Sunday, September 27, 2026
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गोरखपुर में पानी पर सियासत का उफान! सांसद रवि किशन और पार्षद विश्वजीत त्रिपाठी की बातचीत वायरल

“सड़क पर जलभराव, फोन पर तकरार—सांसद रवि किशन और पार्षद विश्वजीत त्रिपाठी की बातचीत वायरल; ‘सपा’ से ‘बसपा’ तक पहुंची बहस, जनता पूछ रही—पानी निकलेगा कब?”

पर्दाफाश न्यूज़: गोरखपुर;

गोरखपुर में बारिश ने जहां शहर की सड़कों और इलाकों को पानी से भर दिया, वहीं जलभराव को लेकर जनप्रतिनिधियों के बीच हुई कथित फोन बातचीत ने सियासी तापमान भी बढ़ा दिया है। सदर सांसद रवि किशन शुक्ला और बेतियाहाता के पार्षद विश्वजीत त्रिपाठी के बीच हुई बातचीत का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से प्रसारित हो रहा है। वीडियो में दोनों के बीच शहर में जलभराव और तरकुलानी से जलनिकासी को लेकर तीखी बातचीत सुनाई देती है। इसी बातचीत के दौरान सपा और बसपा को लेकर राजनीतिक तंज भी सुनाई देते हैं।

वीडियो में सुनाई दे रही बातचीत का सबसे चर्चित हिस्सा वह है, जहां जलभराव के सवाल से शुरू हुई बहस अचानक राजनीतिक कटाक्ष तक पहुंच जाती है। सांसद रवि किशन पार्षद से कहते सुनाई देते हैं—“समाजवादी पार्टी ज्वाइन कई लिहल का? सपा वाली बात कर रहे हो, सपा के नेता हो गइल का?”

जवाब में पार्षद विश्वजीत त्रिपाठी भी उसी अंदाज में पलटवार करते सुनाई देते हैं—“पानी अगर भर जाए तो आदमी सपा ज्वाइन कर लिया? आप क्या ज्वाइन कर लिए सांसद जी, बसपा ज्वाइन कर लिए आप?”

यानी सवाल पानी का था, लेकिन बातचीत राजनीति के तालाब में जा पहुंची।

जलभराव का सवाल, जवाब में सियासी छींटाकशी

वायरल वीडियो में सांसद रवि किशन की ओर से सभी जगह रेगुलेटर चालू होने की बात कही जाती है। इस पर पार्षद विश्वजीत त्रिपाठी जवाब देते हैं कि यदि रेगुलेटर सही तरीके से ऑपरेट नहीं होगा तो पानी भरना स्वाभाविक है।

बातचीत आगे बढ़ती है और सांसद कहते सुनाई देते हैं—“सब चालू है, केकरा के सुनावत बाट हो पार्षद जी?”

पार्षद का जवाब आता है—“आपको सुना रहे हैं।”

यहीं से साफ दिखाई देता है कि मुद्दा महज तकनीकी नहीं रह गया था। एक तरफ जलनिकासी व्यवस्था के संचालन को लेकर सवाल उठ रहा था, दूसरी तरफ बातचीत का स्वर राजनीतिक तंज में बदलता जा रहा था।

बारिश के बीच शहर में पानी जमा हो और जनता रास्ता तलाश रही हो, ऐसे में जनप्रतिनिधियों की बातचीत में राजनीतिक शब्दों की बौछार होना अपने आप में चर्चा का विषय बन गया है।


‘ब्राह्मण देवता’ पर भी हुआ पलटवार

वीडियो में सांसद रवि किशन पार्षद को “ब्राह्मण देवता” कहते सुनाई देते हैं। इस पर पार्षद विश्वजीत त्रिपाठी जवाब देते हैं—

“यहां पर ब्राह्मण की बात नहीं है, पूरा शहर डूब रहा है। आपको ब्राह्मण देवता, ब्राह्मण देवता दिख रहा है।”

इस हिस्से ने बहस को एक और दिशा दे दी। पार्षद की ओर से स्पष्ट रूप से यह कहा जाता सुनाई देता है कि मुद्दा जातिगत पहचान का नहीं बल्कि पूरे शहर में जलभराव का है।

यही वह बिंदु है जहां सवाल केवल यह नहीं रह जाता कि रेगुलेटर चालू हैं या नहीं। सवाल यह भी बनता है कि जब जनता पानी में रास्ता तलाश रही हो, तब प्रशासनिक व्यवस्था और जनप्रतिनिधियों के बीच संवाद किस भाषा और किस प्राथमिकता के साथ होना चाहिए?


‘सपा वाली बात कर रहे हो’—एक ही सवाल, दो राजनीतिक तंज

बातचीत के दौरान सांसद एक बार फिर पार्षद से कहते सुनाई देते हैं—“सपा वाली बात कर रहे हो, सपा के नेता हो गइल का?”

