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नोएडा प्राधिकरण की बोर्ड बैठक में 11 बड़े फैसले: जमीन, रियायत और निवेश की नई बिसात—विकास की पटकथा में किसका कितना फायदा?”

“सेक्टर-147 से सेक्टर-105 तक जमीन के इस्तेमाल पर बड़े निर्णय, आईटी और लॉजिस्टिक्स को बढ़ावा, हस्तांतरण शुल्क में राहत और औद्योगिक इकाइयों के लिए बदले नियम—बोर्ड की मेज पर विकास की पटकथा लिखी गई, लेकिन असली परीक्षा जमीन पर होगी।”

नोएडा। शहर के विकास की कहानी सिर्फ चौड़ी सड़कों, ऊंची इमारतों और चमकते औद्योगिक परिसरों से नहीं लिखी जाती। इसकी असली कहानी उन बोर्ड बैठकों में भी लिखी जाती है, जहां जमीन की उपयोगिता तय होती है, भूखंडों की शर्तें बदलती हैं, शुल्क में राहत मिलती है और भविष्य के शहर का नक्शा कागजों पर तैयार होता है। नोएडा प्राधिकरण की 224वीं बोर्ड बैठक में लिए गए 11 अहम फैसले इसी कहानी का नया अध्याय हैं।

बैठक में औद्योगिक, व्यावसायिक और आधारभूत ढांचे के विकास से जुड़े कई प्रस्तावों को मंजूरी दी गई। आईटी और आईटीईएस क्षेत्र, बिजनेस पार्क, व्यावसायिक भूमि, ऑटोमोबाइल कंपोनेंट्स, सौर ऊर्जा, पार्किंग व्यवस्था, भवन निर्माण नियम, लॉजिस्टिक्स और औद्योगिक भूखंडों के हस्तांतरण शुल्क जैसे विषय चर्चा के केंद्र में रहे।

कागज पर देखें तो यह फैसलों का ऐसा गुलदस्ता है, जिसमें निवेश, रोजगार, कारोबार और शहरी सुविधाओं की खुशबू दिखाई देती है। मगर प्रशासनिक फैसलों की असली खूबी केवल उनकी घोषणा में नहीं, बल्कि उनके क्रियान्वयन में होती है। सवाल यह है कि इन फैसलों का फायदा कितने लोगों तक पहुंचेगा, कितनी परियोजनाएं समय पर पूरी होंगी और विकास के दावों का हिसाब आखिर कौन देगा?

11 फैसलों में विकास का बड़ा खाका

बोर्ड बैठक में सबसे महत्वपूर्ण विषयों में आईटी और आईटीईएस क्षेत्र के विकास, व्यावसायिक भूखंडों के नियोजन, भवन निर्माण संबंधी नियमों, पार्किंग व्यवस्था, लॉजिस्टिक्स सुविधाओं और औद्योगिक इकाइयों के हस्तांतरण शुल्क में बदलाव जैसे मुद्दे शामिल रहे। इनका सीधा संबंध नोएडा की औद्योगिक पहचान और भविष्य के शहरी विस्तार से है।

लेकिन यहां एक बुनियादी बात समझना जरूरी है। प्राधिकरण जब किसी परियोजना को मंजूरी देता है, तो वह केवल जमीन आवंटित नहीं करता; वह आने वाले वर्षों में उस जमीन के इस्तेमाल, कारोबार के स्वरूप और स्थानीय सुविधाओं की दिशा भी तय करता है। इसीलिए हर बड़ा निर्णय सिर्फ प्रशासनिक फाइल नहीं, सार्वजनिक हित से जुड़ा विषय भी होता है।

विकास की चमकदार तस्वीर पेश करना आसान है। असली चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि उस तस्वीर में आम नागरिक की सुविधा, रोजगार की संभावनाएं, पर्यावरण की जरूरतें और नियमों की समानता भी दिखाई दें।

सेक्टर-147: आईटी निवेश के लिए जमीन, अब परिणाम की बारी

सेक्टर-147 में लगभग 68 हजार वर्गमीटर संस्थागत भूमि पर आईटी और आईटीईएस उपयोग को बढ़ावा देने के लिए भूमि आवंटन योजना को आगे बढ़ाने का निर्णय महत्वपूर्ण माना जा सकता है। इसका उद्देश्य सूचना प्रौद्योगिकी, संबंधित सेवाओं और ज्ञान आधारित गतिविधियों के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करना है।

प्रस्तावित व्यवस्था के तहत भूमि की लीज अवधि 45 वर्ष निर्धारित की गई है। निर्धारित शर्तों के अनुसार 45 वर्ष की लीज अवधि को आगे 45 वर्ष तक बढ़ाने का प्रावधान भी उल्लेखित है। निर्माण के लिए तय समयसीमा और उपयोग संबंधी शर्तों का पालन करना आवंटियों के लिए महत्वपूर्ण होगा। योजना में संबंधित क्षेत्र का न्यूनतम 50 प्रतिशत हिस्सा आईटी और आईटीईएस गतिविधियों के लिए रखने की शर्त भी सामने आती है।

