“सपा और आम आदमी पार्टी के बीच गठजोड़ की कोई घोषणा नहीं, फिर भी कांग्रेस की बढ़ी बेचैनी; पंजाब चुनाव ने बढ़ाई चिंता, यूपी में ‘डायरेक्ट या इनडायरेक्ट’ तालमेल के खिलाफ पार्टी का रुख”
लखनऊ। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव और आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह की हालिया मुलाकात ने उत्तर प्रदेश की सियासत में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है। मुलाकात भले ही सामान्य राजनीतिक संवाद के तौर पर सामने आई हो और समाजवादी पार्टी ने अभी तक आम आदमी पार्टी को गठबंधन में शामिल करने या अपने हिस्से की कोई सीट देने की बात नहीं कही है, लेकिन इस मुलाकात ने कांग्रेस की राजनीतिक चिंताओं को जरूर बढ़ा दिया है।
कांग्रेस फिलहाल इस पूरे मामले पर आधिकारिक रूप से कोई टिप्पणी करने से बच रही है। पार्टी के नेताओं ने सार्वजनिक तौर पर न तो सपा को चेतावनी दी है और न ही आम आदमी पार्टी के साथ संभावित तालमेल पर कोई बयान दिया है। लेकिन पार्टी के भीतर यह स्पष्ट माना जा रहा है कि उत्तर प्रदेश में वह आम आदमी पार्टी के साथ किसी भी तरह का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष राजनीतिक तालमेल नहीं चाहती।
एक मुलाकात और बढ़ गया सियासी संशय
अखिलेश यादव और संजय सिंह की मुलाकात इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि दोनों नेताओं के बीच पहले भी राजनीतिक समीकरणों को लेकर नजदीकी दिखाई देती रही है। खासकर दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान अखिलेश यादव ने आम आदमी पार्टी के समर्थन में प्रचार किया था।
उस समय विपक्षी दलों के बीच सीटों का औपचारिक तालमेल भले ही नहीं था, लेकिन अखिलेश यादव का AAP के लिए प्रचार करना विपक्षी एकजुटता का एक अहम संकेत माना गया था। अब संजय सिंह से उनकी मुलाकात ने कांग्रेस के भीतर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या आने वाले चुनावों में सपा और AAP के बीच किसी स्तर पर राजनीतिक समझ बन सकती है?
हालांकि अभी तक ऐसा कोई ठोस संकेत नहीं है कि सपा आम आदमी पार्टी को यूपी में अपने साथ चुनाव मैदान में उतारने जा रही है। इसके बावजूद कांग्रेस किसी भी संभावित राजनीतिक समीकरण को लेकर सतर्क दिखाई दे रही है।
2024 में साथ, फिर राहें अलग
आम आदमी पार्टी 2024 के लोकसभा चुनाव में इंडिया ब्लॉक का हिस्सा थी। विपक्षी गठबंधन का उद्देश्य बीजेपी के खिलाफ अलग-अलग राज्यों में सीटों का बेहतर तालमेल बनाकर चुनाव लड़ना था। लेकिन हरियाणा विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस और AAP के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर सहमति नहीं बन सकी।
इसके बाद दोनों दलों के बीच दूरी बढ़ती गई और दिल्ली विधानसभा चुनाव में स्थिति पूरी तरह बदल गई। दिल्ली में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने अलग-अलग चुनाव लड़ा और एक-दूसरे के खिलाफ आक्रामक प्रचार किया।
नतीजा यह रहा कि विपक्षी वोटों के बंटवारे को लेकर दोनों दल एक-दूसरे पर आरोप लगाते रहे। चुनाव के बाद कांग्रेस और AAP के बीच राजनीतिक तल्खी और बढ़ गई।
यही वजह है कि अब कांग्रेस किसी भी ऐसे समीकरण से बचना चाहती है जिसमें उसे AAP के साथ एक मंच पर खड़ा दिखाई देना पड़े।
कांग्रेस की असली चिंता यूपी नहीं, पंजाब!
दिलचस्प बात यह है कि कांग्रेस की आम आदमी पार्टी को लेकर सबसे बड़ी चिंता उत्तर प्रदेश नहीं बल्कि पंजाब है। पंजाब में आम आदमी पार्टी सत्ता में है और कांग्रेस मुख्य विपक्षी दल की भूमिका में है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पंजाब और उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव एक ही समय के आसपास होने हैं। ऐसे में कांग्रेस नहीं चाहती कि एक राज्य में वह AAP के साथ किसी तरह की नजदीकी दिखाए और दूसरे राज्य में उसी पार्टी के खिलाफ चुनावी मैदान में उतरे।
कांग्रेस के रणनीतिकारों का मानना है कि पंजाब में AAP के खिलाफ पार्टी की लड़ाई सीधी है। ऐसे में यदि यूपी में समाजवादी पार्टी के जरिए AAP के साथ कोई अप्रत्यक्ष समझ दिखाई देती है तो उसका असर पंजाब की राजनीति पर भी पड़ सकता है।
यही कारण है कि कांग्रेस उत्तर प्रदेश में AAP के साथ किसी भी तरह की राजनीतिक साझेदारी से दूरी बनाए रखना चाहती है।
AAP पर कांग्रेस के पुराने आरोप फिर चर्चा में
दिल्ली चुनाव के बाद कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच आरोप-प्रत्यारोप लगातार जारी रहे हैं। दोनों दलों ने एक-दूसरे को बीजेपी को फायदा पहुंचाने वाली राजनीति का जिम्मेदार ठहराया।