पार्षद फिर पलटकर कहते हैं—“आप क्या ज्वाइन कर लिए सांसद जी, आप बसपा ज्वाइन कर लिए क्या?”

इस राजनीतिक तकरार के बीच मूल मुद्दा लगातार जलभराव और जलनिकासी का ही बना रहता है। पार्षद अधिकारियों से बात करने की बात कहते हैं। जवाब में सांसद की ओर से अधिकारियों से तुरंत बात करने की बात कही जाती है।

यानी फोन के दूसरी तरफ दो जनप्रतिनिधि थे और उनके बीच मुद्दा था पानी। लेकिन बहस में सपा और बसपा भी पहुंच गईं।

जनता के लिए यह दृश्य इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि बारिश के बाद जलभराव जैसी समस्या किसी पार्टी की सदस्यता देखकर घरों या सड़कों में प्रवेश नहीं करती। पानी का कोई राजनीतिक रंग नहीं होता—वह जहां रास्ता बंद मिलता है, वहीं ठहर जाता है।


नौका विहार पहुंचकर पार्षद ने फिर उठाए सवाल

वायरल वीडियो के दूसरे हिस्से में पार्षद विश्वजीत त्रिपाठी नौका विहार पहुंचकर सांसद को फोन करते दिखाई देते हैं। पार्षद कहते हैं कि शाम के करीब 6:56 बजे हैं और वह जनता के बीच नौका विहार पर मौजूद हैं।

वीडियो में पार्षद यह कहते सुनाई देते हैं कि सांसद फोन नहीं उठा रहे हैं। इसके बाद वह सांसद पर जनता और जनप्रतिनिधियों से झूठ बोलने का आरोप लगाते हैं।

इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि वीडियो से नहीं होती। हालांकि, वीडियो में पार्षद यह जरूर कहते दिखाई देते हैं कि इतनी भीषण बारिश के दौरान सांसद को जनता के बीच रहकर उनकी समस्याएं देखनी चाहिए।

पार्षद का दावा है कि सांसद ने स्वयं को नौका विहार में बताया था, जबकि उनके अनुसार वे वहां मौजूद नहीं थे। इसके बाद वह कैमरे के सामने अपनी मौजूदगी दिखाते हुए कहते हैं कि वह स्वयं नौका विहार पर मौजूद हैं।

अब सवाल यह है कि उस समय वास्तव में कौन कहां मौजूद था—इसका निर्णायक उत्तर संबंधित पक्षों या आधिकारिक पुष्टि से ही सामने आ सकता है। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो अपने आप में पूरे घटनाक्रम का स्वतंत्र प्रमाण नहीं माना जा सकता।

गोरखपुर की बारिश में उठता बड़ा सवाल—रेगुलेटर चालू हैं तो पानी रुका क्यों?

इस पूरे विवाद का सबसे अहम हिस्सा राजनीतिक तकरार नहीं बल्कि वह मूल समस्या है, जिसने बातचीत को जन्म दिया—शहर में जलभराव।

यदि जलनिकासी के लिए बनाए गए रेगुलेटर और अन्य व्यवस्थाएं सही तरीके से काम कर रही थीं, तो जलभराव किन परिस्थितियों में हुआ? यदि कहीं संचालन में समस्या थी, तो उसकी जिम्मेदारी किस स्तर पर तय होगी? और यदि जलनिकासी की व्यवस्था पर्याप्त थी, तो भारी बारिश के दौरान शहर के अलग-अलग हिस्सों में पानी जमा होने के कारण क्या रहे?

ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि तकनीकी और प्रशासनिक जांच से सामने आ सकता है।

तरकुलानी से जलनिकासी का मुद्दा भी इसी संदर्भ में बातचीत में सामने आता है। ऐसे में आवश्यकता इस बात की है कि संबंधित विभाग जलनिकासी की पूरी व्यवस्था, रेगुलेटर के संचालन, नालों की स्थिति और जलनिकासी मार्गों की वास्तविक क्षमता को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करें।


अखिलेश यादव का बयान भी आया सामने

प्रदेश के विभिन्न शहरों में जलभराव को लेकर समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव का बयान भी सामने आया है। अखिलेश यादव ने एक्स पर पोस्ट करते हुए जलभराव के लिए अधिक वर्षा के बजाय जलनिकासी व्यवस्था की विफलता और कथित भ्रष्टाचार को जिम्मेदार बताया।

उन्होंने कहा कि जब नालियां और नाले गंदगी से जाम होंगे तो पानी की निकासी कैसे होगी। उन्होंने नदियों में प्रदूषण और नालों के गिरने तथा गाद जमा होने के कारण नदी के प्रवाह में बाधा का भी उल्लेख किया।

अखिलेश यादव ने बंधों के जरिए उफनती नदियों के पानी को रोकने को प्रभावी समाधान नहीं बताते हुए भविष्य में नदियों की गाद हटाने और उन्हें गहरा करने की बात कही। उन्होंने लखनऊ के साथ गोरखपुर, वाराणसी और प्रयागराज जैसे शहरों में भी जलभराव की स्थिति का उल्लेख किया।

