2,500 किलोमीटर तक मार करने वाले ड्रोन और लंबी दूरी की मिसाइलें बनीं बड़ी चुनौती, ईरान से कथित हथियार कनेक्शन और लाल सागर के व्यापारिक रास्तों पर बढ़ता खतरा
पर्दाफाश न्यूज़ | अंतरराष्ट्रीय डेस्क
यमन के हूती विद्रोही एक बार फिर अपनी मिसाइल और ड्रोन क्षमता को लेकर अंतरराष्ट्रीय चर्चा में हैं। पारंपरिक वायुसेना की कमी के बावजूद लंबी दूरी के हमले करने की उनकी क्षमता ने सऊदी अरब सहित क्षेत्रीय देशों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। खास तौर पर सऊदी अरब के हवाई अड्डों और लाल सागर के आसपास समुद्री जहाजों पर हमलों के दावों ने चिंता बढ़ा दी है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर हूती विद्रोहियों के पास ऐसे कौन-से हथियार हैं, जिनकी मदद से वे अपने ठिकानों से सैकड़ों से हजारों किलोमीटर दूर तक हमला करने का दावा करते हैं? उनके हथियारों की आपूर्ति कहां से होती है और दुनिया की ताकतवर सेनाएं भी उनके खतरे को पूरी तरह खत्म क्यों नहीं कर पाई हैं?
मिसाइल और ड्रोन बने हूतियों की सबसे बड़ी ताकत
हूतियों की सैन्य रणनीति में बैलिस्टिक मिसाइलों, क्रूज मिसाइलों और विस्फोटक ड्रोन की अहम भूमिका है। बैलिस्टिक मिसाइलें ऊंचाई तक जाकर लक्ष्य की दिशा में आती हैं, जबकि क्रूज मिसाइलें अपेक्षाकृत कम ऊंचाई पर उड़ते हुए अपने लक्ष्य तक पहुंच सकती हैं। दूसरी ओर, विस्फोटक ड्रोन लक्ष्य से टकराकर विस्फोट कर सकते हैं।
रिपोर्ट में हूतियों के पास मौजूद कुछ प्रमुख हथियारों का उल्लेख किया गया है:
- तूफान मिसाइल: इसकी अनुमानित मारक दूरी लगभग 1,350 से 2,000 किलोमीटर बताई जाती है।
- फिलिस्तीन-2: हूतियों का दावा है कि यह 2,000 किलोमीटर से अधिक दूरी तक हमला कर सकती है। इसकी हाइपरसोनिक क्षमता की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है।
- बुरकान मिसाइल: इसके अलग-अलग संस्करणों की अनुमानित दूरी लगभग 800 से 1,200 किलोमीटर बताई जाती है।
- कुद्स-4 क्रूज मिसाइल: इसकी संभावित मारक दूरी करीब 2,000 किलोमीटर बताई गई है।
- समाद-3 ड्रोन: इसकी अनुमानित उड़ान दूरी लगभग 1,200 से 1,800 किलोमीटर बताई जाती है।
इन हथियारों की वास्तविक संख्या, परिचालन स्थिति और मारक क्षमता के सभी आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है। फिर भी, लंबी दूरी के ड्रोन और मिसाइलों का इस्तेमाल करने की हूतियों की क्षमता क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण चुनौती है।
बिना एयरफोर्स के कैसे करते हैं दूर तक हमला?
हूतियों की रणनीति की खास बात यह है कि उन्हें हर हमले के लिए लड़ाकू विमानों की जरूरत नहीं होती। लंबी दूरी के ड्रोन और मिसाइलों के जरिए वे दूर स्थित लक्ष्यों को निशाना बनाने का प्रयास कर सकते हैं।
ड्रोन अपेक्षाकृत कम लागत वाले हो सकते हैं, जबकि उन्हें रोकने के लिए रडार, इंटरसेप्टर मिसाइलों और अन्य वायु रक्षा प्रणालियों की जरूरत पड़ सकती है। इस वजह से हमलावर और रक्षक के बीच लागत का अंतर भी सुरक्षा एजेंसियों के सामने चुनौती बन सकता है।
हालांकि, हर ड्रोन या मिसाइल अपने लक्ष्य तक पहुंच जाए, ऐसा जरूरी नहीं है। उनकी सफलता मौसम, तकनीकी विश्वसनीयता, लक्ष्य की दूरी और विरोधी देश की रक्षा व्यवस्था पर निर्भर करती है।
हूतियों को हथियार कहां से मिलते हैं?
