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मणिपुर के पहाड़ों में फिर बारूद की गूंज: हिंसा में 9 मौतों से दहला राज्य, गांवों में आगजनी और गोलियों का खौफ

“कामजोंग, उखरुल और कांगपोकपी में बिगड़े हालात; पांच बच्चों की मां की हत्या से भड़की हिंसा, अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात। मुख्यमंत्री की शांति की अपील, प्रशासन के सामने निर्दोष नागरिकों की जान बचाने और कानून-व्यवस्था बहाल करने की बड़ी चुनौती।”

मणिपुर | 11 अक्टूबर 2026

मणिपुर के पहाड़ी जिलों में एक बार फिर गोलियों की गूंज, आगजनी और नागरिकों की मौत ने शांति की उम्मीदों को गंभीर झटका दिया है। हिंसा प्रभावित कामजोंग, उखरुल और कांगपोकपी जिलों में हालात तनावपूर्ण बने हुए हैं। शुक्रवार और शनिवार को हुई हिंसक घटनाओं के बाद मृतकों की कुल संख्या नौ तक पहुंचने की जानकारी सामने आई है। एक ओर गांवों में दहशत का माहौल है, तो दूसरी ओर प्रशासन के सामने हिंसा के फैलाव को रोकने, संवेदनशील इलाकों में सुरक्षा सुनिश्चित करने और आम नागरिकों का भरोसा बहाल करने की चुनौती खड़ी है।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि हिंसा की चपेट में महिलाएं, ग्रामीण और स्थानीय स्तर पर सुरक्षा में सहयोग करने वाले लोग भी आए हैं। पांच बच्चों की मां की कथित हत्या से शुरू हुआ तनाव अलग-अलग इलाकों में सशस्त्र झड़पों, गोलीबारी और मकानों में आगजनी की घटनाओं तक पहुंच गया। हालांकि, प्रत्येक घटना की परिस्थितियों, हमलावरों की पहचान और अलग-अलग पक्षों की भूमिका की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है। ऐसे संवेदनशील माहौल में किसी समुदाय पर सामूहिक आरोप लगाने के बजाय जिम्मेदार व्यक्तियों की पहचान कर उनके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई करना बेहद जरूरी है।

राज्य के मुख्यमंत्री वाई. खेमचंद सिंह ने नागरिकों की हत्या और हिंसा की निंदा करते हुए अधिकारियों को हालात नियंत्रित करने, शांति बहाल करने और सभी नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए तत्काल प्रभावी कदम उठाने के निर्देश दिए हैं। मुख्यमंत्री ने सभी समुदायों से संयम बरतने, संवाद को प्राथमिकता देने और सद्भाव बनाए रखने की अपील की है। लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या प्रशासन हिंसा की इस नई लहर को सीमित कर पाएगा और उन गांवों में सुरक्षा का भरोसा लौटा सकेगा, जहां लोग लगातार हमलों की आशंका के बीच जीने को मजबूर हैं?

तीन पहाड़ी जिलों में तनाव, सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ी

हिंसा की ताजा घटनाओं का केंद्र कामजोंग, उखरुल और कांगपोकपी जिले रहे हैं। अधिकारियों के अनुसार, सबसे अधिक प्रभावित इलाकों में अतिरिक्त सुरक्षा बल भेजे गए हैं। संवेदनशील गांवों और संपर्क मार्गों पर निगरानी बढ़ाई गई है, ताकि किसी नई हिंसक घटना को रोका जा सके और हालात को नियंत्रण से बाहर जाने से बचाया जा सके।

कामजोंग जिला प्रशासन ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 163 के तहत निषेधाज्ञा लागू की है। हिंसा प्रभावित क्षेत्रों में आवाजाही और लोगों के एकत्र होने पर प्रतिबंधों का उद्देश्य संभावित टकराव रोकना है। चसाद गांव में भी एहतियाती प्रतिबंध लगाए जाने की जानकारी सामने आई है।