यहां प्राधिकरण के सामने दोहरी जिम्मेदारी है। एक ओर निवेशकों को स्पष्ट और स्थिर नीतिगत वातावरण उपलब्ध कराना है, दूसरी ओर यह सुनिश्चित करना है कि संस्थागत उपयोग के नाम पर आवंटित जमीन अपने निर्धारित उद्देश्य से भटके नहीं।

आईटी पार्क और तकनीकी परिसरों की घोषणा से शहर को आधुनिक दिखाने में मदद जरूर मिलती है, लेकिन रोजगार की वास्तविक संख्या, परियोजनाओं की समयसीमा और जमीन के प्रभावी उपयोग से ही उनकी सफलता मापी जाएगी।

निवेश की खबर सुर्खियां बनाती है; निवेश का परिणाम लोगों की जिंदगी बदलता है। दोनों में अंतर समझना जरूरी है।

सेक्टर-105: व्यावसायिक जमीन पर नई योजना

सेक्टर-105 में 12,596.64 वर्गमीटर व्यावसायिक भूमि पर ऑटोमोबाइल कंपोनेंट्स से संबंधित परिसर विकसित करने की योजना को भी मंजूरी मिलने का उल्लेख है। प्रस्ताव के अनुसार भूमि को एक भूखंड के रूप में एकल बोली प्रक्रिया के माध्यम से आवंटित करने की व्यवस्था रखी गई है।

इस तरह की परियोजनाएं औद्योगिक आपूर्ति श्रृंखला को मजबूती देने, कारोबार के नए अवसर पैदा करने और संबंधित क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियां बढ़ाने में भूमिका निभा सकती हैं।

लेकिन जमीन आवंटन की प्रक्रिया जितनी महत्वपूर्ण है, उतनी ही महत्वपूर्ण उसकी पारदर्शिता भी है। बोली के नियम स्पष्ट हों, पात्रता की शर्तें सबके लिए समान हों और आवंटन के बाद परियोजना निर्धारित उद्देश्य के अनुसार विकसित हो—यही किसी भी सार्वजनिक प्राधिकरण की विश्वसनीयता की कसौटी है।

आखिर जमीन सार्वजनिक नियोजन का संसाधन है। उसका आवंटन केवल राजस्व प्राप्ति का मामला नहीं, बल्कि भविष्य की शहरी अर्थव्यवस्था का निर्णय भी है।

बिजनेस पार्क और मास्टर डेवलपर: चयन पारदर्शी तो भरोसा मजबूत

बोर्ड बैठक में नोएडा में आईटी सिटी सह बिजनेस पार्क विकसित करने और मास्टर डेवलपर के चयन से संबंधित प्रस्तावों को भी महत्व दिया गया। इस पहल के अंतर्गत कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर, आईटी और आईटीईएस, डाटा सेंटर, स्टार्टअप तथा अन्य संबंधित गतिविधियों के विकास की संभावनाएं शामिल हैं।

मास्टर डेवलपर का चयन ई-बिडिंग के माध्यम से करने का उद्देश्य प्रतिस्पर्धात्मक प्रक्रिया को बढ़ावा देना है। सिद्धांत रूप में यह सही दिशा है, क्योंकि ऑनलाइन बोली प्रक्रिया निर्णयों को अधिक व्यवस्थित और तुलनात्मक बना सकती है।

लेकिन पारदर्शिता का अर्थ केवल ऑनलाइन पोर्टल पर बोली आमंत्रित करना नहीं है। असली पारदर्शिता तब होगी जब पात्रता की शर्तें, मूल्यांकन के मानदंड, चयन के कारण, परियोजना की समयसीमा और जिम्मेदारियां स्पष्ट हों।

यह भी जरूरी है कि विकासकर्ता को मिलने वाली सुविधाओं के साथ उसकी जवाबदेही भी तय हो। परियोजना में देरी होने पर क्या होगा? निवेश के वादे पूरे नहीं होने पर कौन जिम्मेदार होगा? निर्धारित उपयोग में बदलाव की स्थिति में कौन-से नियम लागू होंगे?

