।
बर्लिन में पीयूष गोयल की टिप्पणियों ने जलवायु वित्त, ऐतिहासिक जिम्मेदारी और पर्यावरण आधारित व्यापार नियमों को लेकर विकसित और विकासशील देशों के बीच मौजूद मतभेदों को फिर सामने ला दिया है। आने वाले समय में इन मुद्दों पर सहमति बनाना वैश्विक जलवायु सहयोग और निष्पक्ष व्यापार, दोनों के लिए अहम होगा।















