नोएडा:शहर में वायु गुणवत्ता को बेहतर बनाए रखने और धूल प्रदूषण पर काबू पाने के लिए Noida Authority ने 15 प्रमुख सड़कों को ‘डस्ट फ्री जोन’ में बदलने का अहम फैसला लिया है। यह पहल ऐसे समय में की गई है, जब हालिया स्वच्छ वायु सर्वेक्षण 2025 में नोएडा ने देशभर में 9वीं रैंक हासिल कर अपनी स्थिति मजबूत की है।
इस तरह 2020-21 के मुकाबले करीब 21.31% सुधार दर्ज किया गया है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि सड़कों से उड़ने वाली धूल अब भी प्रदूषण का प्रमुख कारण बनी हुई है।
एयर क्वालिटी में लगातार सुधार
प्राधिकरण के आंकड़ों के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में नोएडा की वायु गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। PM10 स्तर में लगातार गिरावट दर्ज की गई है—

2017-18: 229
2018-19: 252
2019-20: 213
2020-21 (बेस ईयर): 197
2021-22: 203.75
2022-23: 202.33
2023-24: 182.75
2024-25: 155
‘डस्ट फ्री जोन’ क्यों जरूरी
विशेषज्ञों के मुताबिक, शहर में PM10 प्रदूषण का सबसे बड़ा स्रोत सड़क की धूल है, जो भारी ट्रैफिक और कच्चे किनारों के कारण और बढ़ जाती है। इसी को ध्यान में रखते हुए Commission for Air Quality Management (CAQM) के निर्देश पर यह योजना लागू की जा रही है।
किन सड़कों पर होगा काम
चिन्हित सड़कों में अशोक नगर से सेक्टर-37 बॉटनिकल गार्डन मार्ग, रोड नंबर-6 सहित कई प्रमुख ट्रैफिक कॉरिडोर शामिल हैं। इन मार्गों पर लगातार यातायात के कारण धूल का स्तर अधिक पाया गया है।
क्या-क्या होंगे उपाय
डस्ट फ्री जोन विकसित करने के लिए कई ठोस कदम उठाए जाएंगे:
सड़कों के किनारों पर ग्रीन बेल्ट और घास विकसित करना
नियमित पानी का छिड़काव
मैकेनिकल रोड स्वीपिंग
फुटपाथों और कच्चे हिस्सों का सुधार
निर्माण कार्यों की सख्त निगरानी
धूल रोकने के लिए बैरिकेडिंग और कवरिंग
सेक्टर-34 जैसे इलाकों में खराब फुटपाथों को ठीक कर धूल उड़ने से रोकने पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।
पहले चरण में 30 किमी सड़कें
प्राधिकरण की एसीईओ Vandana Tripathi के अनुसार, पहले चरण में करीब 30 किलोमीटर लंबी सड़कों को डस्ट फ्री बनाया जाएगा। इसके बाद इस मॉडल को अन्य क्षेत्रों में भी विस्तार दिया जाएगा।
“डस्ट फ्री—यादों से हकीकत तक”
साल 2017…
जब पहली बार नोएडा में प्रदूषण का मुद्दा एनजीटी तक पहुंचा, तब एक बेहद सरल और व्यावहारिक सुझाव सामने रखा गया—सड़कों के किनारे घास लगाई जाए, ताकि उड़ती धूल पर काबू पाया जा सके। उस दौर में GM त्यागी और CEO आलोक टंडन जैसे अधिकारियों ने इस सुझाव को गंभीरता से लिया। नतीजा यह हुआ कि शहर के कई हिस्सों, खासकर 7X सेक्टरों में डस्ट फ्री जोन विकसित भी किए गए। कुछ समय के लिए लगा कि नोएडा ने सच में प्रदूषण से लड़ने का तरीका खोज लिया है।
फिर आया “बदलाव” का दौर…
अधिकारी बदले, प्राथमिकताएं बदलीं—और देखते ही देखते “डस्ट फ्री जोन” का नाम बदलकर मानो “मेंटेनेंस फ्री जोन” हो गया। जहां कभी घास लहलहाती थी, वहां टाइल्स बिछा दी गईं… और जहां हरियाली होनी चाहिए थी, वहां अब धूल की मोटी परत ने स्थायी कब्जा कर लिया। पिछले 2-3 सालों में लगातार शिकायतें, निवेदन और याद दिलाने की कोशिशें होती रहीं… लेकिन सिस्टम ने जैसे हर बार इस मुद्दे पर भी “धूल झाड़” दी।

आखिरकार मामला फिर से एनजीटी और CAQM तक पहुंचा। अब जाकर वही पुराना, आजमाया हुआ नुस्खा फिर से आदेशों में लिखा गया—“सड़कों के किनारे डस्ट फ्री जोन विकसित किए जाएं।”
सबसे दिलचस्प—और शायद सबसे विडंबनापूर्ण—बात यह है कि जिस समाधान को 7 साल पहले लागू कर सफलता भी मिल चुकी थी,उसे आज एक “नई पहल” के रूप में पेश किया जा रहा है। जमीनी हकीकत अब भी कुछ और ही कहानी कहती है…सेक्टर-75/76 जैसे इलाकों में फुटपाथ जरूर चमक रहे हैं, लेकिन उनके ठीक पीछे धूल का साम्राज्य जस का तस खड़ा है। घास लगना तो दूर, नियमित सफाई तक नदारद है।
तो सवाल अब भी वही खड़ा है—
क्या इस बार “डस्ट फ्री जोन” सच में डस्ट फ्री रहेगा? या फिर कुछ समय बाद यह भी सिर्फ फाइलों और रिपोर्ट्स में ही साफ नजर आएगा… जमीनी हकीकत में नहीं?
शहर का प्रोफाइल और अहमियत
लगभग 203 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाले नोएडा में करीब 6.37 लाख की आबादी और 10 वर्क सर्किल हैं। ऐसे बड़े शहरी क्षेत्र में प्रदूषण नियंत्रण के लिए यह पहल बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
क्या होगा असर
यदि योजना प्रभावी तरीके से लागू होती है, तो:
वायु गुणवत्ता में और सुधार होगा
सांस संबंधी बीमारियों में कमी आएगी
स्वच्छ वायु रैंकिंग में नोएडा की स्थिति और बेहतर हो सकती है
प्राधिकरण का मानना है कि ‘डस्ट फ्री जोन’ की यह पहल नोएडा को स्वच्छ और स्वस्थ शहर बनाने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित होगी।