इन सवालों के जवाब पहले से स्पष्ट होंगे, तभी बिजनेस पार्क की योजना निवेश आकर्षित करने के साथ सार्वजनिक भरोसा भी अर्जित करेगी।

15 मेगावाट सौर ऊर्जा: छतों से ऊर्जा, शहर को राहत

बैठक में प्राधिकरण की विभिन्न संस्थाओं में लगभग 15 मेगावाट क्षमता की रूफटॉप सौर ऊर्जा परियोजना से संबंधित प्रस्ताव का भी उल्लेख है। यह पहल ऊर्जा लागत कम करने और स्वच्छ ऊर्जा को प्रोत्साहित करने की दिशा में उपयोगी हो सकती है।

आज जब शहरों की ऊर्जा जरूरतें बढ़ रही हैं, तब सरकारी और संस्थागत भवनों की छतों का उपयोग सौर ऊर्जा उत्पादन के लिए करना व्यावहारिक विकल्प है। इससे पारंपरिक बिजली पर निर्भरता कम करने और पर्यावरणीय दबाव घटाने में सहायता मिल सकती है।

फिर भी केवल क्षमता घोषित कर देना उपलब्धि का अंतिम पड़ाव नहीं होना चाहिए। परियोजना कब स्थापित होगी, कितनी बिजली वास्तव में पैदा होगी, रखरखाव कौन करेगा और कितनी बचत होगी—इन सभी बिंदुओं का सार्वजनिक आकलन जरूरी है।

ऊर्जा बचत का दावा तभी विश्वसनीय होगा, जब उसके आंकड़े भी सामने आएंगे।

भवन नियम और पार्किंग: शहर की जरूरत या फाइलों की सुविधा?

उत्तर प्रदेश शासन की ओर से जारी मॉडल भवन विनियम-2026 को नोएडा में लागू करने का प्रस्ताव भी बैठक के महत्वपूर्ण विषयों में शामिल रहा। इसके साथ पार्किंग व्यवस्था और निर्माण संबंधी नियमों को निर्धारित प्रावधानों के अनुरूप व्यवस्थित करने की बात सामने आई।

नियमों का उद्देश्य निर्माण गतिविधियों को सुव्यवस्थित करना और भवनों के विकास को एक निर्धारित ढांचे में लाना है। लेकिन शहरी नियोजन का सबसे कठिन सवाल यह है कि भवन तो बन जाते हैं, उनके साथ सड़क, पार्किंग और अन्य नागरिक सुविधाओं की व्यवस्था कितनी प्रभावी बनती है?

यदि किसी इलाके में व्यावसायिक गतिविधियां बढ़ती हैं, तो उसके साथ यातायात, पार्किंग और सार्वजनिक सुविधाओं की जरूरत भी बढ़ती है। इसलिए नियमों का मूल्यांकन केवल निर्माण की अनुमति के नजरिये से नहीं, बल्कि उनके समग्र शहरी प्रभाव से किया जाना चाहिए।

नोएडा के नागरिकों को केवल यह जानने में दिलचस्पी नहीं होगी कि कितने भवनों को नियमों के तहत अनुमति मिलेगी। वे यह भी देखना चाहेंगे कि इन नियमों से जाम, अव्यवस्थित पार्किंग और स्थानीय असुविधाओं पर कितना असर पड़ेगा।

हस्तांतरण शुल्क में राहत: कारोबार को सहूलियत, लेकिन कसौटी समानता

सेक्टर-32 के वाणिज्यिक भूखंड सीसी-01 पर निर्मित इकाइयों के उपभूधारकों से लिए जाने वाले भू-भाटक की दर में एकरूपता लाने से संबंधित निर्णय भी चर्चा में रहा। उपलब्ध समाचार-कटिंग के अनुसार वार्षिक दर को 612 रुपये प्रति वर्गमीटर से घटाकर लगभग 232 रुपये प्रति वर्गमीटर करने का उल्लेख है।

इस बदलाव का उद्देश्य संबंधित इकाइयों के लिए दरों में एकरूपता और वित्तीय राहत उपलब्ध कराना बताया गया है। कारोबार से जुड़ी लागत में कमी निवेश और व्यावसायिक गतिविधियों के लिए मददगार हो सकती है।

लेकिन किसी भी शुल्क में राहत के साथ यह सवाल स्वाभाविक है कि उसका लाभ किन इकाइयों को मिलेगा, किन शर्तों पर मिलेगा और क्या समान परिस्थितियों वाले अन्य आवंटियों के लिए भी समान नीति लागू होगी?