हालांकि, केवल निषेधाज्ञा और अतिरिक्त बलों की तैनाती से स्थायी शांति सुनिश्चित नहीं होगी। प्रशासन को यह भी देखना होगा कि गांवों में किसी नए हमले की आशंका को समय रहते पहचाना जाए, प्रभावित परिवारों तक सहायता पहुंचे और निर्दोष लोगों को हिंसा से बचाने के लिए सुरक्षा व्यवस्था जमीन पर प्रभावी ढंग से काम करे। कार्रवाई निष्पक्ष हो और कानून का पालन सभी पक्षों पर समान रूप से लागू हो—यही स्थिति को संभालने की सबसे महत्वपूर्ण कसौटी है।

पांच बच्चों की मां की हत्या के बाद भड़का तनाव

हिंसा की सबसे गंभीर घटनाओं में से एक शुक्रवार रात कामजोंग जिले के चसाद गांव में हुई। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, 22 वर्षीय एक महिला, जो पांच बच्चों की मां थी, को अज्ञात हमलावरों ने गोली मार दी, जिससे उसकी मौत हो गई। यह गांव कुकी बहुल क्षेत्र में स्थित है, जबकि कामजोंग जिले में नगा समुदाय की भी बड़ी आबादी रहती है।

महिला की हत्या के बाद कुकी और नगा सशस्त्र समूहों के बीच गोलीबारी शुरू होने की खबर है, जो शनिवार सुबह तक जारी रही। इस झड़प में 42 वर्षीय एक व्यक्ति की मौत होने और करीब 10 मकानों में आग लगाए जाने की जानकारी सामने आई है। घटना के बाद गांव में तनाव बढ़ गया और हिंसा की आगे की घटनाओं को रोकने के लिए प्रतिबंधात्मक कदम उठाए गए।

एक महिला की हत्या केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं है; यह उन पांच बच्चों के भविष्य पर भी गहरा सवाल खड़ा करती है, जिन्होंने अपनी मां खो दी। इस मामले में सबसे पहले जरूरी है कि हत्या की निष्पक्ष जांच हो, हमलावरों की पहचान की जाए और दोषियों को कानून के दायरे में लाया जाए। इसके साथ ही, इस घटना को किसी पूरे समुदाय के खिलाफ बदले की कार्रवाई का आधार बनने से रोकना भी प्रशासन की जिम्मेदारी है।

कांगपोकपी में हमलों की खबर, ग्राम रक्षकों समेत कई लोगों की मौत

शनिवार को कांगपोकपी जिले के तापन और मकुई गांवों में संदिग्ध उग्रवादियों के हमलों की सूचना सामने आई। अधिकारियों के मुताबिक, इन घटनाओं में नगा समुदाय के दो ग्राम रक्षक—एम. दैमाई और आर. गंगमेई—तथा रिंगकांगमाई नामक एक अन्य व्यक्ति की मौत हो गई।

इस बीच, नगा समुदाय के नागरिक संगठन वर्किंग कमेटी जेटीसी मणिपुर ने दावा किया कि 52 वर्षीय ग्रामीण अजिनबोउ आर. का सिर कलम कर दिया गया। संगठन ने उनके सम्मानजनक अंतिम संस्कार के लिए उनका कटा हुआ सिर लौटाने की मांग की है। यह दावा अत्यंत गंभीर है और इसकी स्वतंत्र पुष्टि तथा संबंधित तथ्यों की जांच आवश्यक है।

यदि इन आरोपों की पुष्टि होती है, तो यह घटना हिंसा की भयावहता को और स्पष्ट करेगी। किसी भी व्यक्ति के साथ इस तरह की क्रूरता की आशंका को हल्के में नहीं लिया जा सकता। प्रशासन को मामले की जांच कर साक्ष्य जुटाने, पीड़ित परिवार को सहायता देने और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करनी चाहिए।

