ईरान इस समय सिर्फ युद्ध के मोर्चे पर ही दबाव में नहीं है, बल्कि उसकी अर्थव्यवस्था भी गंभीर संकट से गुजर रही है। कमजोर होती करेंसी, बढ़ती महंगाई, पेट्रोल की कमी और अमेरिकी प्रतिबंधों ने आम लोगों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। राजधानी तेहरान समेत कई इलाकों में पेट्रोल पंपों पर सप्लाई का संकट दिखाई दे रहा है और कई जगह लंबी कतारें लग रही हैं।
सबसे बड़ी चिंता ईरानी करेंसी रियाल की लगातार गिरती कीमत को लेकर है। रिपोर्ट के मुताबिक, एक अमेरिकी डॉलर की कीमत करीब 20 लाख रियाल तक पहुंच गई है। यानी ईरानी मुद्रा पर दबाव बेहद बढ़ चुका है। कमजोर रियाल का सीधा असर रोजमर्रा की जरूरतों पर पड़ रहा है और खाने-पीने से लेकर दवाओं तक की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं।
पेट्रोल की कमी ने बढ़ाई चिंता
ईरान के पास दुनिया के बड़े तेल भंडारों में से एक है, लेकिन इसके बावजूद देश को पेट्रोल की कमी का सामना करना पड़ रहा है। इसकी बड़ी वजह घरेलू खपत और उत्पादन के बीच का अंतर है।
ईरान में रोजाना लगभग 12 करोड़ लीटर पेट्रोल का उत्पादन होने का अनुमान है, जबकि खपत करीब 13.5 करोड़ लीटर प्रतिदिन तक पहुंच जाती है। इस तरह हर दिन लगभग 1.4 से 1.5 करोड़ लीटर का अंतर पैदा हो जाता है।
इस कमी को पहले आयात के जरिए पूरा किया जाता था, लेकिन प्रतिबंधों और युद्ध से जुड़ी सप्लाई बाधाओं के कारण पेट्रोल आयात करना मुश्किल हो गया है।
तेहरान में पेट्रोल पंपों पर दबाव
राजधानी तेहरान में पेट्रोल की कमी का असर साफ दिखाई दे रहा है। कुछ पेट्रोल पंपों पर काम प्रभावित हुआ है, जबकि कई जगहों पर वाहन चालकों को लंबी कतारों में इंतजार करना पड़ रहा है।
स्थिति संभालने के लिए दूसरे प्रांतों से पेट्रोल की सप्लाई तेहरान भेजी जा रही है। हालांकि, कई पेट्रोल पंपों पर आगे भी सप्लाई को लेकर चिंता बनी हुई है।
ईंधन की कमी का असर सिर्फ निजी वाहनों पर नहीं, बल्कि राइड-हेलिंग सेवाओं पर भी पड़ रहा है। पेट्रोल की बढ़ती लागत और उपलब्धता में कमी के कारण यात्रा का खर्च बढ़ने की खबरें सामने आई हैं।
तेल का बड़ा भंडार, फिर पेट्रोल की कमी क्यों?
यह सवाल सबसे ज्यादा चर्चा में है कि जिस देश के पास दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल भंडारों में से एक है, वहां पेट्रोल की कमी क्यों हो रही है?