नीति की विश्वसनीयता इस बात से बनती है कि वह स्पष्ट नियमों पर आधारित हो और समान परिस्थितियों में समान व्यवहार सुनिश्चित करे। यदि राहत का उद्देश्य कारोबार को प्रोत्साहन देना है, तो उसके आधार और पात्रता का खुलासा भी उतना ही जरूरी है।

राहत अच्छी बात है, लेकिन राहत के नियम उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।

लॉजिस्टिक्स योजना: माल की आवाजाही से शहर की अर्थव्यवस्था तक

माल परिवहन को सुगम बनाने, लॉजिस्टिक्स की लागत घटाने और यातायात जाम कम करने के उद्देश्य से लॉजिस्टिक्स प्लान से संबंधित प्रस्ताव को भी मंजूरी दी गई।

औद्योगिक और व्यावसायिक शहरों के लिए माल की निर्बाध आवाजाही बेहद जरूरी है। यदि परिवहन व्यवस्था प्रभावी हो, तो कारोबार का समय बच सकता है, लागत कम हो सकती है और आपूर्ति श्रृंखला अधिक व्यवस्थित बन सकती है।

लेकिन इस योजना की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि परिवहन मार्गों, माल ढुलाई गतिविधियों, पार्किंग और संबंधित सुविधाओं का नियोजन कितनी दूरदर्शिता से किया जाता है। केवल योजना को स्वीकृति मिल जाना और उसका धरातल पर प्रभावी क्रियान्वयन दो अलग-अलग चरण हैं।

औद्योगिक इकाइयों के हस्तांतरण शुल्क में बदलाव

उत्तर प्रदेश औद्योगिक विकास नियमावली-2025 में संशोधन के तहत कार्यशील औद्योगिक इकाइयों के हस्तांतरण शुल्क को 10 प्रतिशत से घटाकर 7 प्रतिशत करने के प्रस्ताव को मंजूरी मिलने का उल्लेख है।

इसके अतिरिक्त औद्योगिक इकाइयों को कार्यशील बनाने के लिए निर्धारित प्रारंभिक अवधि और वार्षिक समयवृद्धि शुल्क से संबंधित प्रावधानों में बदलाव भी सामने आया है। उपलब्ध कटिंग के अनुसार निर्माण के लिए तीन वर्ष की मूल अवधि तथा परिस्थितियों के अनुसार अतिरिक्त समय और समयवृद्धि शुल्क की व्यवस्था का उल्लेख किया गया है।

ऐसे निर्णय औद्योगिक इकाइयों के संचालन, स्वामित्व हस्तांतरण और कारोबारी निरंतरता को प्रभावित कर सकते हैं। शुल्क में कमी कारोबार के लिए राहत का माध्यम बन सकती है, लेकिन इसके प्रभाव का आकलन वास्तविक परिस्थितियों के आधार पर होना चाहिए।

यह देखना भी आवश्यक है कि नियमों में बदलाव से कार्यशील इकाइयों को कितनी राहत मिलती है, नए निवेश पर इसका क्या असर पड़ता है और निर्धारित शर्तों के अनुपालन की निगरानी कैसे होती है।

असली सवाल: फैसलों का हिसाब कौन देगा?

नोएडा प्राधिकरण की 224वीं बोर्ड बैठक ने शहर के विकास से जुड़े कई क्षेत्रों के लिए नीतिगत दिशा तय की है। आईटी और बिजनेस पार्क से लेकर सौर ऊर्जा, व्यावसायिक जमीन, भवन नियम, लॉजिस्टिक्स और औद्योगिक इकाइयों के हस्तांतरण तक, फैसलों का दायरा व्यापक है।

लेकिन किसी भी बोर्ड बैठक का मूल्यांकन उसके प्रस्तावों की संख्या से नहीं होना चाहिए। 11 फैसले लेना प्रशासनिक सक्रियता का संकेत हो सकता है, पर उनकी सफलता का प्रमाण तभी मिलेगा, जब तय समयसीमा में काम पूरा होगा, निवेश जमीन पर उतरेगा और नागरिकों को ठोस लाभ दिखाई देगा।

यहीं विकास और विकास के दावे के बीच की रेखा खिंचती है।

राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था में घोषणाओं का अपना आकर्षण होता है। मंजूरी की खबर तत्काल सुर्खियां बनती है, जबकि क्रियान्वयन की प्रगति धीरे-धीरे सामने आती है। इसलिए जरूरी है कि प्रत्येक महत्वपूर्ण निर्णय के साथ उसकी समयसीमा, जिम्मेदार विभाग, प्रगति और परिणाम का स्पष्ट विवरण भी सार्वजनिक हो।

क्योंकि शहर केवल बोर्डरूम में नहीं बनता। शहर उन सड़कों पर बनता है, जिन पर लोग चलते हैं; उन परिसरों में बनता है, जहां रोजगार पैदा होता है; और उन नियमों में बनता है, जिनका पालन सभी पर समान रूप से लागू होता है।

नोएडा के लिए अब असली परीक्षा यही है कि बोर्ड की मेज पर तैयार हुआ विकास का खाका जमीन पर कितनी ईमानदारी और कितनी तेजी से उतरता है। आखिर जनता को फैसलों की गिनती से ज्यादा उनके नतीजों से मतलब है।

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VIKAS TRIPATHI
VIKAS TRIPATHIhttp://www.pardaphaas.com
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