भारत-म्यांमा सीमा के पास भी गोलीबारी, दो लोगों की मौत

कामजोंग जिले में भारत-म्यांमा सीमा के निकट स्थित तंगखुल नगा समुदाय की बस्ती निंगचौ गांव में भी शनिवार को संदिग्ध उग्रवादियों के घुसने और गोलीबारी करने की सूचना मिली। अधिकारियों के अनुसार, इस घटना में 35 वर्षीय नगाचांसो निंगशेन और 48 वर्षीय लेइशिशान लेइशादांग की मौत हो गई।

घटना के बाद सुरक्षा बल गांव पहुंचे। स्थानीय लोगों ने दावा किया कि गोलीबारी करने के बाद हमलावर म्यांमा की ओर भाग गए। हालांकि, हमलावरों की पहचान, उनके सीमा पार जाने और घटना से जुड़े अन्य पहलुओं की आधिकारिक जांच जरूरी है।

भारत-म्यांमा सीमा के निकट ऐसी घटनाएं सुरक्षा एजेंसियों के लिए अतिरिक्त चुनौती पैदा करती हैं। सीमावर्ती गांवों की भौगोलिक स्थिति, दुर्गम रास्ते और सीमापार आवाजाही की संभावनाएं जांच तथा निगरानी को कठिन बना सकती हैं। ऐसे में सीमा सुरक्षा, स्थानीय पुलिस और अन्य संबंधित एजेंसियों के बीच समन्वय बढ़ाना महत्वपूर्ण होगा। साथ ही, सीमावर्ती आबादी की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए कार्रवाई कानून के दायरे में रहनी चाहिए।

उखरुल में कार पर फायरिंग, चालक की मौत

उखरुल जिले में शनिवार को एक अन्य गंभीर घटना सामने आई। अधिकारियों के मुताबिक, संदिग्ध उग्रवादियों ने चेपू याओलेन गांव के पास एक कार पर गोलीबारी की। इस घटना में 40 वर्षीय संदीप राय की मौत हो गई। बताया गया कि जिस कार को वह चला रहे थे, उसी के भीतर उनकी जान चली गई।

इसके अतिरिक्त, कांगपोकपी जिले के मकुई अशांग और तापन क्षेत्रों में सशस्त्र समूहों के बीच भारी गोलीबारी की सूचना भी मिली। घटनाओं की व्यापकता इस बात की ओर संकेत करती है कि सुरक्षा एजेंसियों को केवल एक गांव या एक स्थान तक सीमित रहने के बजाय प्रभावित क्षेत्रों में समन्वित रणनीति अपनानी होगी।

फिलहाल, प्रत्येक घटना के लिए जिम्मेदार लोगों की पहचान और उनकी भूमिका की पुष्टि जांच के बाद ही की जानी चाहिए। अपुष्ट सूचनाओं के आधार पर किसी व्यक्ति या समुदाय को दोषी ठहराना तनाव को और बढ़ा सकता है।

मुख्यमंत्री की अपील के साथ प्रशासन की जवाबदेही भी अहम

मुख्यमंत्री वाई. खेमचंद सिंह ने सोशल मीडिया पर साझा संदेश में निर्दोष नागरिकों की हत्या और हिंसा की निंदा की है। उन्होंने अधिकारियों को शांति और कानून-व्यवस्था बहाल करने तथा सभी नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के निर्देश देने की बात कही है। साथ ही, सभी समुदायों से संयम और संवाद का रास्ता अपनाने की अपील की है।

ऐसे समय में राजनीतिक नेतृत्व का संदेश महत्वपूर्ण होता है, लेकिन जनता का भरोसा केवल अपीलों से नहीं लौटता। इसके लिए जमीन पर ठोस परिणाम दिखने चाहिए। संवेदनशील गांवों में प्रभावी सुरक्षा, निष्पक्ष जांच, गिरफ्तारियों और कानूनी कार्रवाई की पारदर्शी जानकारी, प्रभावित परिवारों को सहायता और अफवाहों पर नियंत्रण जैसे कदम जरूरी हैं।