हूतियों ने वर्ष 2014 में यमन की राजधानी सना पर कब्जा करने के बाद देश के सैन्य संसाधनों के एक हिस्से पर नियंत्रण हासिल किया था। इन हथियारों और तकनीकी संसाधनों ने उनकी सैन्य क्षमता विकसित करने में भूमिका निभाई।
अमेरिका और सऊदी अरब लंबे समय से ईरान पर हूतियों को हथियार, तकनीक और प्रशिक्षण उपलब्ध कराने के आरोप लगाते रहे हैं। कई हथियारों के डिजाइन में ईरानी प्रणालियों से समानताएं भी बताई जाती हैं। हालांकि, किसी खास हथियार की उत्पत्ति और आपूर्ति की पूरी श्रृंखला का आकलन अलग-अलग साक्ष्यों के आधार पर करना जरूरी है। ईरान और हूती इन आरोपों से इनकार करते रहे हैं।
हूतियों की क्षमता केवल बाहरी सहायता पर निर्भर नहीं मानी जा सकती। स्थानीय हथियार भंडार, तकनीकी बदलाव और उपलब्ध संसाधनों का इस्तेमाल भी उनकी सैन्य गतिविधियों में महत्वपूर्ण रहे हैं।
अमेरिका और सऊदी अरब के लिए चुनौती क्यों?
हूतियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई करना इसलिए भी कठिन है क्योंकि यमन के कई हिस्सों में पहाड़ी भूभाग है और हथियारों के ठिकानों की पहचान करना आसान नहीं होता। सैन्य ठिकानों पर हमले करने के बावजूद विरोधी पक्ष की पूरी क्षमता समाप्त करना कठिन हो सकता है।
इसके अलावा, ड्रोन और मिसाइलों के अलग-अलग प्रकार के कारण वायु रक्षा प्रणालियों को कई तरह के खतरों से निपटना पड़ता है। यदि एक साथ कई हवाई लक्ष्य सामने आते हैं, तो उनकी पहचान, निगरानी और अवरोधन की प्रक्रिया और जटिल हो सकती है।
यही कारण है कि हूतियों की सैन्य क्षमता को केवल मिसाइलों की संख्या से नहीं, बल्कि उनके उत्पादन, आपूर्ति, संचालन और विरोधी की रक्षा प्रणाली के साथ होने वाले मुकाबले से भी समझना चाहिए।
लाल सागर पर संकट बढ़ा तो दुनिया पर क्या असर पड़ेगा?
हूतियों की गतिविधियों का सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय प्रभाव लाल सागर और बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य के आसपास दिखाई दे सकता है। यह समुद्री मार्ग लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ता है और स्वेज नहर के रास्ते यूरोप तथा एशिया के बीच व्यापार के लिए महत्वपूर्ण है।
यदि इस क्षेत्र में जहाजों पर हमले बढ़ते हैं, तो शिपिंग कंपनियां अपने जहाजों का मार्ग बदलने पर विचार कर सकती हैं। इससे यात्रा का समय बढ़ सकता है और ईंधन, बीमा तथा माल ढुलाई की लागत में इजाफा हो सकता है।
इसका असर वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला, ऊर्जा व्यापार और उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों तक पहुंच सकता है। हालांकि, वास्तविक आर्थिक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि हमलों की तीव्रता कितनी रहती है और समुद्री यातायात कितने समय तक प्रभावित होता है।
संघर्ष से वैश्विक व्यापार तक खतरा
हूती विद्रोहियों की मिसाइल और ड्रोन क्षमता ने यह स्पष्ट किया है कि आधुनिक संघर्षों में केवल पारंपरिक व















