नई दिल्ली: अमेरिका और ईरान के बीच हुए युद्धविराम समझौते के बाद दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण तेल आपूर्ति लाइफलाइन स्ट्रेट ऑफ होर्मुज फिर से खुल गई है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक ऊर्जा बाजार के सामने संकट अभी टला नहीं है। करीब चार महीने तक चली अस्थिरता के कारण दुनिया को लगभग 1.15 अरब बैरल तेल की कमी का सामना करना पड़ा, जिसका असर आने वाले महीनों तक दिखाई दे सकता है।
चार महीने में तेल बाजार को बड़ा झटका
ऊर्जा विश्लेषण कंपनी Kpler के अनुसार, फरवरी से जून 2026 के बीच मध्य-पूर्व से तेल की आपूर्ति गंभीर रूप से प्रभावित रही। इस दौरान वैश्विक मांग के मुकाबले सप्लाई में भारी कमी आई, जिससे दुनिया भर के देशों को अपने रणनीतिक और व्यावसायिक भंडार का सहारा लेना पड़ा।
30 साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंचे भंडार
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के आंकड़ों के मुताबिक दुनिया के रणनीतिक तेल भंडार 1990 के दशक के बाद सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए हैं। वहीं अमेरिका का आपातकालीन तेल भंडार भी पिछले 43 वर्षों के न्यूनतम स्तर के करीब है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर होर्मुज जलडमरूमध्य कुछ और सप्ताह बंद रहता, तो वैश्विक ऊर्जा संकट और गंभीर हो सकता था।
युद्ध के दौरान 126 डॉलर तक पहुंचा तेल
अमेरिका-ईरान तनाव के चरम पर पहुंचने के दौरान ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत बढ़कर 126.41 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी। हालांकि समझौते के बाद कीमतों में राहत आई है और फिलहाल यह 80 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा है।
लेकिन बाजार विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यह राहत अस्थायी साबित हो सकती है।
क्यों फिर बढ़ सकती हैं कीमतें?
विश्लेषकों के मुताबिक सिर्फ होर्मुज का खुलना पर्याप्त नहीं है। तेल आपूर्ति को सामान्य होने में समय लगेगा क्योंकि:
समुद्री मार्गों की सुरक्षा बहाल करनी होगी।
सैकड़ों तेल टैंकरों को दोबारा संचालन में लाना होगा।
तेल उत्पादक देशों को उत्पादन बढ़ाना होगा।
भंडारों को फिर से भरना पड़ेगा।
वैश्विक सप्लाई चेन को सामान्य होने में कई महीने लग सकते हैं।
इसी वजह से बाजार में तेल की उपलब्धता सीमित रह सकती है, जिससे कीमतों पर दोबारा दबाव बन सकता है।
OPEC की भूमिका होगी अहम
ऊर्जा बाजार की नजर अब OPEC+ देशों पर है। यदि सऊदी अरब और उसके सहयोगी देश उत्पादन बढ़ाते हैं तो सप्लाई संकट कुछ हद तक कम हो सकता है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि खोई हुई 1.15 अरब बैरल की आपूर्ति की भरपाई करना आसान नहीं होगा।
दुनिया के लिए क्या है खतरा?
यदि तेल की कीमतें फिर से बढ़ती हैं तो इसका सीधा असर:
पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर पड़ेगा।
वैश्विक महंगाई बढ़ सकती है।
परिवहन और लॉजिस्टिक्स लागत में इजाफा होगा।
विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव बनेगा।
होर्मुज स्ट्रेट का दोबारा खुलना वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए राहत की खबर जरूर है, लेकिन चार महीने के संकट ने दुनिया के तेल भंडार को कमजोर कर दिया है। ऐसे में आने वाले महीनों में तेल बाजार की स्थिरता काफी हद तक OPEC की उत्पादन नीति और मध्य-पूर्व की भू-राजनीतिक स्थिति पर निर्भर करेगी।