प्रशासन को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि हिंसा से प्रभावित नागरिकों को चिकित्सा, भोजन, सुरक्षित आवागमन और जरूरत पड़ने पर अस्थायी आश्रय जैसी सुविधाएं उपलब्ध हों। किसी भी समुदाय के लोगों को केवल उनकी पहचान के आधार पर संदेह के घेरे में नहीं रखा जाना चाहिए। कानून का शासन तभी मजबूत होगा, जब पीड़ितों को न्याय और सभी नागरिकों को समान सुरक्षा मिलेगी।

फरवरी से जारी हिंसा ने बढ़ाई चिंता

उपलब्ध विवरण के अनुसार, इस वर्ष फरवरी से कुकी और नगा समुदायों के बीच जारी हिंसा में 40 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। कई मकानों को आग लगाए जाने की भी खबरें हैं। यह आंकड़ा राज्य के पहाड़ी क्षेत्रों में लगातार बने सुरक्षा संकट की गंभीरता को रेखांकित करता है।

मणिपुर पहले भी जातीय हिंसा की बड़ी त्रासदी झेल चुका है। इससे पहले इंफाल घाटी में रहने वाले मैतेई समुदाय और आसपास की पहाड़ियों में रहने वाले कुकी समुदाय के बीच संघर्ष में सैकड़ों लोगों की जान गई थी। उस हिंसा ने परिवारों को उजाड़ा, संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया और विभिन्न समुदायों के बीच विश्वास को गहरा आघात पहुंचाया।

ऐसे इतिहास के बाद हिंसा की कोई भी नई लहर केवल स्थानीय कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं रह जाती; वह राज्य में सामाजिक सद्भाव और स्थायी शांति के प्रयासों के सामने भी गंभीर चुनौती बन जाती है। इसलिए मौजूदा घटनाओं को रोकना, उनके पीछे के कारणों की निष्पक्ष जांच करना और जवाबदेही तय करना बेहद जरूरी है।

सबसे बड़ा सवाल: कब सुरक्षित होंगे पहाड़ी गांव?

मणिपुर के पहाड़ी जिलों में मौजूदा हालात कई बुनियादी सवाल खड़े करते हैं। क्या अतिरिक्त सुरक्षा बल संभावित हमलों को रोकने में सफल होंगे? क्या हत्या, गोलीबारी और आगजनी की घटनाओं में शामिल लोगों की पहचान कर उन्हें न्याय के कटघरे में लाया जाएगा? क्या प्रभावित परिवारों को सुरक्षा और सहायता मिलेगी? और सबसे अहम—क्या अलग-अलग समुदायों के बीच बढ़ते अविश्वास को रोकने के लिए ठोस संवाद की पहल होगी?

इन सवालों का जवाब केवल बयानबाजी से नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच, प्रभावी सुरक्षा और जवाबदेह प्रशासनिक कार्रवाई से मिलेगा। राज्य सरकार और सुरक्षा एजेंसियों के सामने तत्काल प्राथमिकता स्पष्ट है—हिंसा पर रोक, नागरिकों की जान की रक्षा और कानून का निष्पक्ष प्रवर्तन।

मणिपुर को इस समय उकसावे, प्रतिशोध और सामूहिक आरोपों की नहीं, बल्कि न्याय, संयम और भरोसा बहाल करने वाली कार्रवाई की जरूरत है। नौ मौतों की खबर केवल एक संख्या नहीं है; इसके पीछे उजड़े परिवार, भयभीत ग्रामीण और असुरक्षित भविष्य की चिंता है। शांति की अपील तभी सार्थक होगी, जब पहाड़ी गांवों में रहने वाले नागरिक बिना डर के अपने घरों में लौट सकें और उन्हें यह भरोसा हो कि उनकी सुरक्षा तथा न्याय सुनिश्चित करना शासन की सर्वोच्च प्राथमिकता है।

अब निर्णायक कसौटी यही है—क्या प्रशासन हिंसा की इस कड़ी को तोड़कर मणिपुर के पहाड़ी इलाकों में सुरक्षा और सामान्य जीवन बहाल कर पाएगा?

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VIKAS TRIPATHI
VIKAS TRIPATHIhttp://www.pardaphaas.com
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