उनके बयान का राजनीतिक संदर्भ भी स्पष्ट है। उन्होंने मौजूदा भाजपा सरकार की नीतियों और व्यवस्थाओं पर सवाल उठाते हुए राजनीतिक टिप्पणी की है। इसलिए इन दावों को राजनीतिक वक्तव्य के रूप में ही देखा जाना चाहिए।


गोरखपुर का सवाल राजनीति से बड़ा है

वायरल वीडियो ने एक दिलचस्प स्थिति सामने रख दी है। शहर पानी में है और जनप्रतिनिधियों की बातचीत में राजनीति तैर रही है।

सपा हो या बसपा, भाजपा हो या कोई अन्य राजनीतिक दल—बारिश का पानी किसी पार्टी कार्यालय में नहीं रुकता। वह सड़क, दुकान, घर और बाजार में पहुंचता है। उसे यह पता नहीं होता कि सामने वाला किस विचारधारा का समर्थक है।

इसलिए असली सवाल यह नहीं कि किसने किसे सपा या बसपा की याद दिलाई। असली सवाल यह है कि जलनिकासी व्यवस्था कितनी तैयार थी, रेगुलेटर कैसे संचालित हुए, नालों की सफाई कितनी हुई और बारिश के बाद पानी निकालने की जिम्मेदारी किसकी थी?


वायरल वीडियो ने बढ़ाई जवाबदेही की मांग

सोशल मीडिया पर वायरल बातचीत ने भले ही राजनीतिक बहस को तेज कर दिया हो, लेकिन इससे एक प्रशासनिक सवाल भी सामने आया है—क्या शहर को जलभराव से बचाने के लिए स्थायी और जवाबदेह व्यवस्था मौजूद है?

जनप्रतिनिधियों के बीच मतभेद होना लोकतांत्रिक व्यवस्था में असामान्य नहीं है। लेकिन जब मतभेद का केंद्र जनता की समस्या हो, तब उसके समाधान की दिशा स्पष्ट होना जरूरी है।

इस पूरे मामले में संबंधित प्रशासन और विभागों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि जलनिकासी व्यवस्था में तकनीकी समस्या थी तो उसका विवरण सामने आना चाहिए। यदि रेगुलेटर संचालन में कोई कमी थी तो उसकी जांच होनी चाहिए। यदि नालों या जलनिकासी मार्गों में अवरोध था तो उसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।

और यदि व्यवस्था निर्धारित मानकों के अनुसार काम कर रही थी, तब भी जनता को यह बताया जाना चाहिए कि भारी बारिश में जलभराव क्यों हुआ और भविष्य में इससे बचने के लिए क्या कदम उठाए जाएंगे।


पर्दाफाश न्यूज़ का सवाल

“पानी निकलेगा या बयान?”

गोरखपुर की जनता को राजनीतिक संवाद की पूरी रिकॉर्डिंग से ज्यादा जरूरत उस जवाब की है, जो जलभराव की समस्या का स्थायी समाधान बताए।

सांसद और पार्षद के बीच वायरल बातचीत ने सपा-बसपा के राजनीतिक तंज को जरूर सुर्खियों में ला दिया, लेकिन शहर की सड़कों पर जमा पानी इससे नहीं निकलेगा।

रेगुलेटर चालू होने का दावा अपनी जगह है, जलभराव का दृश्य अपनी जगह।

अब जरूरत आरोपों की नहीं, तथ्यों की जांच की है।

कौन-सा रेगुलेटर कब चला?
कितनी क्षमता से चला?
तरकुलानी से पानी की निकासी में क्या स्थिति रही?
कहां-कहां नाले या ड्रेनेज सिस्टम बाधित थे?
और सबसे महत्वपूर्ण—अगली भारी बारिश से पहले क्या सुधार किया जाएगा?

इन सवालों का जवाब यदि रिकॉर्ड के साथ सामने आता है तो राजनीतिक तकरार से कहीं ज्यादा उपयोगी होगा।

क्योंकि जनता को यह तय करने के लिए किसी सियासी तंज की जरूरत नहीं कि पानी भरा है या नहीं।

पानी सड़क पर दिख रहा है। अब व्यवस्था का जवाब भी दिखाई देना चाहिए।

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VIKAS TRIPATHI
VIKAS TRIPATHIhttp://www.pardaphaas.com
VIKAS TRIPATHI भारत देश की सभी छोटी और बड़ी खबरों को सामने दिखाने के लिए "पर्दाफास न्यूज" चैनल को लेके आए हैं। जिसके लोगो के बीच में करप्शन को कम कर सके। हम देश में समान व्यवहार के साथ काम करेंगे। देश की प्रगति को बढ़ाएंगे।
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