इसका जवाब कच्चे तेल और तैयार पेट्रोल की उत्पादन क्षमता के अंतर में छिपा है। ईरान के पास कच्चा तेल पर्याप्त मात्रा में है, लेकिन घरेलू जरूरत के मुताबिक पेट्रोल उत्पादन और रिफाइनिंग क्षमता पर दबाव है।
ऐसे में देश को कुछ मात्रा में पेट्रोल आयात करना पड़ता है। अमेरिकी प्रतिबंधों और युद्ध के कारण अंतरराष्ट्रीय सप्लाई नेटवर्क प्रभावित होने से यह विकल्प भी मुश्किल होता जा रहा है।
इसके अलावा रिफाइनरी और ईंधन भंडारण से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर पर दबाव ने स्थिति को और गंभीर बनाया है।
महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ी
कमजोर रियाल का सबसे बड़ा असर आम लोगों की खरीदारी क्षमता पर पड़ा है
रिपोर्ट के मुताबिक, युद्ध से पहले जितने पैसों में परिवार कई जरूरी खाद्य वस्तुएं खरीद सकता था, अब उतनी ही रकम में काफी कम सामान मिल रहा है।
टमाटर की कीमत में करीब 71 प्रतिशत, चिकन में 74 प्रतिशत और खाने के तेल में लगभग 177 प्रतिशत तक बढ़ोतरी का उल्लेख किया गया है।
यानी आम ईरानी परिवार के सामने दोहरी चुनौती है—एक तरफ आय और करेंसी की कमजोरी, दूसरी तरफ लगातार बढ़ती कीमतें।
दवाओं की कीमतों ने बढ़ाई मुश्किल
महंगाई का असर सिर्फ खाद्य पदार्थों तक सीमित नहीं है। दवाओं और स्वास्थ्य से जुड़ी जरूरी चीजों की कीमतों में भी तेज बढ़ोतरी ने चिंता बढ़ाई है।
रिपोर्ट में इंसुलिन की कीमत में लगभग 642 प्रतिशत तक की वृद्धि का दावा किया गया है। वहीं पैरासिटामोल जैसी दवाओं की कीमत में करीब 93 प्रतिशत बढ़ोतरी बताई गई है।
शिशु आहार की कीमतों में भी भारी उछाल आया है। ऐसे समय में जब परिवार पहले से महंगाई से जूझ रहे हैं, जरूरी दवाओं और बच्चों के भोजन की बढ़ती कीमतें सामाजिक दबाव को और बढ़ा सकती हैं।
क्या पेट्रोल संकट और गंभीर होगा?
आने वाले दिनों में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ईरान पेट्रोल की कमी को नियंत्रित कर पाएगा?
अगर घरेलू उत्पादन और खपत के बीच का अंतर बना रहता है और पेट्रोल आयात में बाधाएं जारी रहती हैं, तो सप्लाई पर दबाव बढ़ सकता है। ऐसी स्थिति में सरकार को ईंधन कोटा कम करने या अतिरिक्त खरीद के लिए ज्यादा कीमत लागू करने जैसे कदम उठाने पड़ सकते हैं।
हालांकि, ईरानी अधिकारियों की ओर से यह संकेत दिया गया है कि ईंधन सप्लाई व्यवस्था पूरी तरह ठप नहीं हुई है और स्थिति में सुधार की कोशिशें जारी हैं।
कमजोर रियाल बना सबसे बड़ी चुनौती
ईरान की मौजूदा आर्थिक परेशानी को सिर्फ पेट्रोल संकट के तौर पर देखना सही नहीं होगा। इसके पीछे कई कारण एक साथ काम कर रहे हैं—अमेरिकी प्रतिबंध, युद्ध का आर्थिक प्रभाव, कमजोर होती करेंसी, महंगाई और सप्लाई चेन में रुकावट।
जब किसी देश की करेंसी तेजी से कमजोर होती है, तो आयातित सामान महंगा हो जाता है। पेट्रोल, दवाएं, खाद्य सामग्री और दूसरे जरूरी उत्पादों की लागत बढ़ने से इसका सीधा असर आम नागरिकों की जेब पर पड़ता है।
यही वजह है कि रियाल की गिरती कीमत ईरान के लिए सिर्फ वित्तीय समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक चुनौती भी बन सकती है।
ईरान के सामने बड़ी परीक्षा
ईरान के पास विशाल तेल संसाधन हैं और वह लंबे समय से प्रतिबंधों के बीच अपनी अर्थव्यवस्था को संभालने की कोशिश करता रहा है। लेकिन युद्ध और नई सप्लाई बाधाओं ने पहले से मौजूद समस्याओं को और गहरा कर दिया है।
अगर ईंधन की कमी, महंगाई और करेंसी में गिरावट का सिलसिला जारी रहता है, तो आम लोगों की क्रय शक्ति पर और दबाव पड़ सकता है।
फिलहाल ईरान के सामने सबसे बड़ी चुनौती है—तेल से होने वाली क्षमता को घरेलू ईंधन जरूरतों में बदलना, पेट्रोल सप्लाई को स्थिर करना और गिरते रियाल पर नियंत्रण पाना।
क्योंकि युद्ध का असर सिर्फ सीमा और मिसाइलों तक सीमित नहीं रहता। उसका सबसे लंबा असर अक्सर आम आदमी की जेब, रसोई और रोजमर्रा की जिंदगी पर दिखाई देता है।