कांग्रेस की ओर से लंबे समय से यह आरोप लगाया जाता रहा है कि आम आदमी पार्टी उन राज्यों में चुनावी मैदान में उतरती है जहां मुख्य मुकाबला कांग्रेस और बीजेपी के बीच होता है। कांग्रेस का आरोप है कि AAP का ऐसा कदम विपक्षी मतों को बांटता है और अंततः बीजेपी को राजनीतिक लाभ पहुंचाता है।
यही आरोप कांग्रेस अब यूपी के संभावित समीकरणों को देखते हुए भी अपने राजनीतिक आकलन का हिस्सा बना रही है।
कांग्रेस के सामने चिंता यह है कि यदि सपा और AAP के बीच किसी स्तर पर समझ बनती है तो इसका राजनीतिक संदेश केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं रहेगा। इसका असर पंजाब और दूसरे राज्यों में विपक्षी दलों के आपसी संबंधों पर भी पड़ सकता है।
सपा का अपना गणित, कांग्रेस का अपना डर
समाजवादी पार्टी के लिए उत्तर प्रदेश की राजनीति का समीकरण बिल्कुल अलग है। राज्य में मुख्य विपक्षी ताकत के रूप में सपा की प्राथमिकता बीजेपी के खिलाफ अपने आधार को मजबूत रखना है।
कांग्रेस के रणनीतिकारों का मानना है कि सपा को उत्तर प्रदेश में आम आदमी पार्टी की कोई खास चुनावी जरूरत नहीं है। AAP का राज्य में अभी ऐसा मजबूत संगठनात्मक या चुनावी आधार नहीं है जो सपा के लिए निर्णायक साबित हो सके।
दूसरी तरफ सपा और कांग्रेस के बीच पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान बने राजनीतिक समीकरण को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ऐसे में कांग्रेस को उम्मीद है कि अखिलेश यादव यूपी में AAP को चुनावी गठबंधन का हिस्सा नहीं बनाएंगे।
कांग्रेस के भीतर यह तर्क भी दिया जा रहा है कि जिस तरह सपा और कांग्रेस दोनों ही कई मौकों पर AIMIM को बीजेपी की ‘बी टीम’ कहकर निशाना बनाते रहे हैं, उसी तरह AAP को लेकर भी दोनों दलों के बीच राजनीतिक मतभेद हैं। इसलिए सपा द्वारा AAP को अपने साथ लाने की संभावना फिलहाल बहुत मजबूत नहीं मानी जा रही।
2022 के चुनाव में AAP का कमजोर प्रदर्शन
उत्तर प्रदेश की चुनावी जमीन पर आम आदमी पार्टी का पिछला प्रदर्शन भी कांग्रेस के आकलन का अहम हिस्सा है। 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा, कांग्रेस और AAP अलग-अलग चुनाव मैदान में उतरे थे।
उस चुनाव में AAP का प्रदर्शन बेहद सीमित रहा था। पार्टी उत्तर प्रदेश की राजनीति में कोई प्रभावी तीसरी ताकत नहीं बन सकी। यही वजह है कि मौजूदा परिस्थितियों में सपा के लिए AAP को सीट देना या उसके साथ औपचारिक गठबंधन करना राजनीतिक रूप से कितना फायदेमंद होगा, इस पर सवाल बने हुए हैं।
सपा के लिए असली चुनौती बीजेपी के खिलाफ अपने सामाजिक और राजनीतिक गठबंधन को मजबूत करना है। ऐसे में ऐसा कोई साझेदार जोड़ना, जिसका राज्य में सीमित जनाधार हो, उसके चुनावी गणित को उलझा भी सकता है।
फिलहाल तीनों दलों ने साधी चुप्पी
अखिलेश यादव और संजय सिंह की मुलाकात के बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं जरूर तेज हैं, लेकिन अभी तक सपा, कांग्रेस या आम आदमी पार्टी की ओर से यूपी में किसी नए गठबंधन की कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।
इस मुद्दे पर संपर्क किए जाने पर तीनों दलों ने फिलहाल चुप्पी साधना ही बेहतर समझा है। यही चुप्पी राजनीतिक अटकलों को और हवा दे रही है।
कांग्रेस के लिए फिलहाल सबसे अहम बात यह है कि सपा और AAP के बीच कोई औपचारिक सीट समझौता न हो। वहीं सपा अपनी रणनीति को सार्वजनिक करने से पहले चुनावी परिस्थितियों का आकलन करना चाहती है।
आगे क्या होगा, नजर यूपी पर
अखिलेश यादव और संजय सिंह की मुलाकात को फिलहाल गठबंधन की घोषणा मानना जल्दबाजी होगी। लेकिन राजनीति में मुलाकातें अक्सर भविष्य के समीकरणों के संकेत भी देती हैं। यही कारण है कि कांग्रेस इस पूरे घटनाक्रम को बेहद करीब से देख रही है।
उत्तर प्रदेश में सपा और कांग्रेस के रिश्ते पहले ही सीट बंटवारे और चुनावी रणनीति को लेकर कई बार परीक्षा से गुजर चुके हैं। ऐसे में AAP की संभावित एंट्री इस समीकरण को और पेचीदा बना सकती है।
कांग्रेस के लिए मामला सिर्फ यूपी की सीटों का नहीं है। पंजाब में AAP के खिलाफ उसकी सीधी राजनीतिक लड़ाई और आगामी चुनावों का एक ही समय पर होना पार्टी की रणनीति को और संवेदनशील बना रहा है।
फिलहाल सपा ने AAP को लेकर कोई पत्ता नहीं खोला है और कांग्रेस ने भी सार्वजनिक रूप से विरोध दर्ज नहीं कराया है। लेकिन राजनीतिक संकेत साफ हैं—अखिलेश और संजय सिंह की मुलाकात ने भले ही कोई गठबंधन घोषित न किया हो, लेकिन कांग्रेस के लिए यह मुलाकात आने वाले चुनावी समीकरणों की घंटी जरूर बजा गई है।














